पादप में प्रजनन के चरण/पद एंव महत्त्व | Plant Breeding In Hindi | PDF

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पादप में प्रजनन के चरण/पद एंव महत्त्व | Plant Breeding In Hindi | PDF

इस लेख में हम पादप में प्रजनन के चरण/पद एंव महत्त्व | Plant Breeding In Hindi | PDF के बारे में अध्ययन करेंगे। Plant Breeding In Hindi से सम्बंधित विभिन महत्वपूर्ण प्रश्नो और पीडीऍफ़ नोट्स भी उपलब्ध कराये गए है।

पादप प्रजनन क्या है (What is Palnt Breeding)

  • भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की लगभग 33 प्रतिशत आय तथा समष्टि की लगभग 62 प्रतिशत को रोजगार कृषि से प्राप्त होता है।
    भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् देश के सामने मुख्य चुनौती उसकी बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आहार उत्पादन करना था।
    जैसा कि हमें ज्ञात है कि खेती के लिए सीमित भूमि ही उपलब्ध है।
    भारत को इसी उपलब्ध भूमि से प्रति यूनिट उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास करने होंगे।
  • पारम्परिक खेती-बाड़ी से मनुष्यों तथा पशुओं के भोजन के लिए सीमित मात्रा में जैवमात्रा का उत्पादन होता है।
    अच्छे प्रबंधन के और-तरीकों तथा भूमि का क्षेत्रफल बढ़ने से उत्पादन बढ़ सकता है, परंतु केवल एक सीमा तक।
    सीमा तक उत्पादन को बढ़ाने में पादप प्रजनन ने एक प्रोद्योगिकी के रूप में सहायता की है।

पादप प्रजनन की परिभाषा (Definition Of Plant Breeding in Hindi):-

  • पादप प्रजनन(Plant Breeding In Hindi) पादप प्रजातियों का एक उद्देश्य पूर्ण परिचालन है:
    ताकि वांछित पादप किस्में तैयार हो सकें। यह किस्में खेती के लिए अधिक उपयोगी, अच्छा उत्पादन करने वाली एवं रोग निरोधक होती हैं।
  • प्रतिष्ठित पादप-प्रजनन(Plant Breeding In Hindi) में शुद्ध वंशक्रम का संकरण अथवा क्रासिंग शामिल है,
    जिसके पश्चात् कृत्रिम चयन होता है; ताकि अधिक उत्पादन देने वाले, पोषण देने वाले तथा रोगों के प्रतिरोधी,
    पादपों के वांछनीय रूप को तैयार किया जा सके।
पादप में प्रजनन के चरण/पद एंव महत्त्व | Plant Breeding In Hindi | PDF

पादप प्रजनन के महत्त्व(Importance Of Plant Breeding):-

  • 1960 के मध्य से गेहूँ, तथा धान की बहुत सी उच्च उत्पादन वाली किस्मों का विकास पादप प्रजनन तकनीकों के
    प्रयोग से किया गया।
    परिणामस्वरूप खाद्य उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। यही प्रावस्था सामान्यत: हरितक्रांति के नाम से जानी जाती है।
  • हरित क्रांति काफी हद तक पादप प्रजनन तकनीकों पर गेहूँ, धान, मक्का आदि में अधिक उत्पादन तथा
    रोग निरोधक किस्मों के विकास के लिए आश्रित थी।
  • मानव सभ्यता के आरंभ से हजारों वर्ष पूर्ण से पारंपरिक रूप में पादप प्रजनन पर कार्य चल रहा है।
    पादप प्रजनन(Plant Breeding In Hindi) के बारे में लगभग 9000-11000 वर्षों पूर्व के लिखित प्रमाण आज भी उपलब्ध है।
  • पादप प्रजनन इन लक्षणों को अपनी फसलों में समविष्ठ करने का प्रयास कर रहे हैं –
    • (i) बढ़े हुए फसली उत्पादन तथा उन्नत गुणवत्ता
    • (ii) पर्यावरणीय तनाव (लवणता, अत्यधिक ताप, सुखा) के प्रति सहनशीलता
    • (iii) रोगजनकों (विषाणु, कवक तथा जीवाणु) के प्रति प्रतिरोधकता
    • (iv) पीड़कों के प्रति सहनशीलता।
  • पादप प्रजनन कार्यक्रम अत्यंत सुव्यवस्थित रूप से पूरे विश्व के सरकारी संस्थानों तथा व्यापारिक कंपनियों द्वारा चलाए जाते हैं।

