राजस्थान के भौतिक प्रदेश एवं विशेषताएँ

नमस्कार आज हम राजस्थान के भूगोल के महत्वपूर्ण अध्याय में से एक राजस्थान के भौतिक प्रदेश के विषय में विस्तार पूर्वक अध्ययन करेंगे तथा साथ ही जानेंगे की राजस्थान का भौगोलिक स्वरुप एवं राजस्थान के प्रमुख भू- आकृतिक प्रदेश एवं उनकी विशेषताएं क्या की हैं। आइये शुरू करते हैं।

भौतिक प्रदेश का तात्पर्य

स्थल मण्डल पर स्थित भौगोलिक उच्चावच (जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, झील, नदियाँ), प्राकृतिक वनस्पति, वन, प्राकृतिक संसाधन आदि का किसी क्षेत्र विशेष के सन्दर्भ में अध्ययन, भौतिक प्रदेश कहलाता है।

भौतिक प्रदेश के विभाजन का आधार

1.  स्थल स्वरूप जैसे पर्वत, पठार, मैदान, मरुस्थल।

2. भौगोलिक दशाएँ जैसे जलवायु, मृदा, प्राकृतिक वनस्पति वर्षा की मात्रा।

3. विशिष्ट आर्थिक लक्षण जैसे खनिज संसाधन, ऊर्जा संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र एवं विकास।

4. कृषि एवं फसल प्रतिरूप।

5. जनसंख्या वितरण, परिवहन के साधन इत्यादि।

राजस्थान के भौतिक प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेशों का सर्वप्रथम वर्गीकरण वर्ष 1968 में प्रो. वी.सी. मिश्रा ने अपनी पुस्तक ‘राजस्थान का भूगोल’ में किया, जिसका प्रकाशन वर्ष 1968 में नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया।

 प्रो.वी.सी. मिश्रा ने स्थल स्वरूप, भौगोलिक दशा, कृषि तथा फसल प्रतिरूप, विशिष्ट आर्थिक लक्षण के आधार पर राजस्थान को सात भौगोलिक प्रदेशों में विभाजित किया

प्रो. वी.सीमिश्रा द्वारा प्रस्तावित भौगोलिक प्रदेश (1966-68)

भौगोलिक प्रदेशजिले
प श्चिमी शुष्क मैदानजैसलमेर, बाड़मेर, दक्षिणी-पूर्वी बीकानेर, पश्चिमी जोधपुर, दक्षिणी-पश्चिमी चूरू तथा पश्चिमी नागौर
अर्द्ध शुष्क प्रदेशजालोर, पाली, नागौर, सीकर, झुंझुनूँ, उत्तरी-पूर्वी चूरू व दक्षिणी-पूर्वी जोधपुर
नहरी क्षेत्रश्रीगंगानगर, पश्चिमी बीकानेर तथा उत्तरी जैसलमेर
अरावली प्रदेशउदयपुर, दक्षिण-पूर्वी पाली, पश्चिमी डूँगरपुर व सिरोही
पूर्वी कृषि औद्योगिक प्रदेशजयपुर, सवाई माधोपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, बूँदी, भरतपुर, अलवर, धौलपुर व कोटा शहर।
दक्षिणीपूर्वी कृषि प्रदेशबाँसवाड़ा, कोटा, चित्तौड़गढ़, झालावाड़ व पूर्वी डूँगरपुर
चम्बल बीहड़ प्रदेशधौलपुर और सवाई माधोपुर
राजस्थान के भौतिक प्रदेश

– सन् 1971 में डॉरामलोचन सिंह ने राजस्थान को भौगोलिक दृष्टि से दो वृहद् प्रदेशों में विभाजित किया था उसके बाद चार उपप्रदेशों तथा 12 लघु प्रदेशों में वर्णन किया है।

क्र.स.    वृहद् प्रदेशउप-प्रदेशलघु प्रदेश
1.राजस्थानI मरुस्थलीयजैसलमेर, बाड़मेरबीकानेर
II राजस्थान बागड़घग्घर, शेखावाटी,नागौर, लूणी
2.राजस्थान पठारIII अरावली पठारउत्तरी, मध्य, दक्षिणी
IV चम्बल बेसिननिम्न चम्बलमध्य चम्बल
राजस्थान के भौतिक प्रदेश

– सन् 1964 में डॉ. हरिमोहन सक्सेना ने  प्रो. तिवारी ने “राजस्थान का प्रादेशिक भूगोल” नामक पुस्तक में उच्चावच एवं भौगोलिक संरचना के आधार पर राजस्थान को चार भौतिक प्रदेशों में विभाजित किया गया

1. पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश (थार का मरुस्थल)

2. अरावली पर्वतीय प्रदेश

3. पूर्वी मैदानी प्रदेश

4. दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश (हाड़ौती का पठार)

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      प्रदेश-आधारमरुस्थलीय प्रदेशमैदानी प्रदेशअरावली पर्वतमालाहाड़ौती पठार
क्षेत्रफल प्रतिशत61%23%9%7%
जनसंख्या40%39%10%11%
जिले12101311
मृदारेतीली/ बलूईजलोढ़/ अवसादीपर्वतीयकाली मिट्‌टी
जलवायुशुष्क व अर्द्धशुष्कआर्द्रउपआर्द्रअतिआर्द्र

1. पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश

–  पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश (थार का मरुस्थलकी उत्पत्ति-  

–  राजस्थान में अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में स्थित विशिष्ट भौगोलिक प्रदेश को पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश (थार का मरुस्थल) के नाम से जाना जाता है।

–  इस प्रदेश की उत्पत्ति नूतन महाकल्प के प्लीस्टोसीन काल में टेथिस सागर के अवशेष के रूप में हुई है।

–  थार के मरुस्थल का विस्तार-

–  थार का मरुस्थल क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में 17 वाँ बड़ा मरुस्थल है।

इस मरुस्थल का विस्तार भारत तथा पाकिस्तान में हैं।

–  थार का मरुस्थल भारत के उत्तर – पश्चिम राज्यों (हरियाणा– पंजाब – गुजरात – राजस्थान) में विस्तृत है।

–  सर्वाधिक विस्तार- राजस्थान

न्यूनतम विस्तार- हरियाणा

–  राजस्थान में थार के मरुस्थल का विस्तार राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 61.11 % (2,09,042 वर्ग किमी.) है

थार मरुस्थल का-

–  अक्षांशीय विस्तार- 250 उत्तरी अंक्षाश से 300 उत्तरी अंक्षाश तक

–  देशान्तरीय विस्तार- 69030′ पूर्वी देशान्तर से 76045’पूर्वी देशान्तर तक

–  थार मरुस्थल की लंबाई- 640 किमी. थार मरुस्थल की चौड़ाई– 300 से 360 किमी.

