राजस्थान के प्रमुख महल | निर्माणकर्ता, इतिहास नोट्स | JAIPUR KA HAWA MAHAL

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राजस्थान के प्रमुख महल | निर्माणकर्ता, इतिहास PDF नोट्स | JAIPUR KA HAWA MAHAL

इस लेख में राजस्थान के प्रमुख महल के बारे में बताय गया है। और उनका निर्माण किसने कसने कराया और इतिहास की भी जानकारी दी गयी है।
राजस्थान के प्रमुख महल राजस्थान गक का महत्त्व पूर्ण अध्याय है ,इस से विभि प्रतियोगी परीक्षाओ में राजस्थान के प्रमुख महल से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते है

जयपुर के प्रमुख महल

  • आमेर का महल : आमेर की मावठा झील के पास की पहाड़ी पर स्थित, कछवाहा राजा मानसिंह द्वारा 1592 में
    निर्मित यह महल हिन्दु-मुस्लिम शैली के समन्वित रूप है।
  • शीशमहल : ‘दीवाने खास‘ नाम से प्रसिद्ध आमेर स्थित जयमन्दिर (मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा निर्मित) एवं जस (यश) मंदिर
    जो चूने और गज मिट्टी से बनी दीवारों और छतों पर जामिया कांच या शीशे के उत्तल टुकड़ों से की गयी सजावट के कारण शीशमहल कहलाते हैं।
    महाकवि बिहारी ने इन्हें दर्पण धाम कहा है।
    शीशमहल के दोनों ओर के बरामदों के रोशनदानों में धातु की जालियां काटकर बनाये हुए राधा-कृष्ण-गोपिकाओं
    में भी रंगीन कांच के टुकड़े लगाकर कलात्मक साज-सज्जा की गयी है।
  • सिटी पैलेस (राजमहल) : जयपुर के सिटी पैलेस में स्थित चाँदी के पात्र (विश्व के सबसे बड़े) तथा बीछावत पर बारीक काम (सुई से बना चित्र) विश्व प्रसिद्ध है।
    यह जयपुर राजपरिवार का निवास स्थान था।
    सिटी पैलेस में प्रवेश के लिए सात द्वार बने हुए हैं किन्तु सबसे प्रमुख उदयपोल द्वार है जिसे 1900 ई. में महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय ने बनवाया।
    इस पूर्वी प्रवेश द्वार को सिरह-ड्योढ़ी कहते हैं।
    यहाँ स्थित इमारतों में चन्द्रमहल, मुबारक महल, सिलहखाना, दीवाने-आम, दीवाने खास, पोथीखाना विशेष प्रसिद्ध हे।
    यहाँ स्थित दीवाने आम में महाराजा का निजी पुस्तकालय (पोथीखाना) एवं शास्त्रागार है।
मुबारक महल :
  • सिटी पैलेस में स्थित मुबारक महल का निर्माण सवाई माधोसिंह (1880 से 1922 ई.) ने करवाया था।
    इसका निर्माण अतिथियों के ठहरने के लिये करवाया गया था। बाद में इसमें महकमा खास खोला गया है।
    जयपुर सफेद संगमरमर एवं अन्य स्थानीय पत्थरों की सहायता से निर्मित यह आकर्षक भवन हिन्दू स्थापत्य कला का आदर्श नमूना हे।
    अब इसकी ऊपरी मंजिल में जयपुर नरेश संग्रहालय का वस्त्र अनुभाग है। एक समय का स्वागत महल आज एक अनुपम वस्त्राालय बन गया है
    आज यहाँ राजस्थानी शैली के विभिन्न प्रकार के वस्त्र व वेषभूषा देखने को मिलती है।
हवामहल :
  • 1799 ई. में सवाई प्रतापसिंह ने इस पाँच मंजिल की भव्य इमारत का निर्माण करवाया। इस इमारत को उस्ताद लालचद कारीगर ने बनाया था।
    कहा जाता है कि प्रताप सिंह भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे इसलिए इसका निर्माण मुकुट के आकार में करवाया।
    वर्तमान में इसे राजकीय संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है।
    राजकीय संग्रहालय का आंतरिक प्रवेश द्वार ‘आनन्द पोल‘ 18वीं शताब्दी के अंतिम चरण के प्रासाद स्थापत्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • हवामहल की पहली मंजिल ‘शरद मंदिर‘, दूसरी ‘रत्न मंदिर‘, तीसरी ‘विचित्र मंदिर‘, चौथी मंजिल ‘प्रकाश मंदिर‘
    और पाँचवी मंजिल ‘हवा मंदिर‘ के नाम से जानी जाती है।
    उस जमाने में पर्दा प्रथा का रिवाज था इसलिए हवामहल का निर्माण रानियों के आवास के लिए करवाया गया था
    ताकि वे यहीं रहकर बड़ी चौपड़ पर होने वाली चहल-पहल, गतिविधियों और जुलूस का नजारा कर सके।
सिसोदिया रानी का महल एवं बाग :
  • सवाई जयसिंह द्वितीय की महारानी सिसोदिया ने 1779 में इसका निर्माण करवाया।
    महल में एक मण्डप है जो बरामदों व गैलेरियों से घिरा हुआ है इसके नीचे तहखाने बने हुए हैं
    और सामने ऊँची-नीची छतों से बना हुआ सुन्दर उद्यान है।
  • जलमहल : जयपुर से आमेर के मार्ग पर आमेर की घाटी के नीचे ‘जयसिंहपुरा खोर‘ गाँव के ऊपर दो पहाड़ियों के बीच तंग
    घाटी को बांधकर एवं ‘कनक वृन्दावन‘ एवं ‘फूलों की घाटी‘ के पास स्थित जलमहल (मानसागर झील) का निर्माण
    जयपुर के मानसिंह द्वितीय ने नैसर्गिक सौन्दर्य एवं मनोरंजन के लिए करवाया था।
    जलमहल के बीचों-बीच स्थित सुन्दर राजप्रासाद में कलात्मकता के दर्शन होते हैं।