पादप प्रजनन के पद/चरण/विधि(Step Of Plant Breeding in Hindi)

संकरण द्वारा फसल की एक नई आनुवांशिक नस्ल के प्रजनन(BREEDING) में निम्न मूख्य पद होते हैं

(1) परिवर्तनशीलता का संग्रहण :-

  • आनुवांशिक परिवर्तनशीलता किसी भी प्रजनन कार्यक्रम का मूलाधार है।
    आनुवांशिक विभिन्नता कई विधियों से प्राप्त होती है, लेकिन मुख्य विधि पादपों का संग्रहण है। इसमें सम्मिलित है :
    • (1) संवर्धित उन्नत किस्म
    • (ii) उन्नत किस्म जिनका अब संवर्धन नहीं किया जाता
    • (iii) पुरानी स्थानीय या देशी किस्म
    • (iv) पादप प्रजनक द्वारा उत्पन्न किस्म(अवितरित)
    • (vi) फसली जाति से संबन्धित जंगली फसल
  • किसी फसल में उपस्थित समस्त प्रकार के जीन के एलील्स का संग्रहण, जर्मप्लाज्म संग्रहण कहलाता है।

जर्मप्लाज्म का महत्व :-
वन्य जातियों (wild specles) के जर्म प्लाज्म को संरक्षित करना हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वन्य जातिया काटी (insects) |
रोगों (disease) तथा प्रतिकूल परिस्थितियों (unfavourable conditions) के प्रति अत्याधि पारास्थातया (unfavourable conditions)
के प्रति अत्याधिक प्रतिरोधी होती है। इन वन्य जाति प्रतिरोधक जीन का उपयोग हम फसल सुधार (Crop improvement) में कर सकते है।

  • फसल की रोग प्रतिरोधक किस्में उनके जंगली प्रजातियों के साथ काम करवाकर प्राप्त की जा सकती है।
    इन वन्य जातियों के लुप्त होने से आनुवांशिक विविधता (genetic variability) घट जाती है।
    अर्थात जीन पूल विविधता (genetic variability) घट जाती है। अर्थात जीन पूल से इस प्रकार की दुर्लभ जीन की कमी हो जायेगी

(2)जनकों का मूल्यांकन तथा चयन :-

जननद्रव्य (जर्मप्लाज्म) मल्यांकित किए जाते हैं. ताकि पादपों को उनके लक्षणों के वांछनीय सयाजना क साथ आभानधारित किया जा सके।
चयनित पादपों को बहगणित कर उनका प्रयोग संकरण की प्रक्रिया में किया जाता है।
इस प्रकार जहाँ वांछनीय तथा संभव है की शुद्ध वंशक्रम उत्पन्न कर ली जाती है।

(3) चयनित जनकों के बीच पर संकरण :-

वांछित लक्षणों को बहधा दो भिन्न पादपों (जनकों) से प्राप्त कर संयोजित किया जाता है उदाहरणार्थ
एक जनक जिसमें उच्च प्रोटीन गणवत्ता है और अन्य जिसमें रोग निरोधक गण हैं, दोनों के संयोजन की आवश्यकता है।
यह परसंकरण द्वारा संभव है कि दो जनक ऐसे संकर पैदा करें जिससे आनवांशिक वांछित लक्षणों का संगम एक पाध में हो सके। }
वांछित पौधे के परागकण का संग्रहण जिसे नर जनक के रूप में चना गया है तथा उसे मादा पौधे के वर्तिकान पर डालना जिसे मादा जनक के रूप में चुना गया है।
यह काफी कठिन तथा अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया है।
यह भी आवश्यक नहीं है कि संकर वांच्छनीय लक्षणों को संयोजित करे ही।
सामान्यत: कुछ सैकड़ों से हजार क्रॉस में केवल एक में ही वांच्छनीय संयोजन प्रदर्शित होता है।