–  थार के मरुस्थल की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 250 मीटर है जबकि उत्तर-पूर्व की औसत ऊँचाई 300 मीटर तथा दक्षिण की ऊँचाई 150 मीटर है।

–  थार के मरुस्थल का ढाल उत्तरपूर्व से दक्षिणपश्चिम है।

–  प्रशासनिक दृष्टि से थार के मरुस्थल में राजस्थान के 12 जिले अवस्थित है। (श्रीगंगानगरहनुमानगढ़चूरूझुंझुनूँसीकरनागौरजोधपुरपालीजालौरबाड़मेरजैसलमेर, बीकानेर)

–  क्षेत्रफल की दृष्टि से-  सबसे बड़ा मरुस्थलीय जिला- जैसलमेर

सबसे छोटा मरुस्थलीय जिला- झुंझुनू

–  थार मरुस्थल की सीमाएं-

मरुस्थल की सीमाप्रदेश
उत्तरी सीमापंजाब-हरियाणा
दक्षिणी सीमागुजरात
पूर्वी सीमाअरावली प्रदेश
पश्चिमी सीमारेडक्लिफ रेखा

–  थार के मरुस्थल की विशेषताएँ-

–  थार का मरुस्थल क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा भौतिक प्रदेश है।

–  थार का मरुस्थल भारत में स्थित न्यून वायुदाब का केन्द्र है। थार का मरुस्थल भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून को आकर्षित करता है तथा ऋतु चक्र को नियमित करता है।

–  थार का मरुस्थल क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा भौतिक प्रदेश है।

–  राजस्थान में थार का मरुस्थल न्यूनतम जनघनत्व वाला भौतिक प्रदेश है।

–  थार के मरुस्थल का क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में 17वाँ, उपोष्णता की दृष्टि से 9वाँ स्थान है।

–  थार के मरुस्थल का जनसंख्या, जनघनत्व एवं जैव विविधता की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान है इस कारण इसे ‘धनी मरुस्थल’ कहा जाता है।

–  थार के मरुस्थल में परम्परागत ऊर्जा संसाधन (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस) एवं गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधनों (सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बॉयोमास) की संभावना के कारण इसे विश्व का शक्तिगृह’ (World Power House) की संज्ञा दी गई है।

–  थार के मरुस्थल में ग्रीष्म ऋतु में निकलने वाली रेडॉन गैस नमी को अवशोषित कर न्यून वायुदाब केन्द्र का निर्माण करती है जो मानसून को आकर्षित करने में सहायक होती है।

–  थार के मरुस्थल में टर्शियरी कालीन अवसादी चट्‌टानों की प्रधानता है, जिसमें जीवाश्म खनिज (कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ, प्राकृतिक गैस, चूनापत्थर) आदि के भण्डार हैं।

क्षेत्रजीवाश्म खनिज
बाड़मेर  (गुढ़ामालानी)पेट्रोलियम पदार्थ
जैसलमेर (शाहगढ़ सब बेसिन)प्राकृतिक गैस
बीकानेर – नागौर (पूनम क्षेत्र)पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस
जैसलमेर (सोनू क्षेत्र)चूना पत्थर

–  थार के मरुस्थल में रेतीली बलुई मृदा का विस्तार है। मृदा के वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार एन्टीसोल तथा एरिडोसील मृदा पाई जाती है।

–  पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश में सिंचाई का प्रमुख साधन नहरें हैं तथा प्रमुख नहर इंदिरा गाँधी नहर, जिसे ‘मरुगंगा’ की संज्ञा दी गई।

–  थार के मरुस्थल में मरुद्भिद वनस्पति’ (जीरोफाइट्स) पाई जाती है, जिसकें उदाहरण- कंटीली झाड़ियाँ, नागफनी, खजूर, आक, मरुस्थलीय घास प्रमुख हैं।  

 –  थार के मरुस्थल में मुख्यत: खरीफ की फसल का अधिक उत्पादन किया जाता है

–  इस मरुस्थल में 50 सेमी. से कम वर्षा होती है। अत: यहाँ शुष्क एवं अर्द्धशुष्क प्रकार की जलवायु पाई जाती है।

–  लूनी नदी थार मरुस्थल में प्रवाहित होनें वाली मुख्य नदी है। 

–  थार के मरुस्थल से संबंधित महत्त्वपूर्ण बिंदु

–  थली – थार के मरुस्थल का स्थानीय नाम।

–  धोरे– मरुस्थल में पाई जाने वाली रेतीली बलुई मृदा से निर्मित लहरदार स्थलाकृति को स्थानीय भाषा में धोरे कहा जाता है।

–  लू– थार के मरुस्थल में ग्रीष्म ऋतु में चलने वाली गर्म एवं शुष्क पवनजो स्थानीय गर्म पवन का उदाहरण है।

–  स्थानीय पवन- तापमान तथा वायुदाब में विषमता के कारण किसी स्थान विशेष से चलने वाली पवनें स्थानीय पवनें दो प्रकार की होती हैगर्म एवं ठण्डी।

–  भभूल्याथार के मरुस्थल में आकस्मिक आने वाले वायु के चक्रवात को स्थानीय भाषा में भभूल्या कहा जाता है।

–  चक्रवात– ग्रीष्म ऋतु में केन्द्र में अधिक तापमान एवं निम्न वायुदाब के कारण पवन तीव्रगति से परिधि (बाहर) से केन्द्र की ओर गति करती है तथा गर्म होकर ऊपर उठती हैइस अवस्था को चक्रवात कहा जाता है।

–  मावठ– थार के मरुस्थल में शीत ऋतु में भूमध्य सागरीय पश्चिमी विक्षोभों से होने वाली वर्षा मावठ कहलाती है।

–  मावठ रबी की फसल (गेहूँ) के लिए अधिक उपयोगी है इस कारण महावट (मावठ) को गोल्डन ड्रॉप्स (सुनहरी बूँदें) कहा जाता है।

–  पुरवईया– ग्रीष्मकालीन दक्षिण पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा में आने वाली मानसूनी हवाओं को स्थानीय भाषा में पुरवईया कहा जाता है।

–  पुरवईंया राजस्थान में अधिकांश जिलों में 90% वर्षा करती हैं।

–  रन– बालुका स्तूपों के मध्य स्थित दलदली क्षेत्र रन/टाट/तल्ली/ अभिनति कहलाता है। राजस्थान में सर्वाधिक रन जैसलमेर में है।

         जैसे -पोकरण, बरमसर, कानोत, भाकरी, लवा (जैसलमेर) थोब (बाड़मेर), बाप (जोधपुर)

–  ‘थोब‘ रन क्षेत्रफल की दृष्टि से थार के मरुस्थल का सबसे बड़ा रन है।    

–  बॉलसन– प्लाया के सूखने से निर्मित मैदान बॉलसन कहलाता है।

–  राजस्थान में मरुस्थल के प्रकार-

1.  हम्मादा- चट्टानी/पथरीला मरुस्थल – पोकरण (जैसलमेर), फलोदी (जोधपुर), बालोतरा (बाड़मेर)।

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2.  रैग- यह एक मिश्रित मरुस्थल है जो हम्मादा के चारों ओर पाया जाता है। यह जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर में आते हैं।

3.  इर्ग- इसे सम्पूर्ण मरुस्थल व महान मरुस्थल कहा जाता है। इसमें जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, नागौर, चूरू, सीकर, झुंझुनूंक्षेत्र आते हैं।

