प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं? प्रकार, प्रबंधन, PDF [Natural resource in Hindi]

नमस्कार आज हम विज्ञान विषय के महत्वपूर्ण अध्याय में से एक प्राकृतिक संसाधन के विषय में विस्तार पूर्वक अध्ययन करेंगे। इस अध्ययन के दौरान हम जानेंगे की प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं? प्राकृतिक संसाधन क्या है? प्राकृतिक संसाधन के प्रकार , प्राकृतिक संसाधन का प्रबंधन इत्यादि के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे। इस अध्याय से सम्बंधित अन्य बिन्दुओ पर भी ध्यान केंद्रित करते हुवे अध्ययन करेंगे। तो आइये शुरु करते हाँ आज का अध्याय प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं? प्रकार, प्रबंधन, PDF [Natural resource in Hindi]

संसाधन किसे कहते हैं?

ऐसे पदार्थ जो मानव के लिए उपयोगी हो या जिन्हें उपयोगी उत्पाद में रूपांतरित किया जा सके जिनके उपयोग किसी अन्य उपयोगी वस्तु के निर्माण में हो, उन्हें ‘संसाधन’ कहते हैं।

प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं?

प्रकृति से प्राप्त ऐसे उपयोगी संसाधन ‘प्राकृतिक संसाधन’ कहलाते हैं।

प्राकृतिक संसाधन क्या है?

प्रकृति से प्राप्त ऐसे उपयोगी संसाधन ‘प्राकृतिक संसाधन’ कहलाते हैं।

प्राकृतिक संसाधन के प्रकार

प्राकृतिक संसाधन निम्न दो प्रकार के हो सकते हैं-

1. जैविक संसाधन :-

– ये संसाधन प्राकृतिक रूप से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष माध्यम से हरे पादपों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा होते हैं।

– भोज्य पदार्थ, फल, काष्ठ, रबर, तेल, दुग्ध, दुग्ध-उत्पाद, मत्स्य, मांस तथा चमड़ा आदि को जैविक संसाधन कहते हैं।

– जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल व प्राकृतिक गैस) भी जैविक संसाधन है।

2. अजैविक संसाधन :-

– निर्जीव उत्पत्ति वाले प्राकृतिक संसाधन जैसे – खनिज पदार्थ, स्वच्छ जल, शैल, लवण तथा रसायन आदि अजैविक संसाधन कहलाते हैं।

– उपयोग एवं उपभोग होने के बाद पुन: निर्मित होने की क्षमता के आधार पर प्राकृतिक संसाधन दो प्रकार के होते हैं-

 (i) नवीकरणीय संसाधन

 (ii) अनवीकरणीय संसाधन

प्राकृतिक संसाधन किसे कहते हैं? प्राकृतिक संसाधन क्या है? प्राकृतिक संसाधन के प्रकार , प्राकृतिक संसाधन का प्रबंधन

प्राकृतिक संसाधन का प्रबंधन

प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम दक्ष एवं लाभदायक उपयोग ताकि पर्यावरण के माध्यम से गुणवत्तायुक्त मानव जीवन संभव हो सके।

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के विशिष्ट उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

पारिस्थितिकीय संतुलन एवं जीवन सहायक तंत्र का रख-रखाव।

जैव विविधता संरक्षण।

सतत विकास।

1. खनिज प्रबंधन :

– खनिज, स्थल एवं जल मण्डल से प्राप्त अनवीकरणीय संसाधन हैं, जिनकी उपलब्धता एवम् वितरण भी असमान है।

– अमर्यादित खनन एवं अतिदोहन से जहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले खनिज दुर्लभ एवं महँगे हो सकते हैं वहीं अल्पमात्रिक तत्त्वों के भंडार समाप्त हो सकते हैं, अत: निम्नलिखित विधियों द्वारा इनका समुचित प्रबंधन अति आवश्यक है-

 (a) पुन: उपयोग (Reuse)

 (b) कम अवशिष्ट (Low Waste/Reduce)

 (c) प्रतिस्थापन (Substitution)

 (d) पुन: चक्रीकरण (Recycling)

2. वन प्रबंधन :-

– वन स्थल के ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ जैविक समुदाय के अंतर्गत काष्ठीय वनस्पति प्रभावी रूप से पाई जाती है।