(4) श्रेष्ठ पुनर्योगज का चयन तथा परीक्षण :-

इसके अंतर्गत संकरों की संतति के बीच से पादप का चयन किया जाता है, जिनमें वांच्छिता लक्षण संयोजित हों।
प्रजनन उद्देश्यों को प्राप्त करने में चयन की यह प्रक्रिया काफी महत्वपूर्ण है।
अत: संतति का वैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
इस चरण के परिणामस्वरूप ऐसे पादप उत्पन्न होते हैं, जो दोनों जनकों में श्रेष्ठ होते हैं (बहुधा एक से अधिक श्रेष्ठ संतति पादप उपलब्ध होता है)।
ये कई पीढ़ियों तक स्वपरागण तब तक करते हैं जब तक कि समरूपता की अवस्था नहीं आ जाती।(समयुग्मजता)।
जिससे संतति में लक्षण विसंयोजित नहीं हो पाते।

(5) नयी किस्मों का परीक्षण, निर्मुक्त होना तथा व्यापारीकरण :-

नव चयनित वंशक्रम का उनके उत्पादन तथा अन्य गुणवत्ता वाली शस्यी विशेषकों, रोगप्रतिरोधकता आदि गुणों के आधार पर मूल्यांकित किया जाता है।
मूल्यांकित पौधों को अनुसंधान वाले खेतों में जहाँ उन्हें आदर्श उर्वरक प्राप्त हो रहे हों,
उन्हें सिंचाई का पानी मिल रहा हो तथा अन्य समुचित शस्य प्रबंधन आदि उपलब्ध हों, वहाँ पैदा किया हैजाता है
तथा उसमें उपर्युक्त गुणों का मूल्यांकन किया जाता है।

अनुसंधानिक खेत में मूल्यांकन के बाद पौधों का परीक्षण देश भर में | किसानों के खेत में कई स्थानों पर, कम से कम तीन ऋतुओं तक किया जाता है।
इन स्थानों में सभी शस्य खंडों का निरूपण होनी चाहिए, जहाँ सामान्यत: खेती होती है।
उपरोक्त विधि से उत्पन्न शस्य की तुलना सर्वोत्तम उपलब्ध स्थानीय शस्य कंषणों से चेक या संदर्भ करते के बाद मूल्यांकित करना चाहिए।
भारत में मूल्यांकन का कार्य भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agriculture Research. ICAR) नई दिल्ली में किया जाता है।

अंत में नई शुद्ध वंशक्रम (Pure line). जनसंख्या या आबादी जो की वर्तमान किस्मों से उत्कृष्ट (Superior) होती है उसे नई किस्म के |
रूप में वितरीत कर दिया जाता है।

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महत्वपूर्ण प्रश्न:-

Q.1. पादप प्रजनन क्या है (What is Palnt Breeding)?

आदुनिक तकनीक के द्वारा पादप की वंचित नस्ल प्राप्त करना पादप प्रजन(Plant Breeding) कहलाता है।

Q.2. ICAR का फुल फॉर्म(FULL FORM) क्या है ?

Indian Council of Agriculture Research. ICAR

Q.3. जर्मप्लाज्म संग्रहण क्या है ?

किसी फसल में उपस्थित समस्त प्रकार के जीन के एलील्स का संग्रहण, जर्मप्लाज्म संग्रहण कहलाता है।

Q.4.पादप प्रजनन के महत्त्व(Importance Of Plant Breeding ?

(i) बढ़े हुए फसली उत्पादन तथा उन्नत गुणवत्ता
(ii) पर्यावरणीय तनाव (लवणता, अत्यधिक ताप, सुखा) के प्रति सहनशीलता
(iii) रोगजनकों (विषाणु, कवक तथा जीवाणु) के प्रति प्रतिरोधकता
(iv) पीड़कों के प्रति सहनशीलता।