–  थार के मरुस्थल का वर्गीकरण-

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–  शुष्क रेतीला प्रदेश व अर्द्ध शुष्क रेतीला प्रदेश 25 सेमी. वर्षा रेखा द्वारा विभाजित किया जाता है।

1.  शुष्क रेतीला प्रदेश-

–  यह रेडक्लिफ रेखा व 25 सेमी. समवर्षा रेखा के मध्य विस्तृत प्रदेश है। 25 सेमी. वर्षा रेखा के पश्चिम में स्थित प्रदेश जहाँ 25 सेमी. से कम वर्षा होती है।

–  25 सेमी. वर्षा रेखा शुष्क रेतीले प्रदेश की पूर्वी सीमा का निर्धारण करती है।

(अ) बालुका स्तूप मुक्त प्रदेश-

–  शुष्क रेतीले प्रदेश का वह भाग जहाँ बालुका स्तूप (धोरे) नहीं पाए जाते हैं।

–  इसमें परतदार (अवसादी) चट्टानें पाई जाती है।

–  शुष्क रेतीले प्रदेश का 41.50 प्रतिशत है।

–  बालुका स्तूप मुक्त प्रदेश का विस्तार जैसलमेर (सर्वाधिक), बाड़मेर, जोधपुर में है।

–  लाठी सीरीज, चांदन नलकूप, हम्मादा, आकलगाँव जीवाश्म पार्क और कुलधरा ग्राम।

मगरा-

–  बालोतरा (बाड़मेर) से पोकरण (जैसलमेर) के मध्य स्थित अवशिष्ट पहाड़ियाँ।

लाठी सीरीज-

–  जैसलमेर(पोकरण) से मोहनगढ़ तक 64 किमी. क्षेत्र में फैली एक भूगर्भीय जल पट्टी है।

–  जैसलमेर में ट्रियासिक युगीन अवसादी चट्टानों का जमाव है, जो मीठे जल के पट्टी  स्टील ग्रेड चूना पत्थर के लिए प्रसिद्ध है।

–  लाठी सीरीज में सेवण घास पाई जाती है जो प्रोटीन युक्त घास है। सेवण घास को स्थानीय भाषा में ‘लीलोण’ कहा जाता है।

–  सेवण घास के मैदान में अधात्विक खनिज भण्डार रॉक फॉस्फेट (बिरामानिया) पाया जाता है।

–  सेवण घास के मैदान में सर्वाधिक गोडावन (राज्य पक्षी) निवास करते हैं।

चांदन नलकूप-

–  इसे थार का घड़ा भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ से आस-पास के क्षेत्र में जलापूर्ति होती है।

–  लाठी सीरीज जैसलमेर में चांदन नामक स्थान पर स्थित नलकूप है जो एक भूगर्भीय जल पट्‌टी का उदाहरण है।

आंकल वुड फॉसिल पार्क

 –  जैसलमेर के राष्ट्रीय मरु उद्यान में आंकल गाँव में स्थित जीवाश्म पार्क जहाँ पर जुरैसिक कालीन प्राकृतिक वनस्पति के अवशेष मिले हैं।

ट्रियासिक कालरेंगने वाले जीवों का काल
जुरैसिक कालघने जंगलों का विकास
क्रिटेशियस कालज्वालामुखी क्रियाएं
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कुलधरा ग्राम-

–  बालुका मुक्त प्रदेश में स्थित जैसलमेर का वह गाँव जहाँ से व्हेल मछली या डायनासोर के अवशेष मिले हैं।

–  कुलधरा ग्राम में राजस्थान के पहले कैक्टस गार्डन की स्थापना की गई है।

(ब)  बालुका स्तूप युक्त प्रदेश-

–  इस शुष्क रेतीले प्रदेश में स्थित वह क्षेत्र जहाँ बालुका स्तूपों की प्रधानता पायी जाती है।

–  बालुका स्तूप– थार के मरुस्थल में बालू रेत (रेतीली बलुई मिट्‌टी) से निर्मित लहरदार स्थलाकृति बालुका स्तूप कहलाती है।

–  बालुका स्तूपों के मध्य मार्ग को कारवां (घासी) कहलाता है जहाँ से ऊँटों का समूह गुजरता है।

–  यह बालुका स्तूप युक्त प्रदेश जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, दक्षिणी श्रीगंगानगर क्षेत्र में पाए जाते हैं।

वर्गीकरण के आधार पर बालुका स्तूपों को निम्नलिखित रूपों में दर्शाया गया है-

(i)  अनुदैर्ध्य/पवनानुवर्ती/रेखीय बालुका स्तूप-

–  पवन की दिशा के समांतर या अनुदिश निर्मित होने वाले बालुका स्तूप अनुदैर्ध्य बालुका स्तूप कहलाते हैं।

–  इसे रेखीय बालुका स्तूप भी कहा जाता है।

–  ये जैसलमेर, बीकानेर, सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) क्षेत्र में पाए जाते हैं।

(ii)  अनुप्रस्थ बालुका स्तूप-

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–  पवन की दिशा के लम्बवत् या समकोण पर पवन के मार्ग में अवरोध आने से निर्मित बालुका स्तूप अनुप्रस्थ बालुका स्तूप कहलाते हैं।

–  इन्हें समकोणीय बालुका स्तूप भी कहा जाता है।

–  यह पोकरण (जैसलमेर), बालोतरा (बाड़मेर), नागौर, बीकानेर, जोधपुर क्षेत्र में पाए जाते हैं।

(iii)  बरखान-

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–  वायु भँवर के कारण गतिशील या अस्थिर अर्द्धचंद्राकार बालुका स्तूपबरखान या बरच्छान कहलाता है।

–  यह भालेरी (चूरू), ओसियाँ (जोधपुर), सीकर, झुंझुनू  क्षेत्र में पाए जाते हैं।

(iv)  तारा बालुका स्तूप-

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–  वे बालुका स्तूप जो तारे के समान दिखाई देते हैं तारा बालुका स्तूप कहलाते हैं।

–  इनका निर्माण अनियमित हवाओं द्वारा होता है।

–  यह मोहनगढ़ (जैसलमेर), सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) क्षेत्र में पाए जाते हैं।

(v)  पैराबोलिक बालुका स्तूप-

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–  यह बालुका स्तूप सम्पूर्ण मरुस्थल में पाए जाते हैं।

–  इनकी आकृति परवलयाकार (अर्द्धचंद्राकार) होती है।

–  ये बालुका स्तूप सर्वाधिक बीकानेर जिले में बनते हैं।
(vi)  सब्र काफिज (Shrubs Coppice)-

–  छोटी झाड़ियों के सहारे बनने वाले बालुका स्तूपों को सब्र काफिज कहा जाता है।

–  यह सम्पूर्ण मरुस्थल में पाए जाते हैं। ये सबसे छोटे बालुका स्तूप होते हैं।

–  ये बालुका स्तूप सर्वाधिक बीकानेर जिले में बनते हैं।

(vii) नेटवर्क बालुका स्तूप-

–  हनुमानगढ़ से हरियाणा के मध्य एक श्रृखला में पाए जाने वाले बालुका स्तूप नेटवर्क बालुका स्तूप कहलाते हैं।