– कुछ स्थलीय जैवभार का 90% वनों में ही पाया जाता है।

– वानिकी विज्ञान की वह शाखा है, जिसका संबंध वनों की स्थापना, सुरक्षा, प्रबंधन एवं उपयोग से होता है।

– सिल्विकल्चर, वानिकी की वह शाखा है, जिसका वनीय पादपों की कृषि एवं प्रजनन आदि से होता है।

– विभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियों एवं प्राकृतिक कारणों (जैसे – दावानल) से वन क्षेत्र में कमी, क्षरण व वनों का हटाया जाना अवनीकरण (Deforestation) कहलाता है।

– अवनीकरण के कारण हुए प्रभावों को कम करने हेतु वन संरक्षण एवं प्रबंधन के माध्यम से वनीकरण (Afforestion) किया जाना चाहिए। नष्ट हो चुके वनों के स्थान पर पुन: वनीकरण (Reforestation) किया जाना चाहिए।

– भारत में वर्ष 1950 से ‘वन महोत्सव’ कार्यक्रम के तहत प्रत्येक वर्ष जुलाई एवं फरवरी में राष्ट्रीय स्तर पर वृक्षारोपण किया जाता है। (अर्नब पात्रा एवं K.M. मुंशी की पहल)

– वन संरक्षण का उद्देश्य वन प्रबंधन इस रूप से किया जाना है कि वनों का अधिकतम लाभ प्राप्त करते हुए, भविष्य में भी इनका वर्तमान स्वरूप सतत बना रहे।

– खनिज, स्थल एवं जल मण्डल से प्राप्त अनवीकरणीय संसाधन हैं, जिनकी उपलब्धता एवम् वितरण भी असमान है।

– अमर्यादित खनन एवं अतिदोहन से जहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले खनिज दुर्लभ एवं महँगे हो सकते हैं वहीं अल्पमात्रिक तत्त्वों के भंडार समाप्त हो सकते हैं, अत: निम्नलिखित विधियों द्वारा इनका समुचित प्रबंधन अति आवश्यक है-

 (a) पुन: उपयोग (Reuse)

 (b) कम अवशिष्ट (Low Waste/Reduce)

 (c) प्रतिस्थापन (Substitution)

 (d) पुन: चक्रीकरण (Recycling)

2. वन प्रबंधन :-

– वन स्थल के ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ जैविक समुदाय के अंतर्गत काष्ठीय वनस्पति प्रभावी रूप से पाई जाती है।

– कुछ स्थलीय जैवभार का 90% वनों में ही पाया जाता है।

– वानिकी विज्ञान की वह शाखा है, जिसका संबंध वनों की स्थापना, सुरक्षा, प्रबंधन एवं उपयोग से होता है।

– सिल्विकल्चर, वानिकी की वह शाखा है, जिसका वनीय पादपों की कृषि एवं प्रजनन आदि से होता है।

– विभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियों एवं प्राकृतिक कारणों (जैसे – दावानल) से वन क्षेत्र में कमी, क्षरण व वनों का हटाया जाना अवनीकरण (Deforestation) कहलाता है।

– अवनीकरण के कारण हुए प्रभावों को कम करने हेतु वन संरक्षण एवं प्रबंधन के माध्यम से वनीकरण (Afforestion) किया जाना चाहिए। नष्ट हो चुके वनों के स्थान पर पुन: वनीकरण (Reforestation) किया जाना चाहिए।

– भारत में वर्ष 1950 से ‘वन महोत्सव’ कार्यक्रम के तहत प्रत्येक वर्ष जुलाई एवं फरवरी में राष्ट्रीय स्तर पर वृक्षारोपण किया जाता है। (अर्नब पात्रा एवं K.M. मुंशी की पहल)

– वन संरक्षण का उद्देश्य वन प्रबंधन इस रूप से किया जाना है कि वनों का अधिकतम लाभ प्राप्त करते हुए, भविष्य में भी इनका वर्तमान स्वरूप सतत बना रहे।

PDF [Natural resource in Hindi]

 3. घास स्थल प्रबंधन :-

– घास स्थल ऐसे बायोम हैं, जिनमें घासों एवं शाकों की प्रमुखता होती है, ये शाकाहारी जीवों के लिए चारा उपलब्ध कराते हैं।

