ऊर्जा संरक्षण का नियम (सिद्धांत) क्या है? किसने दिया, निबंध law of energy conservation in hindi

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ऊर्जा संरक्षण क्या है :-

ऊर्जा संरक्षण का अर्थ इसके उच्चारण से ही स्पष्ट होता है कि “ऊर्जा का संरक्षण (बचाव)” अर्थात ऊर्जा को इस प्रकार उपयोग में लिया जाए की व्यय होने वाली ऊर्जा की मात्रा कम से कम हो । यानी ऊर्जा का अधिक से अधिक बचाव करना ही ऊर्जा संरक्षण है।

और बचाव करने में प्रयुक्त उपाय विधियों को है ऊर्जा संरक्षण के उपाय कहते है।

भौतिक विज्ञान में प्रमुख तय प्रचलित ऊर्जा संरक्षण का नियम (सिद्धांत) के बारे में जानते है।

ऊर्जा संरक्षण का नियम (सिद्धांत) क्या है?

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी जैम्स प्रैसकोट जूल ने ऊर्जा का संरक्षण नियम (सिद्धांत) को सबसे पहले प्रयोगात्मक रूप से प्रतिपादित किया था।

यह ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत मुख्यत ऊर्जा रूपांतरण सिद्धांत पर आधारित है। अर्थात ऊर्जा का एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण (बदलना)।

ऊर्जा संरक्षण का नियम :-

“इस नियम के अनुसार, ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित हो सकती है, न तो इसकी उत्पत्ति की जा सकती है और न ही विनाश(नष्ट)।”

अर्थात ऊर्जा सदैव अचर रहती है ऊर्जा को न तो उत्पादित किया जा सकता है और ना ही ख़तम (नष्ट)। ऊर्जा को सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है।

जैसे:- पंखे में विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदला जाता है।

ऊर्जा संरक्षण का नियम किसने दिया :-

ऊर्जा संरक्षण का प्रतिपादन प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी जैम्स प्रैसकोट जूल ने किया

अर्थात इन्होंने ही ऊर्जा संरक्षण का नियम दिया था।

ऊर्जा संरक्षण का सूत्र ( फॉर्मूला) :-

K1 + U1 = K2 + U2

यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम :-

संरक्षी बलो (Conservative Forces) के लिए किसी कण अथवा यांत्रिक निकाय का ऊर्जा फलन अथवा गतिज और स्थितिज ऊर्जाओं का योग नियत रहता है। इस सिद्धांत को हम ऊर्जा संरक्षण का नियम कहते है।

कार्य – ऊर्जा प्रमेय से किसी बल द्वारा किया गया कार्य गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है।

∆W = ∆K ….समी.(1)

बल के विरूद्ध किया गया कार्य स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि के बराबर होता है अर्थात

-∆W = ∆U …..समी. (2)

समी. (1) व (2)

∆K = -∆U

∆K + ∆U = 0

K + U = नियतांक …..समी.(3)


ऊर्जा संरक्षण के प्रकार/ रूप

(1) विद्युत ऊर्जा संरक्षण का नियम :-

विद्युत ऊर्जा संरक्षण का नियम इस प्रकार है विद्युत ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और ना ही सृजन। इसको एक रूप से दूसरे रूप में प्रवर्तित किया जा सकता है।

जैसे :- हिटर में विद्युत ऊर्जा को ऊष्मिय ऊर्जा में बदला जाता है।

ऊर्जा संरक्षण के उदाहरण :-

(i) मुक्त रूप से गिरता हुआ पिंड :-

माना m द्रव्यमान का एक पिंड पृथ्वी तल से h ऊंचाई पर विरामावस्था में है। इस अवस्था में पिंड की

कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा

= 0 + mgh = mgh

अब मान लो पिंड को उसकी स्थिति से s दूरी से नीचे गिराया जाता है। गति के तीसरे समीकरण से पिंड में उत्पन्न वेग

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ऊर्जा संरक्षण का चित्र

स्पष्ट है कि तीनों स्थितियों में मुक्त रूप से गिरने वाले पिंड के मार्ग में प्रत्येक बिंदु पर पिंड की संपूर्ण ऊर्जा का योग नियत रहता है। उपरोक्त विवेचन में यह मान लिया गया है। की पिंड पर क्रियाशील रोधक बल जैसे घर्षण इत्यादि नगण्य है। चित्र में गिरते हुए पिंड की गतिज ऊर्जा K तथा स्थितिज ऊर्जा स्पष्ट है कि पृथ्वी तल पर पिंड की कुल ऊर्जा E उसकी गतिज ऊर्जा के बराबर होती है।

विशेष स्थिति :-

जब वस्तु पृथ्वी से टकराकर यकायक रुक जाती है तो उसकी गतिज ऊर्जा, ऊष्मा, ध्वनि तथा प्रकाश में बदल जाती है। इस प्रकार पृथ्वी से टकराने पर पिंड की संपूर्ण गतिज ऊर्जा का क्षय हो जाता है परन्तु यह नवीन रूप से प्रकट होती है।

(2) प्रत्यास्थ स्प्रिंग में ऊर्जा संरक्षण :-

माना कि m द्रव्यमान का एक पिंड एक घर्षण रहित चिकने धरातल पर स्थित है यह एक पिंड द्रव्यमान रहित स्प्रिंग के एक सिरे से जुड़ा है।

जब पिंड को xm दूरी तक विस्थापित किया जाता है तब इसकी स्थितिज ऊर्जा =1/2 kxm2

जब पिंड को xm स्थिति से मुक्त किया जाता है तब पिंड साम्यावस्था की स्थिति x=0 पर पहुंचता है जहां इसका वेग अधिकतम होता है। इस स्थति में संपूर्ण स्थितिज ऊर्जा, गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। गतिशीलता के जड़त्व के कारण पिंड x = 0 स्थिति को पार कर जाता है। तथा स्थिति में स्प्रिंग बल पिंड को पुन x=0 स्थिति को विस्थापित करता है।

उर्जा संरक्षण का महत्व :-

जैसा कि आपको पता है ऊर्जा दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली संसाधन है। मानव को अपने दैनिक जीवन में प्रत्येक कार्य के लिए ऊर्जा ही सहायक है। अत ऊर्जा का संरक्षण आवश्यक है।

दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली विद्युत उर्जा के उत्पादन के संसाधन सीमित मात्रा में है इसलिए इसका संरक्षण ही इसका उत्पादन है।

भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए भी ऊर्जा का होना आवश्यक है।

ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001

भारत सरकार ने ऊर्जा संरक्षण के लिए एक अधिनियम पारित किया जो 2001 में लागू हुआ।

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