(viii) अवरोधी बालुका स्तूप-

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–  अवरोधी बालुका स्तूप किसी अवरोध के कारण बनते हैं।

–  प्लाया झील-

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–  प्लाया से तात्पर्य शुष्क प्रदेशों में उच्च भूमि से घिरी निम्न भूमि (बेसिन) है। यह स्पेनिश भाषा का शब्द है।  

–  थार मरुस्थल में बालुका स्तूपों के मध्य स्थित निम्न भूमि क्षेत्र जहाँ वर्षा जल एकत्रित होने से अस्थायी झील का निर्माण होता है, उन्हें प्लाया झील कहते हैं।

–  राजस्थान में सर्वाधिक प्लाया झीलें जैसलमेर में हैं।

–  खारे जल प्रदेशों मे पायी जाने वाली इन झीलो को ‘सैलीनास कहा जाता है।

–  प्लाया झीलों में अत्यधिक तापमान के कारण वाष्पीकरण होता है परिणामस्वरूप इन झीलों में लवणों की मात्रा में वृद्धि होती है। अत: ये अधिक लवण भूमि वाले क्षेत्र क्षारीय क्षेत्र /कल्लर भूमि कहलाती है।

–  प्लाया को अरब के रेगिस्तान में- खबारी/ममलाहा और सहारा मरुस्थल में शट्ट कहा जाता है।

–  बाप बोल्डर क्ले- हिमानियों द्वारा अवसादों के रूप में जमा किये गयें कंकड़ पत्थरों को बोल्डर क्ले कहा जाता है।

–  बाप क्षेत्र (जोधपुर) में अवस्थित होनें के कारण इस क्षेत्र को बाप बोल्डर क्ले के नाम से जाना जाता है।

 –  नखलिस्तान- मरुस्थलीय क्षेत्रों में (मुख्यत: थार मरूस्थल) में पाया जाने वाला वह क्षेत्र जहाँ जल बेसिन होते हैं, इन जल बेसिनों के चारों और हरियाली विकसित हो जाती है। अत: इन क्षेत्रों को नखलिस्तान के नाम से जाना जाता है।

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2.  अर्द्ध शुष्क प्रदेश-

–  यह प्रदेश पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश (थार मरूस्थल) में स्थित है यहाँ 25-50 सेमी. वर्षा होती है।

–  अर्द्ध शुष्क प्रदेश का विस्तार

–  शुष्क रेतीला मैदान तथा अरावली पर्वतीय प्रदेश के मध्य पाया जाता है।

–  25 सेमी. वर्षा रेखा अर्द्ध शुष्क प्रदेश की पश्चिमी सीमा का निर्धारण करती है।

–  40 सेमी. वर्षा रेखा अर्द्धशुष्क प्रदेश की पूर्वी सीमा का निर्धारण करती है।

–  घग्घर नदी इस प्रदेश की उत्तरी सीमा का निर्धारण करती है।

–  अर्द्ध शुष्क प्रदेश का वर्गीकरण-

–  भौगोलिक संरचना के आधार पर अर्द्ध शुष्क प्रदेशो को निम्नलिखित 4 प्रदेशो मे वर्गीकृत किया गया है-

(1) घग्घर प्रदेश

(2) शेखावाटी प्रदेश

(3) नागौरी उच्च भूमि

(4) गौडवाड़ प्रदेश

(1)  घग्घर प्रदेश-

–  श्रीगंगानगर– हनुमानगढ़ में घग्घर नदी द्वारा निर्मित मैदानी प्रदेश है।

–  यौद्धेय जाति का निवास क्षेत्र होने के कारण प्राचीन काल में यह क्षेत्र यौद्धेय प्रदेश कहलाता था।

–  नाली – हनुमानगढ़ में घग्घर नदी द्वारा निर्मित मैदानी भाग को स्थानीय भाषा में नाली कहा जाता है।

–  घग्घर दोआब प्रदेश-

दोआब- किसी स्थान पर परस्पर मिलने वाली दो नदियों के बीच में स्थित उपजाऊ मैदानी भाग को दोआब कहा जाता है।

–  सतलज व घग्घर नदी के बीच की उपजाऊ भूमि को घग्घर दोआब प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

–  राजस्थान के कृषि विभाग की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार घग्घर दोआब प्रदेश में एक विशेष प्रकार की मिट्‌टी पायी गई है, जिसका नाम ‘रेवेरीना मिट्टी है’।

–  यह मिट्‌टी मुख्यत: श्रीगंगानगर में पाई जाती है एवं रेवेरीना मिट्‌टी में सर्वाधिक गेहूँ का उत्पादन होता है।  

–  सेम की समस्या (जल उत्प्लावन की समस्या)-

–  इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र के आस-पास में भूमिगत जल का रिसाव होता है इस कारण भूपटल (धरातल) की ऊपरी परत दलदली हो जाती है इस कारण मृदा में लवणीयता की मात्रा में वृद्धि होना।

–  राजस्थान में सेम की समस्या से मुख्यत: श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ सर्वाधिक प्रभावित हैं।

–  सेम की समस्या के निराकरण हेतु नीदरलैण्ड के सहयोग से इण्डो डच योजना चलाई जा रही है।

(2)  शेखावाटी प्रदेश-

–  सीकर, झुंझुनू व चूरू के संयुक्त भौगोलिक क्षेत्र को शेखवाटी प्रदेश कहा जाता है।

–  यह प्रदेश राजस्थान के अन्त: प्रवाह या आंतरिक प्रवाह क्षेत्र का भाग है।

–  शेखावाटी प्रदेश की मुख्य नदी कांतली नदी है। (यह नदी पूर्णत: राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी आंतरिक प्रवाह की नदी है।)

–  प्राचीन जलोढ़ मृदा (बांगर) का विस्तार झुंझुनू क्षेत्र में है।

–  शेखावाटी प्रदेश में वर्षा जल संरक्षण-

–  छोटे तालाब को ‘सर’ कहा जाता है।

–  इस प्रदेश के पक्के कुएँ को ‘नाडा’ व कच्चे कुएँ को ‘जोहड़’ कहा जाता है।

–  जोहड़ विकास कार्यक्रम-

–  डॉ. राजेन्द्र सिंह (जोहड़ वाले बाबा) द्वारा प्रारम्भ।

–  शेखावाटी प्रदेश में (मुख्यत: सीकर) वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी।

(3)  नागौरी उच्च भूमि-

–  यह प्रदेश नागौर में 300 से 500 मीटर ऊँचा उच्च भूमि प्रदेश है (यह प्रदेश अरावली पर्वतीय प्रदेश से पृथक उच्च भूमि क्षेत्र है)  

–  नागौरी उच्च भूमि प्रदेश में सोडियम लवणों की अधिकता होने के कारण यहाँ लवणीय झीलें (नमकीन झीलें) सर्वाधिक पायी जाती हैं।

नागौरी उच्च भूमि प्रदेश का वर्गीकरण-

मकराना श्रेणीसफेद संगमरमर का जमाव क्षेत्र (मार्बल)
मांगलोद श्रेणीजिप्सम का जमाव क्षेत्र
जायल श्रेणीफ्लोराइड युक्त जल