– सवाई प्रताप सिंह ने सन् 1799 में इसका निर्माण मानसागर तालाब के रूप में करवाया था।
हाल ही में नाहरगढ़ पहाड़ियों से घिरे इस जलमहल का कायाकल्प करने व इसे पर्यटन के हिसाब
से ढालने के लिए सरकार ने 25 करोड़ रुपये स्वीकृत किये हैं।

  • सामोद महल :चौमूं से 9 किलोमीटर दूर स्थित इस महल में शीशमहल एवं सुल्तान महल दर्शनीय है।
    शीशमहल में काँच का काम तथा सुल्तान महल में शिकार के दृश्य तथा प्रणय दृश्यों का अनुपम अंकन किया गया है।
    सम्प्रति यहाँ विभिन्न फिल्मों की शूटिंग होती रहती है।

झुन्झुनूँ

  • खेतड़ी महल : झुन्झुनूँ के 9 महलों के क्षेत्रों में अवस्थित खेतड़ी महल अपने प्रकार का प्राचीन और आकर्षक महल है जिसे खेतड़ी
    के राजा भोपालसिंह ने सन् 1760 में ग्रीष्म ऋतु के विश्राम के लिए बनाया था।
    इनमें पाँच मंजिलों और तीन तरफा महल की सात मंजिली कटोरेनुमा बुर्ज है।
    ऊपर से यह महल मुकुट (ताज) की शक्ल का है। महल में कई बारादरियाँ है जो राजाओं की शान-शौकत की प्रतीक है।
    शेखावाटी में बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध यह महल राजस्थान का दूसरा हवामहल कहलाता है।

कोटा

  • अभेड़ा महल : कोटा के पास चम्बल नदी के किनारे स्थित ऐतिहासिक महल जिसे राज्य सरकार पर्यटक केन्द्र के रूप में विकसित कर रही है।

