राजस्थान के प्रमुख दुर्ग व किले

स्वागत है आपका हमारे इस राजस्थान के नम्बर 1 एजुकेशन प्लेटफार्म पर। आज हम इस लेख में राजस्थान के प्रमुख दुर्ग व किले के विषयो के बारे में अध्ययन करेंगे राजस्थान की विरासत एवं स्थापत्य कला का विस्तार पूर्वक अध्ययन करंगे।

  • राजस्थान में महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश के पश्चात सर्वाधिक दुर्गों का निर्माण हुआ है।
  • राजस्थान में दुर्गों के स्थापना का विकास का प्रथम आधार कालीबंगा की खुदाई में मिलता है।

राजस्थान के प्रमुख दुर्गों की विशेषताएँ

मनुस्मृति के अनुसार दुर्गों की श्रेणियाँ

   1. सुदृढ़ प्राचीरें                2. अभेद्य बुर्जे

   3. विशाल परकोटे            4. दुर्ग के चारों ओर गहरी खाई

   5. दुर्ग के भीतर जलाशय   6. शस्त्रागार

   7. मंदिर निर्माण               8. अन्न भण्डार की स्थापना

   9. सुरंग प्रणाली                10. गुप्त प्रवेश द्वार।

कौटिल्य के अनुसार दुर्ग की श्रेणियाँ :- 04

   1. औदुक दुर्ग      2. पर्वत दुर्ग

   3. धान्वन दुर्ग       4. वन दुर्ग

शुक्र नीति के अनुसार राज्य के अंग :- 07

   1. राजा                            2. अमात्य (मंत्री)

   3. सुहृत                            4. कोष

   5. राष्ट्र                              6. दुर्ग    

   7. सेना

–   राज्य को मानव शरीर का अंग मानते हुए शुक्र नीति के अनुसार दुर्ग को शरीर के प्रमुख अंग ‘हाथ’ की संज्ञा दी है।

शुक्र नीति अनुसार दुर्गों के प्रकार :- 09

(1) एरण दुर्ग :- वे दुर्ग, जिसके मार्ग में खाई, काँटो व पत्थरों से युक्त दुर्गम मार्ग हों।

   उदाहरण :- जालौर दुर्ग

(2) औदुक दुर्ग :- जल दुर्ग भी कहा जाता है। ऐसा दुर्ग जो विशाल जल राशि से घिरा हुआ हो।

   उदाहरण :- गागरोण दुर्ग।

(3) पारिख दुर्ग :- वह दुर्ग, जिसके चारों तरफ बहुत बड़ी खाई हो।

   उदाहरण :- जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर)।

(4) पारिध दुर्ग :- ऐसा दुर्ग जिसके चारों तरफ ईंट, पत्थर तथा मिट्‌टी से बनी बड़ी-बड़ी दीवारों का विशाल परकोटा हो।

   उदाहरण :- चित्तौड़ दुर्ग, जैसलमेर दुर्ग।

(5) गिरि दुर्ग :- किसी उच्च गिरि या पर्वत पर अवस्थित दुर्ग।

   उदाहरण :- चित्तौड़ दुर्ग, मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) आदि।

(6) धान्वन दुर्ग :- मरुभूमि (मरुस्थल) में बना दुर्ग।

   उदाहरण :- जैसलमेर का दुर्ग।

(7) वन दुर्ग :- सघन बीहड़ वनों में निर्मित दुर्ग।

   उदाहरण :- सिवाणा दुर्ग।

(8) सैन्य दुर्ग :- खंडों या ईटों से समतल भूमि पर निर्मित दुर्ग, जहाँ युद्ध की व्यूह रचना में चतुर सैनिक निवास करते हो। इस श्रेणी में लगभग सभी दुर्ग आते हैं।

(9) सहाय दुर्ग (लिविंग फोर्ट):- वह दुर्ग, जिसमें शूरवीर तथा सदा अनुकूल रहने वाले बांधव लोग रहते हो।

    उदाहरण :- जैसलमेर दुर्ग, चित्तौड़ दुर्ग आदि।

–   चित्तौड़ दुर्ग धान्वन श्रेणी के दुर्ग को छोड़कर सभी श्रेणी का दुर्ग है।

–   भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़) तथा भरतपुर का लौहागढ़ दुर्ग मिट्‌टी से बने दुर्ग है।

राजस्थान के 6 दुर्ग यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल –

   1. आमेर दुर्ग                              2. गागरोण दुर्ग

   3. कुम्भलगढ़ दुर्ग                        4. जैसलमेर दुर्ग

   5. रणथम्भौर दुर्ग                         6. चित्तौड़गढ़ दुर्ग।

–   ये दुर्ग जून, 2013 में नोमपेन्ह (कम्बोडिया) में हुई वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी की बैठक में यूनेस्को साइट की सूची में शामिल किये गये।