–  कूबड़ पट्टी/बांका पट्टी – राजस्थान की कूबड़ पट्टी नागौर-अजमेर की सीमाओं के मध्य पायी जाती है। इस क्षेत्र के जल में फ्लोराइड के आधिक्य से यहां के निवासियों में कुबड़ापन देखने को मिलता है।

 (4)  गौडवाड़ प्रदेश (लूनी बेसिन)-

–  लूनी बेसिन में स्थित ये प्रदेश पाली-जालौर-बाड़मेर-जोधपुर के मध्य स्थित है।

–  छप्पन की पहाड़ियाँ-

–   छप्पन की पहाड़ियां बाड़मेर जिले में स्थित इन पहाड़ियों को नाकोडा पर्वत कहते हैं।          

–  पीपलूद ग्राम – पश्चिमी राजस्थान का माउण्ट आबू पीपलूद ग्राम को कहा जाता है।

–  यहाँ 56 गुम्बदाकार पहाड़ियाँ स्थित हैं, जो बालोतरा (बाड़मेर) से सिवाणा (बाड़मेर) क्षेत्र में स्थित है।

–  जसवंतपुरा की पहाड़ियाँ-

–  यह पहाड़ी जालौर में स्थित है।

–  पश्चिमी राजस्थान की सबसे ऊँची पर्वत चोटी डोरा पर्वत’ है।

–  ग्रेनाइट पर्वत-

–  ग्रेनाइट पर्वत जालौर में स्थित है। अत: जालौर को ग्रेनाइट सिटी कहा जाता है।

2. अरावली पर्वतीय प्रदेश

अरावली पर्वतीय प्रदेश की उत्पत्ति-

–  अरावली पर्वतीय प्रदेश का निर्माण प्री केम्ब्रियन काल खण्ड में हुआ है।

–  निर्माण प्रक्रिया के आधार पर यह वलित पर्वतमाला है।

–  विश्व की प्राचीनतम पर्वतमाला वर्तमान में अवशिष्ट पर्वत के रूप में बची है क्योंकि लम्बे समय से अपरदानात्मक शक्तियाँ यहां कार्य कर रही है।

–  उच्चावच की दृष्टि से अरावली पर्वतमाला भारत के प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश का भाग है।

–  अरब सागर को अरावली का गर्भ गृह कहा जाता है।

अरावली पर्वतमाला का विस्तार–

–  इसका विस्तार भारत के तीन राज्यों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा तथा केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली में है।

–  राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का 80% भाग विस्तृत है।

–  राजस्थान के 13 जिलों में अरावली पर्वतमाला का विस्तार है- सिरोही, उदयपुर, राजसंमद, अजमेर, जयपुर, सीकर, अलवर, झुंझुनु, चितौड़गढ़, पाली, भीलवाड़ा, डुंगरपुर और प्रतापगढ़

–  भारत में अरावली का विस्तार पालनपुर (गुजरात) से रायसीना पहाड़ी (दिल्ली) तक 692 किमी. है।

–  वहीं राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार ब्रह्मखेड़ा (सिरोही) से खेतड़ी (झुन्झुनू) तक 550 किमी. है।

–  अरावली पर्वतीय प्रदेश राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.3% भाग है तथा इसमें लगभग 10% जनसंख्या निवास करती है।

–  राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार – दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व दिशा

–  राजस्थान में अरावली की ऊँचाई तथा चौड़ाई –  उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर

–  राजस्थान में अरावली की सर्वाधिक चौड़ाई- राजसमंद से बाँसवाड़ा के मध्य

–  राजस्थान में अरावली की सर्वाधिक ऊँचाई – राजसमंद से सिरोही के मध्य

–  राजस्थान में अरावली का सर्वाधिक विस्तार –  उदयपुर जिले में

–  राजस्थान में अरावली का न्यूनतम विस्तार – अजमेर जिले में

–  राजस्थान में अरावली की सर्वाधिक ऊँचाई – सिरोही जिले में

–  राजस्थान में अरावली की न्यूनतम ऊँचाई – जयपुर जिले में

–  राजस्थान में अरावली की औसत ऊँचाई – 930 मीटर

अरावली पर्वतीय प्रदेश की विशेषताएँ-

–  अरावली पर्वतमाला उत्पत्ति की दृष्टि से विश्व की प्राचीनतम वलित पर्वत माला है जो उत्तरी अमेरिका की अप्लेशियन पर्वतमाला के समकक्ष है।

–  अरावली पर्वतमाला प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश का भाग है जिसे महान भारतीय जल विभाजक रेखा की संज्ञा दी गई है।

–  उत्पत्ति के समय अरावली की ऊँचाई लगभग 2800 मीटर थी लेकिन अपरदन प्रक्रम के परिणामस्वरूप अरावली वर्तमान में अवशिष्ट पर्वतमाला के रूप में विस्तृत है, जिसकी औसत ऊँचाई 930 मीटर है।

–  अरावली पर्वतीय प्रदेश में धारवाड़ क्रम की ग्रेनाइटनीसक्वार्टजाइट चट्टानों की प्रधानता है। परिणामस्वरूप अरावली धात्विक खनिज संसाधनों जैसे – लौह अयस्कताँबासीसाजस्ताटंगस्टनचाँदी आदि की दृष्टि से समृद्ध प्रदेश है।

–  अरावली पर्वतीय प्रदेश में लाल मृदा (पर्वतीय मृदाइन्सेप्टीसोल) का विस्तार है।  

–  अरावली पर्वतमाला राजस्थान के तीनों अपवाह तंत्र (आंतरिक प्रवाह तंत्र, बंगाल की खाड़ी नदी तंत्र, अरब-सागरीय नदी तंत्र) की अधिकांश नदियों का उद्गम स्थल है।

–  अरावली पर्वतीय प्रदेश में आदिवासी जनजातियों द्वारा मुख्यत: झूमिंग या स्थानांतरित कृषि की जाती है, जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे –

वालरागरासिया जनजाति द्वारा
चिमाताभील जनजाति द्वारा
दजियाभील / डामोर जनजाति द्वारा

अरावली पर्वतीय प्रदेश का वर्गीकरण-

–  अरावली पर्वतीय प्रदेश को ऊँचाई के आधार पर तीन भागों विभाजित किया गया है–

उत्तरी अरावली

मध्य अरावली

दक्षिण अरावली

1.  उत्तरी अरावली-

–  उत्तरी अरावली प्रशासनिक दृष्टि से चार जिलों में विस्तृत है – जयपुरअलवरसीकर, झुंझुनू

–  उत्तरी अरावली की औसत ऊँचाई- 450 मीटर है।

–  अरावली के इस भाग में क्वार्टजाइट और फायलाइट प्रकार की चट्‌टानें पायी जाती है।

–  उत्तरी अरावली की प्रमुख चोटियाँ निम्नलिखित है –

चोटीजिलाऊँचाई (मीटर)
रघुनाथगढ़सीकर1,055
खोहजयपुर920
भरौचअलवर792
बरवाड़ाजयपुर786
बबाईझुंझुनू780
बिलालीअलवर775
बैराठजयपुर704
सरिस्काअलवर677
भानगढ़अलवर649
जयगढ़जयपुर648
नाहरगढ़जयपुर599
बालागढ़अलवर597