– अत्यधिक शाखित रेशेदार जड़ तंत्र (Fibrous root system) के कारण ये अधिक स्थिर होते हैं परन्तु अत्यधिक चराई (Overgrazing), अपरदन (Erosion) एवं भूमि परिवर्तन (Conversion) के कारण घास स्थल नष्ट होते जा रहे हैं।

– निम्नलिखित उपायों द्वारा घास स्थलों का प्रबंधन संभव हैं-

 (a) चराई (Grazing) सीमित मात्रा में।

 (b) उत्पादकता कम करने वाली खरपतवार को हटाना।

 (c) उर्वरता बढ़ाने वाले फलीदार शाक का रोपण।

 (d) वर्षा ऋतु में नए पौधों की वृद्धि के समय चराई पर प्रतिबंध।

 (e) वैज्ञानिक तरीके से कृषि द्वारा मृदा व जल हानि को रोककर।

– विभिन्न घास भूमि बायोम –

 अर्द्ध-शुष्क :-

– स्टेपी – यूक्रेन एवं दक्षिण-पश्चिमी रूस

– वेल्ड – दक्षिण अफ्रीका

– कैम्पोस – ब्राजील

आर्द्र घास भूमि :-

– प्रेयरी – उत्तरी अमेरिका

– पम्पास – दक्षिण अमेरिका

– डाउन्स – ऑस्ट्रेलिया

– कैंटरबरी – न्यूजीलैण्ड

– पुस्टाज – हंगरी

4. मृदा प्रबंधन :-

– भूमि पर ऊपरी मृदा संपूर्ण मृदा का महत्त्वपूर्ण भाग होती है तथा पौधों के लिए पोषक तत्त्वों का स्त्रोत होती है। प्राकृतिक स्त्रोतों (जल, पवन, गुरुत्व) एवं मानवीय क्रियाओं (अवनीकरण व अधिक चराई) से मृदा की ऊपरी सतह की हानि मृदा अपरदन कहलाती है।

– मृदा प्रबंधन के द्वारा निम्नलिखित विधियों द्वारा मृदा अपरदन को रोककर इसका संरक्षण कर मृदा के उपजाऊपन को दीर्घकाल तक बनाए रखा जा सकता है-

 (i) वनीकरण एवं पुनर्वनीकरण

 (ii) फसल चक्रण (Crop Rotation)

 (iii) वैज्ञानिक तरीके से कृषि –

 (a) पट्टीदार कृषि (Strip Farming)

 (b) सीढ़ीदार कृषि (Rerracing)

 (c) कन्ट्रर कृषि (Contour Farming)

 (iv) हरित खाद का प्रयोग।

 (v) शुष्क कृषि।

 (vi) मल्चिंग (Mulching)

5. जल प्रबंधन :-

– सभी जीवों का आवश्यक भाग, कई जीवों का आवास स्थल, वनस्पति एवं जलवायु, बाढ़ एवं सूखे का निर्धारक होने के कारण स्वच्छ जल स्थलीय आवास स्थलों का एक प्रमुख सापेक्ष नवीकरणीय योग्य संसाधन है।

– जनसंख्या वृद्धि, कृषि एवं औद्योगिक कार्यों में व्यर्थ जल, मौसमी अनियमितता, प्रदूषण आदि कारकों से जलीय संसाधन धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं।

– निम्नलिखित उपायों द्वारा जल संरक्षण एवं प्रबंधन किया जाना चाहिए ताकि जलीय स्त्रोतों पर दबाव कम हो सके।

– बाँध एवं संग्राहक (Dams & Resrviors) का निर्माण।

– सिल्ट को हटाना (Desiltation)

– अलवणीकरण (Desalivation)

– नहर निर्माण

– वर्षा जल संचयन (Rain Water Harvesting)

– सिंचाई की विकसित तकनीकों का प्रयोग। जैसे – बूँद सिंचाई/Drip Irrigation, स्प्रिंकलर का प्रयोग

– जल का पुनर्चक्रण।

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महत्वपूर्ण प्रश्न

प्राकृतिक संसाधन कितने प्रकार का होता है?

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प्राकृतिक संसाधन का उदाहरण कौन सा है?

कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस इसके कुछ उदाहरण हैं। 

निष्कर्ष

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