अजमेर

  • मान महल : आमेर के राजा मानसिंह द्वारा निर्मित जो वर्तमान में होटल सरोवर के रूप में जाना जाता है।

टोंक

  • राजमहल : यह महल बनास नदी के किनारे स्थित है। इस महल के पास बना, डाई और खारी नदियों का संगम है।
    यहीं पर गोकर्णेश्वर महादेव, बीसलदेव का मंदिर है।

बीकानेर

  • लालगढ़ महल : बीकानेर में स्थित बलुए पत्थर से निर्मित इस इमारत का निर्माण गंगासिंह द्वारा अपने पिता लालसिंह की स्मृति में करवाया गया।
    यह इमारत पूर्णतः यूरोपियन शैली पर आधारित है।
    वर्तमान में इसमें अनूप संस्कृत लाइब्रेरी एवं सार्दुल संग्रहालय स्थित है।

श्रीगंगानगर

  • रंगमहल : इस स्थल पर खुदाई का कार्य 1952-54 में डॉ. हन्नारिड़ के नेतृत्व में स्वीडिश दल द्वारा शुरू किया गया।
    यहाँ खुदाई से मिट्टी के बर्तन, आभूषण, पूजा के बर्तन तथा 105 ताँबे की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जो ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से 300 ईस्वी के है।

जोधपुर

  • एक थम्बा महल : मंडोर स्थित ‘प्रहरी मीनार‘ के नाम से प्रसिद्ध तीन मंजिला भवन जिसे महाराजा अजीत सिंह के शासनकाल में निर्मित किया गया।

जैसलमेर

  • बादल महल : जैसलमेर के महारावलों के निवास हेतु बने बादल विलास शिल्प कला का बेजोड़ नमूना है।
    इस इमारत का निर्माण 1884 में सिलावटों द्वारा किया गया जिसे उन्होंने तत्कालीन महारावल वैरीशाल सिंह को भेंट कर दिया।
    बादल विलास में बना पाँच मंजिला ताजिया टावर दर्शनीय है।

डूंगरपुर

  • जूना महल :1500 फीट की ऊँचाई पर 13वीं सदी में निर्मित यह महल आकर्षक भित्ति चित्रों व शीशे के कार्य़ों से अलंकृत है।
    इस महल की नींव महारावल वीर सिंह ने 12वीं सदी के अंत में रखी थी।
  • बादल महल : गैप सागर तालाब में बादल महल स्थित हैं इसका निर्माण महारावल वीरसिंह ने करवाया।
    दुमंजिले बादल महल में 6 गोखड़े व प्रवेश द्वार है।

उदयपुर

  • राजमहल : इस महल का निर्माण राणा उदयसिंह ने करवाया। पिछोला झील के तट पर स्थित इस
    महल को प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने राजस्थान के विण्डसर महल की संज्ञा दी है।
    राजमहल में मयूर चौक पर बने 5 मयूरों का सौन्दर्य अनूठा है।

– यहीं महाराणा प्रताप का वह ऐतिहासिक भाला रखा है जिससे हल्दीघाटी के युद्ध में आमेर के मानसिंह पर प्रताप ने वार किया था।