–  उत्तरी अरावली पर्वतमाला में कोई दर्रा नहीं है। (दर्रा दो पहाड़ीयों के मध्य स्थित संकीर्ण मार्ग को दर्रा कहा जाता है इसे नाल या घाट के नाम से भी जाना जाता है।)

2.  मध्य अरावली-

–  मध्य अरावली मुख्यत: अजमेर जिले में विस्तृत है।

–  इस भाग की औसत ऊँचाई – 500-700 मीटर

–  अरावली के इस भाग में संगमरमर और माइकाशिष्ट प्रकार की चट्‌टानें पायी जाती है।

–  मध्य अरावली की प्रमुख चोटियाँ निम्नलिखित है –

चोटीजिलाऊँचाई (मीटर)
गोरमजीअजमेर934
टॉडगढ़अजमेर933
तारागढ़अजमेर873
नागपहाड़ीअजमेर795

–  मध्य अरावली के प्रमुख दर्रे निम्नलिखित हैं–

दर्राजिला
बर दर्रापाली
अरनियाअजमेर
सुराघाटअजमेर
पीपलीअजमेर
परवेरियाअजमेर
शिवपुरीअजमेर
झीलवाड़ाअजमेर

नोट– बर दर्रा- पाली (मारवाड़ तथा मेरवाड़ा को जोड़ता है   NH-162 यहीं गुजरता है।)

3.  दक्षिणी अरावली-

–  दक्षिण अरावली पर्वतमाला का विस्तार- राजसमंदसिरोही  उदयपुर जिलों में हैं।

–  दक्षिण अरावली पर्वतमाला की औसत ऊँचाई 900 मीटर है।

–  इस भाग में ग्रेनाइट और नीस चट्‌टाने पायी जाती है।

–  दक्षिण अरावली की प्रमुख चोटियाँ निम्नलिखित है–

चोटीजिलाऊँचाई (मीटर)
गुरुशिखरसिरोही1,722
सेरसिरोही1,597
देलवाड़ासिरोही1,442
जरगाउदयपुर1,431
अचलगढ़सिरोही1,380
कुम्भलगढ़राजसमंद1,224
ऋषिकेशसिरोही1,017
कमलनाथउदयपुर1,001
सज्जनगढ़उदयपुर938
सायराउदयपुर900
लीलागढ़उदयपुर874
नागपानीउदयपुर867
गोगुन्दाउदयपुर840

नोट-

–  राजस्थान में अरावली की सर्वाधिक ऊँची चोटियाँ सिरोही जिले में हैं ।

–  राजस्थान में अरावली की सर्वाधिक चोटियाँ उदयपुर जिले में हैं।

दक्षिणी अरावली पर्वतमाला को पुन: दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-

(a) आबू अरावली 

विस्तार- सिरोही, पाली

सर्वोच्च चोटी– गुरूशिखर (1722 मी. सिरोही)   

(b) मेवाड़ अरावली

विस्तार- उदयपुर, राजसंमद

सर्वोच्च चोटी– जरगा (1431मी. उदयपुर)

–  दक्षिण अरावली के प्रमुख दर्रे निम्नलिखित हैं–

दर्राजिला
स्वरूप घाटपाली
देसूरी की नालपाली
सोमेश्वर दर्रापाली
कामली घाटराजसमंद
गोरम घाटराजसमंद
हाथीगुढ़ा दर्राराजसमंद
केवड़ा की नालउदयपुर
देबारी दर्राउदयपुर
हाथी दर्राउदयपुर
फुलवारी की नालउदयपुर
जीलवा /पगल्या नालउदयपुर

अरावली पर्वतमाला के शिखरों का सर्वोच्च क्रम (अवरोही क्रम)

चोटीजिलाऊँचाई (मीटर)
गुरुशिखरसिरोही1,722
सेरसिरोही1,597
देलवाड़ासिरोही1,442
जरगाउदयपुर1,431
अचलगढ़सिरोही1,380
कुम्भलगढ़राजसमंद1,224
रघुनाथगढ़सीकर1055
ऋषिकेशसिरोही1017
कमलनाथउदयपुर1001
सज्जनगढ़उदयपुर938

–  उड़िया का पठार-

–  सिरोही में स्थित राजस्थान का सबसे ऊँचा पठार जिसकी ऊँचाई 1,360 मीटर है।

–  राजस्थान का सबसे ऊँचा शहर माउण्ट आबू तथा सबसे ऊँची मीठे पानी की नक्की झील उड़िया के पठार पर स्थित है।

–  आबू का पठार–

–  सिरोही में उड़िया का पठार के दक्षिण में स्थित राजस्थान का दूसरा सबसे ऊँचा पठार है जिसकी ऊँचाई 1,295 मीटर है।

–  आबू का पठार एक बैथोलिक संरचना का उदाहरण है।

–  स्थलाकृति की दृष्टि से आबू के पठार को इन्सेलबर्ग की संज्ञा दी गई है।

–  भोराठ का पठार-

–  गोगुन्दा (उदयपुर) से कुम्भलगढ़ (राजसमंद) के मध्य स्थित है जिसकी ऊँचाई 1,225 मीटर है।

–  यह राजस्थान का तीसरा सबसे ऊँचा पठार है जो अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के मध्य जल विभाजक का कार्य करता है।

नोट- उदयपुर की सबसे ऊँची चोटी जरगा भोराठ के पठार पर स्थित है।  

–  मेसा का पठार–  यह पठार चित्तौड़गढ़ में बेड़च तथा गम्भीरी नदियों द्वारा अपरदित पठार है जिसकी उँचाई 620 मीटर है।

–  लसाड़िया का पठार- जयसमंद झील के पूर्व में स्थित उबड़ खाबड़ पठारी क्षेत्र (राजस्थान का सबसे कटा-फटा पठार है।)

–  मानदेसरा का पठार- चित्तौड़गढ़

–  ऊपरमाल का पठार-  बिजौलिया से भैंसरोड़गढ़ के मध्य स्थित पठार क्षेत्र।

–  भोमट का पठार-  उदयपुर – डूँगरपुर – बाँसवाड़ा के मध्य स्थित पठारी क्षेत्र जहाँ भोमट जनजाति निवास करती है।

–  काकनवाड़ी का पठार- अलवर

–  अलवर का भानगढ़ दुर्ग तथा काकनवाड़ी दुर्ग काकनवाड़ी के पठार पर स्थित है।

–  अरावली के प्रमुख पर्वत एवं पहाड़ियाँ-

(i)  गिरवा- उदयपुर के आस-पास पाई जाने वाली अर्द्धचंद्राकार या तश्तरीनुमा पहाड़ियों को स्थानीय भाषा में गिरवा कहा जाता है।

(ii)  भाकर- पूर्वी सिरोही में स्थित तीव्र ढाल वाली पहाड़ियाँ भाकर कहलाती है।

(iii)  मेवल- डूँगरपुर, बाँसवाड़ा के मध्य स्थित पहाड़ियों को स्थानीय भाषा में मेवल कहा जाता है।

