दहेज प्रथा कानून क्या हैं? दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 सम्पूर्ण जानकारी

नमस्कार आज हम हमारे समाज में व्याप्त दहेज़ प्रथा के विषय में चर्चा करेंगे और जानेंगे की किस प्रकार सरकार ने इस कुप्रथा के रोकथाम के लिए विशेष प्रयास किये और दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के विषय में भी सम्पूर्ण जानकारी यहां दी गयी हैं।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 में कुल धाराएँ :–

सरकार द्वारा लागु किये गए अधिनियम में कुल 10 धाराएँ हैं। जिनके विषय में हम यहां विस्तार से जानेंगे।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 कब लागू हुआ

 01 जुलाई 1961

· उद्देश्य:- दहेज लेने और देने के अभ्यास को रोकना तथा इसके संबंध में नियम बनाना।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 विभिन्न धाराएँ

· धारा-01:- संक्षिप्त नाम प्रारंभ और विस्तार

 संक्षिप्त नामदहेज प्रतिषेधअधिनियम, 1961

 प्रारंभ/लागू –01 जुलाई 1961

 विस्तार –संपूर्ण भारत पर

· धारा-02:- दहेज (Dowry) की परिभाषा

(क) विवाह के एक पक्ष द्वारा विवाह के दूसरे पक्ष

(ख) विवाह के किसी पक्ष के माता-पिता या अन्य व्यक्ति द्वारा विवाह के किसी पक्ष या किसी अन्य व्यक्ति को

(i) विवाह के संबंध में

(ii) विवाह के समय

(iii) विवाह के पूर्व या परश्चात्

(iv) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दी जाने वाली या प्रतिज्ञा की गयी कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति (कीमती सामान) दहेज कहलाता है।

 किन्तुà मुस्लिम विधि में दिया गया मेहर दहेज की परिभाषा में नहीं आता।

· धारा-03:- दहेज लेने या देने के लिए सजा /दंड/शास्ति

 जो कोई इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात्

(i) दहेज लेता है या

(ii) दहेज देता है या

(iii) दहेज लेने या देने के लिए किसी को उकसाता (भडकाता) है वह है-

 05 वर्ष का कारावास और 15000/- जुर्माना या दहेज के मूल्य की राशि से जो भी अधिक हो से दंडनीय होगा।

 परंतु न्यायालय:- विशेष कारणों से जो निर्णय में लिखे जाएगें 5 वर्ष से कम का कारावास भी दे सकता है।

 विवाह के समय वर या वधू को बिना मांग की गई भेंट इस धारा के अंतर्गत दंडनीय नहीं होगी।

· धारा-04:- दहेज माँगने के लिए दंड/सजा/शास्ति (Penalty for Demanding Dowry)

 यदि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वर या वधू के माता-पिता या अन्य रिश्तेदार या अभिभावक दहेज माँगता है तो

 न्यूनतम:- 6 माह का कारावास

 अधिकतम:- 2 वर्ष का कारावास और

 10,000/- जुर्माना

 परन्तु:- न्यायालय पर्याप्त और विशेष कारणों से जो निर्णय में लिखने पड़ेंगे 6 माह से कम का कारावास भी दे सकता है।

· धारा-4:- विज्ञापन पर पाबंदी (Ban on Advertisement)

 यदि कोई व्यक्ति

(क) समाचार पत्र के माध्यम से किसी विज्ञापन के द्वारा या किसी पत्रिका या अन्य माध्यम से अपने पुत्र या पुत्री या अन्य रिश्तेदार के विवाह के उपलक्ष में कोई धन या सम्पत्ति देने का प्रस्ताव करता है।

(ख) या इस प्रकार का कोई विज्ञापन मुद्रित प्रकाशित या प्रचारित करता है तो वह

 न्यूनतम:- 6 माह का कारावास

 अधिकतम–5 वर्ष का कारावास और 15,000/- जुर्मान से दंडनीय होगा।

 परंतु à न्यायालय पर्याप्त और विशेष कारणों को निर्णय में लिखते हुए 6 माह से कम का कारावास भी दे सकता है।

· धारा-05:- दहेज लेने और देने का करार शून्य होगा। (Agreement for giving or taking Dowry to be void)

 चूँकि दहेज लेना व देना अपने आप में एक अपराध है अत: दहेज लेने और देने के संबंध में किया गया करार (Agreement) भी शून्य (Void) होगा।

· धारा-06:- दहेज का पत्नी या उसके उत्तराधिकारियों के लाभ के लिए होना।

 जहाँ दहेज उस स्त्री के अतिरिक्त जिसके विवाह के संबंध में वह दिया जाता है अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त किया जावे तो वह व्यक्ति उसे उस स्त्री को निम्नलिखित अवधि में हस्तांतरित करेगाà

(क) यदि दहेज विवाह के पूर्व प्राप्त किया गया था तो विवाह के 3 माह के भीतर

(ख) यदि दहेज विवाह के समय या पश्चात् प्राप्त हुआ था तो इसकी प्राप्ति की दिनांक से 3 माह के भीतर

(ग) यह दहेज तब प्राप्त हुआ था जब स्त्री अवयस्क थी उसके द्वारा 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेने के 3 माह के भीतर।

और ऐसे हस्तातंरण तक वह व्यक्ति दहेज को न्यास (Trust) के रूप में स्त्री के लाभ हेतु धारण करेगा।