चित्तौड़गढ़

  • पद्मिनी महल : सूर्यकुण्ड के दक्षिण में तालाब के मध्य में बने स्थित रावल रत्नसिंह की रानी पद्मिनी का महल दर्शनीय है।
  • एक जैसे 9 महल – नाहरगढ़ (जयपुर)
  • इन महलों का निर्माण सवाई माधोसिंह द्वितीय ने करवाया था। इन महलों के नाम सूरजप्रकाश, खुशहाल प्रकाश, जवाहर प्रकाश,
    ललित प्रकाश, चन्द्रप्रकाश, रत्नप्रकाश तथा बसन्तप्रकाश हैं।
    ये महल उनकी 9 पासवानों के लिए बनवाऐ गये थे तथा नाहरगढ़ दुर्ग में स्थित हैं।
  • डीग के जलमहल (डीग) भरतपुर – सर्वप्रथम 1725 ई. में राजा बदनसिंह ने डीग महल का निर्माण करवाया था।
    इसके बाद डीग के जलमहल का निर्माण भरतपुर के जाट राजा सूरजमल ने 1755 से 1765 ई. के बीच में करवाया।
    डीग के महलों में गोपाल महल, सबसे अधिक भव्य व बड़ा है। डीग को जलमहलों की नगरी भी कहा जाता है।
  • उम्मेद पैलेस (जोधपुर) – इस भव्य राजप्रसाद का निर्माण जोधपुर के शासक उम्मेदसिंह ने करवाया था।
    इस महल की नींव 18 नवम्बर, 1928 को रखी गई और यह 1940 में पूर्ण हुआ। यह महल छीत्तर पत्थर से बना होने के कारण छीत्तर पैलेस भी कहलाता है।
    इस महल का निर्माण भीषण अकाल में जनता को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करवाया गया था।
    यह विश्व का सबसे बड़ा रिहायशी महल है।
जसवंत थड़ा (जोधपुर) –
  • मेहरानगढ़ दुर्ग की तलहटी में स्थित इस भवन का निर्माण राजा सरदारसिंह ने राजा जसवंतसिंह की याद में 1906 ई. में करवाया था।
    यह सफेद संगमरमर से निर्मित एक भव्य इमारत है। यह ‘मारवाड़ का ताजमहल/राजस्थान का ताजमहल’ कहलाता है।

सुनहरी कोठी (टोंक) – सुनहरी कोठी का निर्माण का प्रारम्भ 1824 ई. में नवाब वजीउद्दौला खां ने 10 लाख रु. खर्च कर करवाया था।
छत को सोने की परत से ढका गया है।
इस सोने की परत पर बहुरंगी मीनाकारी व कुछ कांच भी लड़े हुए हैं।
इसी कारण यह शीश महल के नाम से भी जानी जाती थी।
इस कोठी की पहली मंजिल टोंक जिले के दूसरे नवाब वजीउद्दौला ने सन् 1834 में करवाया था।
दूसरी मंजिल नवाब मोहम्मद इब्राहीम अली खाँ ने सन् 1870 में बनवाई। इसका सबसे पहले नाम ‘जरनिगार’ रखा गया था।

मुबारक महल (टोंक) –टोंक जिले में सुनहरी कोठी के दायरे में स्थित हैं। जिसमें बकरा ईद के अवसर पर ऊंट की कुर्बानी दी जाती है।
यह महल ऊँट की कुर्बानी के लिए प्रसिद्ध है।

अमली (अबली) मीणी का महल – इस महल का निर्माण कोटा के राव मुकुंदसिंह ने इनकी चहेती पासवान अमली मीणी के लिए करवाया था।
इसे ‘राजस्थान का दूसरा या छोटा ताजमहल’ भी कहा जाता है। कर्नल जेम्स टॉड ने कहा।

जगमन्दिर पैलेस –

यह महल पिछोला झील के मध्य में एक बड़े टापू पर बना हुआ है।
इस महल को महाराणा कर्णसिंह ने बनवाना प्रारम्भ किया था।
जिसको महाराणा जगतसिंह-I द्वारा 1651 में पूर्ण करवाया गया।
इसी जगमन्दिर में शहजादा खुर्रम ने अपने पिता जहाँगीर से विद्रोह करने पर तथा 1857 ई. की क्रान्ति में नीमच से भागे अंग्रेजों ने शरण ली।

जगनिवास महल (लैक पैलेस) – इसका निर्माण महाराणा जगतसिंह द्वारा 1746 ई. में करवाया गया था।
यहाँ की खूबसूरती व सुन्दरता को देखकर शाहजहाँ को ताजमहल बनाने की प्रेरणा मिली थी।

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