(iv)  मगरा- उदयपुर के उत्तर पश्चिम में स्थित अवशिष्ट पहाड़ियाँ मगरा कहलाती है। जैसे – माकड़ का मगरा, बांकी का मगरा, कामन मगरा, लेगा मगरा आदि।

3. पूर्वी मैदानी प्रदेश

उत्पत्ति-

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश का निर्माण नदियों (गंगा तथा यमुना) द्वारा अनवरत किये गये अवसादों के जमाव के उपरान्त हुआ है।

–  इन मैदानी प्रदेशो की उत्पत्ति नूतन महाकल्प के प्लीस्टोसीन काल में हुई।

विस्तार-

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 23.3% है तथा पूर्वी मैदानी प्रदेश का राजस्थान में विस्तार मुख्यत: अरावली पर्वतमाला के पूर्व दिशा में है।

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश में राजस्थान की कुल जनसंख्या का 40% निवास करता है।

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश में राजस्थान के 10 जिले अवस्थित हैं-सवाई माधोपुर – करौली – धौलपुर – भीलवाड़ा– टोंक – भरतपुर –जयपुर – डूँगरपुर – प्रतापगढ़ – बाँसवाड़ा

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश का ढाल दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व दिशा की और है।

विशेषताएं-

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश भारतीय उच्चावच के उत्तरी विशाल (मध्य के विशालमैदान का भाग है वहीं उत्पत्ति के आधार पर (कालक्रम के अनुसार) पूर्वी मैदानी प्रदेश थार के मरुस्थल के पश्चात् दूसरा नवीन प्रदेश है।

–  गंगा तथा यमुना द्वारा लाई गई जलोढ़ मृदा के जमाव से निर्मित होने के कारण पूर्वी मैदानी प्रदेश में जलोढ़ मृदा (एल्फीसोल) का विस्तार है।

–  जलोढ़ (एल्फीसोलमृदा क्षेत्र होने के कारण पूर्वी मैदानी प्रदेश सर्वाधिक उपजाऊ तथा सर्वाधिक कृषि संभावना वाला भौतिक प्रदेश है।

–  खनिज संपदा की दृष्टि से पूर्वी मैदानी प्रदेश राजस्थान का सर्वाधिक निर्धन भौतिक प्रदेश है।

–  राजस्थान की अधिकांश जनसंख्या की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि होने के कारण पूर्वी मैदानी प्रदेश राजस्थान का सर्वाधिक जनघनत्व वाला भौतिक प्रदेश है।

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश की औसत वर्षा 60-80 सेमी. है तथा जलवायु की दृष्टि से उपआर्द्र जलवायु प्रदेश में शामिल है।

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश में सिंचाई का प्रमुख साधन – नलकूप तथा कुएँ है।

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश में मत्स्य औद्योगिक क्षेत्र (अलवर) तथा विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र (जयपुर) में स्थित है।

–  पूर्वी मैदानी प्रदेश का वर्गीकरण-

–  भौगोलिक संरचना के आधार पर पूर्वी मैदानी प्रदेश को निम्नलिखित तीन भागों में वर्गीकृत किया गया हैं-

(i)  चम्बल बेसिन

(ii) बनास-बाणगंगा बेसिन

(iii) माही बेसिन

 (i) चम्बल बेसिन-

–  चम्बल बेसिन की सबसे प्रमुख भौगोलिक विशेषता बीहड़ है।

बीहड़-  

–  चम्बल नदी द्वारा अवनलिका अपरदन से निर्मित उत्खात स्थलाकृति है जिनमें घने जंगल पाए जाते हैं उन्हें बीहड़ कहते हैं।

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–  बीहड़ की चम्बल नदी (कोटा) से यमुना नदी (उत्तर प्रदेश) तक कुल लम्बाई 480 किमी. तथा क्षेत्रफल 4,500 वर्ग किमी. है।

–  राजस्थान में बीहड़ का मुख्यत: विस्तार सवाईमाधोपुर – करौली – धौलपुर में है तथा बीहड़ का सर्वाधिक घनत्व धौलपुर जिले में है, जबकि बीहड़ का सर्वाधिक विस्तार सवाईमाधोपुर जिले में है।

–  करौली को ‘बीहड़ की रानी’ की संज्ञा दी गई है।

–  सवाईमाधोपुर – धौलपुर – करौली जिलों में विस्तृत बीहड़ क्षेत्र में डाकू निवास करते थें। अत: इस कारण इसे ‘डांग प्रदेश’ की संज्ञा दी गई है।

 (ii) बनास-बाणगंगा बेसिन-

–  बनास बाणगंगा बेसिन को चार मैदानी प्रदेशों में विभाजित किया गया है जो निम्नलिखित हैं –

–  रोही का मैदान – जयपुर से भरतपुर के मध्य बाणगंगा तथा यमुना नदियों के मध्य स्थित मैदानी प्रदेश, जिसे ‘रोही दोआब’ प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

–  मालपुरा – करौली मैदान – यह मालपुरा (टोंक) से करौली के मध्य बनास तथा बाणगंगा नदियों के मध्य स्थित दोआब प्रदेश है।

–  खैराड़ प्रदेश – जहाजपुर (भीलवाड़ा) से टोंक के मध्य बनास नदी द्वारा निर्मित मैदान।

–  पीडमान्ट का मैदान – देवगढ़ (राजसमंद) से भीलवाड़ा के मध्य बनास नदी द्वारा निर्मित अवशिष्ट पहाड़ी युक्त मैदानी प्रदेश है।  

 (iii)  माही बेसिन- 

–  राजस्थान के दक्षिणी भाग में माही नदी के आस-पास का क्षेत्र जिसे माही बेसिन के नाम से जाना जाता है को तीन मैदानी प्रदेशों में विभाजित किया गया है जो निम्नलिखित है–

1.  छप्पन का मैदान – प्रतापगढ़ से बाँसवाड़ा के मध्य माही नदी के किनारे स्थित छप्पन गाँवों या नदी नालों का समूह।

2.  कांठल का मैदान – प्रतापगढ़ में स्थित माही नदी का तटवर्ती मैदान।

3.  वागड़ प्रदेश – डूँगरपुर व बाँसवाड़ा के मध्य स्थित माही नदी द्वारा निर्मित विखंडित पहाड़ी क्षेत्र।

नोट– माही बेसिन को प्राचीन काल में पुष्प प्रदेश के नाम से जाना जाता था।

4. दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश

–  राजस्थान के दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश पर प्राचीन काल से ही हाड़ा वंश का क्षेत्राधिकार रहा है। अत: इस प्रदेश को हाड़ौती का पठार के नाम से जाना जाता है।

दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश की उत्पत्ति-

–  दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश (हड़ौती का पठार) की उत्पत्ति क्रिटेशियस काल में गौंडवाना लैण्ड में ज्वालामुखी क्रिया के दरारी उद्गार से निकले लावा के जमाव से हुई है।

दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश (हाड़ौती का पठार) का विस्तार-

–  हाड़ौती का पठार प्रायद्वीपीय पठारी प्रदेश में मालवा के पठार का उत्तरी भाग है, जिसका विस्तार राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में है। अत: इस कारण इसे दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश कहा जाता है।