यदि कोई व्यक्ति उक्त 3 माह की अवधि में दहेज स्त्री को हस्तांतरित नहीं करता है तो

 न्यूनतम–6 माह का कारावास

 अधिकतम–2 वर्ष का कारावास या

 न्यूनतम – 5000/- जुर्माना

 अधिकतम–10,000/- जुर्माना या दोनो से दंडनीय होगा।

यदि वह स्त्री दहेज प्राप्त करने से पहले मर जाती है तो उस स्त्री के वारिस संपत्ति या दहेज पाने के हकदार होंगे।

परंतु जहाँ ऐसी स्त्री की उसके विवाह के वर्षों के भीतर प्राकृतिक कारणों के अलावा अन्य किसी कारण से मृत्यु हो जीती है तो ऐसी सम्पत्ति

(क) यदि उसकी संतान है तो संतानों को अंतरित होगी।

(ख) और यदि संतान नहीं है तो उसके माता–पिता को अंतरित होगी।

· धारा-07:- अपराधों का संज्ञान

 (Cognizance of Offences)

(क) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा।

(ख) कोई न्यायालय इस अधिनिय के अधीन निम्न परिस्थितियों में अपराध का संज्ञान लेगा-

 (i) स्वयं की जानकारी या ऐसे अपराध के गठन    करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट या

 (ii) अपराध द्वारा व्यथित व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति के   माता या पिता या अन्य रिश्तेदार द्वारा या किसी मान्यताप्राप्त कल्याण संस्था द्वारा परिवाद किये जाने पर।

· धारा-08:- अपराधो का संज्ञेयअजमानतीय और अशमनीय होना।

 इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध संज्ञेय अजमानतीय और अशमनीय होते है।

अपराध की प्रकृति (Nature):-

क्र.अपराध की प्रकृतिपरिभाषा
1.संज्ञेय अपराध(Cognizable offence)ऐसे अपराध जिसमें पुलिस अधिकारी बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है।
2.असंज्ञेय अपराध(Non-Cognizable offence)ऐसे अपराधि जिसमें पुलिस अधिकारी बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकता
3.जमानतीय अपराध(Bailable offence)ऐसे अपराध जिसमें अधिकार स्वरुप जमानत की माँग की जा सकती है।
4.अजमानतीय अपराध(Non- Bailable offence)ऐसे अपराध जिसमें अधिकार स्वरूप जमानक की मांग नहीं कर सकते। जमानत देना या न देना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है।
5.शमनीय अपराध(Compoundable offence)ऐसे अपराध जिसमें राजीनामा (Compromise) हो सकता है
6.अशमनीय अपराध(Non- Compoundable offence)ऐसे अपराध जिसमें राजीनामा (Compromise) नहीं हो सकता।
7.समन मामला (Summon Case)ऐसे अपराध जिसमें 2 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान होता है।
8.वांरट (Warrant Case)ऐसे अपराध जिसमें 2 वर्ष से अधिक के कारावास का प्रावधान होता है

· धारा 8A-कुछ दशाओ में प्रमाण भार (सबूत का भार) (Burden of Proof)

 जहाँ किसी व्यक्ति पर धारा 3 के अन्तर्गत दहेज लेने और देने या दुस्प्रेरित करने तथा धारा 4 के अन्तर्गत दहेज माँगने का आरोप है उसे यह सिद्ध करना पड़ेगा कि उसने इन धाराओं के अधीन अपराध नहीं किया।

· धारा 8B-दहेज प्रतिषेध अधिकारी (Dowry Prohibition Officer)

राज्य सरकार उतनी संख्या में दहेज प्रतिषेध अधिकारी की नियुक्ति करेगी, जितनी वह उचित समझे।

दहेज प्रतिषेध अधिकारीके निम्नलिखित कार्य व शक्तियाँ होती है-

1. यह देखना कि इस अधिनियम के उपबंधो का पालन हो रहा है।

2. दहेज लेने या देने या उसका दुस्प्रेरण करने तथा दहेज माँगने का निवारण करना।

3. इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाले व्यक्तियों के अभियोजन के लिए साक्ष्य एकत्रित करना।

4. अन्य अतिरिक्ति कार्य करना जो राज्य सरकार द्वारा सौपें जाए।

 राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा पुलिस अधि कारी को भी द हेज प्रतिषेध अधिकारी की शक्तियाँ दे सकती है।

राज्य सरकार दहेज प्रतिषेध अधिकारी को कार्यों में सलाह व सहायता करने के लिए 5 समाज कल्याण कार्यकर्ताओं (जिनमें कम से कम 2 महिलाएँ होगी) से मिलाकर एक सलाहकार बोर्ड का गठन करेगी।

· धारा 9-नियम बनाने की शक्ति

केन्द्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधि नियम के पालन के लिए नियम बना सकेगी।

· धारा 10-राज्य सरकार के नियम बनाने की शक्ति

राज्य सरकार शसकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के पालन के लिए नियम बना सकेगी।

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Faq

दहेज प्रतिषेध अधिनियम कब लागू किया गया?

दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।

दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धारा 3 क्या है?

 जो कोई इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात्
(i) दहेज लेता है या
(ii) दहेज देता है या
(iii) दहेज लेने या देने के लिए किसी को उकसाता (भडकाता) है वह है-
 05 वर्ष का कारावास और 15000/- जुर्माना या दहेज के मूल्य की राशि से जो भी अधिक हो से दंडनीय होगा।

रामप्रसाद RpscGuide में कंटेंट राइटर हैं। रामप्रसाद को पढ़ाई का जुनून है। उन्हें लेखन, करियर, शिक्षा और एक अच्छा कीबोर्ड पसंद है। यदि आपके पास कहानी का कोई विचार है, तो उसे [email protected] पर एक मेल भेजें।

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