–  हाड़ौती के पठार का विस्तार राजस्थान के चार जिलों में है- कोटा, बूँदीबाराँझालावाड़

–  हाड़ौती के पठार का क्षेत्रफल 24,185 वर्ग किमी. है जो राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 6.49% है।

–  क्षेत्रफल की दृष्टि से हाड़ौती का पठार राजस्थान का सबसे छोटा भौतिक प्रदेश है।

–  हाड़ौती के पठार में राजस्थान की कुल जनसंख्या का लगभग 10% भाग निवास करता है।

–  हाड़ौती के पठार की औसत ऊँचाई 500 मीटर है तथा ढाल दक्षिण से उत्तर है।

हाड़ौती के पठार की विषेशताएं-

i.    हाड़ौती का पठार अरावली पर्वतमाला तथा विन्ध्याचल के मध्य स्थित एक संक्रांति प्रदेश है जो अरावली-विन्ध्याचल- प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र का भी संक्रमण स्थल है।

ii.   हाड़ौती के पठार में बूँदी से सवाईमाधोपुर के मध्य एक भ्रंश घाटी स्थित है, जिसे महान सीमा भ्रंश या ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट (GBF) की संज्ञा दी गई है।

iii.  हाड़ौती के पठार में ज्वालामुखी के दरारी उद्गार से निर्मित क्रिटेशियस कालीन बैसाल्ट चट्टानों का विस्तार है। इस कारण हाड़ौती के पठार में बलुआ पत्थर तथा एल्युमिनियम के भण्डार पाए जाते हैं।

iv.  हाड़ौती के पठार में ज्वालामुखी क्रिया से निकले लावा के विखण्डन से निर्मित काली मृदा (वर्टीसोल) का विस्तार है।

v.   हाड़ौती के पठार की प्रमुख नदी चम्बल नदी है जो दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती है।

vi.  राजस्थान में सर्वाधिक नदियाँ हाड़ौती के पठार में प्रवाहित होती हैं, जिसमें राजस्थान का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र चम्बल नदी तंत्र भी शामिल है। इस कारण हाड़ौती के पठार में जल द्वारा मृदा अपरदन की समस्या सर्वाधिक है।

vii. राजस्थान में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा हाड़ौती के पठार से प्रवेश करती है।

viii. राजस्थान में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से लगभग 90% वर्षा होती है। इस कारण हाड़ौती का पठार राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा तथा सर्वाधिक आर्द्रता वाला भौतिक प्रदेश है, जहाँ 80 सेमी. से अधिक वर्षा होती है तथा अति आर्द्र जलवायु पाई जाती है।

ix.  हाड़ौती के पठार में मुख्य रूप से सोयाबीन, धनिया, कपास, गन्ना आदि फसलों का उत्पादन होता है।

x.   कोटा को राजस्थान की औद्योगिक नगरी कहा जाता है। इन्द्रप्रस्थ औद्योगिक क्षेत्र कोटा में स्थित है।

xi.  राजस्थान में हाड़ौती के पठार के अन्तर्गत बाराँ जिले में सहरिया जनजाति निवास करती है।

–  उच्चावच के आधार पर हाड़ौती को दो भागों में विभाजित किया गया है

(1) विन्ध्य कगार क्षेत्र

(2) दक्कन का पठार

(1) विन्ध्य कगार क्षेत्र-

–  बनास एवं चम्बल नदियों के मध्य दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व में बलुआ पत्थर निर्मित संरचना विंध्य कगार क्षेत्र कहलाती है।

–  विन्ध्य कगार क्षेत्र का विस्तार कोटाबूँदीबाराँ जिलों में हैं।

–  भौगोलिक संरचना के आधार पर विंध्य कगार क्षेत्र को पाँच उपभागों में विभाजित किया गया है-

(i) अर्द्धचन्द्राकार पहाड़ियाँ-

–  बूँदी की पहाड़ियाँ- बूँदी जिले में स्थित 96 किमी. लम्बी अर्द्ध चन्द्राकार पहाड़ियाँ जिसकी सर्वोच्च चोटी सतूर (353 मीटर) है।

–  मुकुन्दरा की पहाड़ियाँ- कोटा- झालावाड़ में 120 कि.मीटर लम्बी विस्तृत पहाड़ियाँ जो विन्ध्याचल का भाग है। मुकुन्दरा की पहाड़ियों की सर्वोच्च चोटी चाँदबाड़ी (517 मीटर) है।

–  कुण्डला की पहाड़ियाँ- कोटा के आस-पास कुण्डल के आकार की पहाड़ियाँ कुण्डला की पहाड़ियाँ कहलाती हैं।

–  रामगढ़ की पहाड़ियाँ- बूँदी से बाराँ के मध्य स्थित पहाड़ियाँजिसे बूँदी जिले में घोड़े के नाल के आकार की पहाड़ियाँ (हॉर्स-सू) कहा जाता है।

–  रामगढ़ की पहाड़ियाँ पर्यटन की दृष्टि से राजस्थान का पहला जियो हेरिटेज स्थल है।

(ii) नदी निर्मित मैदान-

–  कोटा-बूँदी में चम्बल तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित मैदान

(iii) शाहबाद उच्च भूमि क्षेत्र-

–  बाराँ के पूर्वी क्षेत्र में 450 मीटर उच्च भूमि क्षेत्र जहाँ सहरिया जनजाति निवास करती है, यह क्षेत्र शाहबाद उच्च भूमि क्षेत्र कहलाता है।

–  शाहबाद उच्च भूमि क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी काम्बा (456 मीटर), बाराँ जिले में स्थित है।

(iv) डग-गंगधर के उच्च क्षेत्र-

–  हाड़ौती पठार के इस उपविभाजन के अलावा भी विंध्यन कगार भूमि तथा दक्कन का लावा पठार में विभाजित किया जाता है।

–  दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र, जिसका क्षेत्रफल लगभग 1,430 वर्ग किलोमीटर है। यह क्षेत्र अलग-अलग पहाड़ियों में विस्तृत है।

(v) झालावाड़ का पठार

–  दक्षिणी हाड़ौती क्षेत्र में झालावाड़ का पठार है जो मालवा के पठार का उत्तरी भाग है।

–  इस क्षेत्र की सामान्यत: ऊँचाई 300 से 450 मीटर है। जिसमें छोटी-छोटी पहाड़ियाँ विस्तृत है।

(2)दक्कन का पठार (दक्षिण का पठार)-

–  झालावाड़ जिले में विस्तृत मालवा के पठार के उत्तरी भाग को झालावाड़ के पठार की संज्ञा दी गई है।

–  डग गंगधर प्रदेश- झालावाड़ के दक्षिणपश्चिम में स्थित 350 मीटर उच्च भूमि क्षेत्र डग गंगधर प्रदेश कहलाता है।

–  हाड़ौती के पठार के प्रमुख दर्रे-

1. बूँदी दर्रा

2. जैतवास दर्रा

3. रामगढ़-खटगढ़ दर्रा

4. लाखेरी दर्रा

–  नोट– चारों दर्रे बूँदी जिले में स्थित हैं।

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