राजस्थान के दुर्गों पर आक्रमण :-

क्र.स.दुर्गसमयआक्रमणकारीतत्कालीन   शासक
1.भटनेर दुर्ग(हनुमानगढ़)1001 ई.(i) महमूद गजनवी
1398 ई.(ii) तैमूर
1570 ई.(iii) अकबर
2.रणथम्भौर दुर्ग(सवाईमाधोपुर)1301 ई.(i) अलाउद्दीन खिलजीराणा हम्मीर देव चौहान
3.गागरोण दुर्ग(झालावाड़)1423 ई.(i) होशंग शाह (मांडू सुल्तान)अचलदास खींची
1444 ई.(ii) महमूद खिलजीपाल्हणसी
4.चित्तौड़ दुर्ग1303 ई.(i)अलाउद्दीन खिलजीरावल रतनसिंह
1534 ई.(ii) बहादुरशाहविक्रमादित्य
1567-68 ई.(iii) अकबरउदयसिंह
5.जैसलमेर दुर्ग1312-13 ई.(i) अलाउद्दीन खिलजीरावल मूलराज
1351-1388 ई. के मध्य(ii) फिरोज तुगलकरावल दूदा
1550 ई.(iii) अमीर अली (कंधार)लूणकरण
6.सुवर्णगिरि दुर्ग(जालोर)1311(i) अलाउद्दीन खिलजीकान्हड़देव
7.सिवाणा दुर्ग1308 ई.(i) अलाउद्दीन खिलजीसातलदेव
8.शेरगढ़ दुर्ग(धौलपुर)1500 ई.(i) बहलोल लोदी

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

चित्तौड़ दुर्ग

राजस्थान के दुर्ग

–   निर्माता :- चित्रांगद मौर्य (मौर्य राजा) (प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वीर विनोद’ के अनुसार)

–   चितौड़ में गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम पर स्थित दुर्ग।

–   616 मीटर ऊँचे मेसा पठार पर निर्मित दुर्ग। (गिरि दुर्ग)

–   यह दुर्ग राजस्थान के किलों में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा दुर्ग है। (क्षेत्रफल – 28 वर्ग किमी.)

–   यह दिल्ली-मालवा मार्ग पर अवस्थित है।

–   यह दुर्ग ‘धान्वन दुर्ग’ को छोड़कर शेष सभी 8 श्रेणियों में रखा जा सकता है।

–   आकार :- व्हेल मछली के समान।

–   उपनाम :- राजस्थान का गौरव, गढ़ों का सिरमौर, चित्रकूट।

–   इस दुर्ग की परिधि लगभग 13 किलोमीटर हैं।

–   मेवाड़ के गुहिलवंशीय शासक बप्पा रावल ने मौर्य शासक मानमोरी को परास्त कर 734 ई. में इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

–   इस दुर्ग में अदबद्जी का मंदिर, रानी पद्मिनी का महल, गोरा-बादल महल, कालिका माता मंदिर, सुरज कुण्ड, समद्धिश्वर मंदिर, जयमल-फत्ता (पता) हवेलियां, तुलजा माता मंदिर, कुम्भश्याम मंदिर, सतबीश देवरी जैन मंदिर, शृंगार चंवरी जैन मन्दिर एवं नवलखा भण्डार स्थित है।

विजय स्तम्भ

–   दुर्ग के भीतर विजय स्तम्भ भव्य इमारत है।

–   इस विजयस्तम्भ को ’विष्णु स्तंभ’ व ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’भी कहा जाता है।

कुंभा ने 1437 ई. में ‘सारंगपुर युद्ध’में महमूद खिलजी प्रथम को पराजित किया, इस विजय के उपलक्ष मे विजयस्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा द्वारा 1440 ई. से 1448 ई. करवाया।

–   यह 9 मंजिला इमारत है जो 30 फीट चौड़ा और 122 फीट ऊँचा है। इसमें कुल 157 सीढ़ियाँ हैं।

–   इसके चारों और भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की मूर्तियाँ बनी है। सी. वी. वैद्य ने इसे ‘विष्णु स्तंभ’ कहा है, उपेंद्र नाथ डे ने इसे ‘विष्णु ध्वज’ कहा है, गोपीनाथ शर्मा ने इसे ‘लोक जीवन का रंगमंच’ कहा है, आर पी व्यास ने इसे ‘हिंदू प्रतिमा शास्त्र की अनुपम निधि’ कहा है।

–   महाराणा स्वरूप सिंह के समय इसका जीर्णोद्धार करवाया गया। फर्ग्यूसन ने इसकी तुलना ‘टार्जन टावर’ (इंग्लैंड)से की है।

–    इसे बनाने की प्रेरणा बयाना के विष्णु स्तंभ से मिली।

–   इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अल्लाह शब्द लिखा है।

–    कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति की रचना कवि अत्रि तथा बाद में महेश द्वारा पूरी की गई।

 तीन साके :-

–   पहला साका :- 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय।

–   तत्कालीन शासक :- राणा रतनसिंह।

–   जौहर :- पद्मिनी के नेतृत्व में।

–   गौरा-बादल का सम्बन्ध चित्तौड़ के पहले साके से है।

–   इस दुर्ग को जीतकर अलाउद्दीन खिलजी ने इसका नाम खिज्राबाद रखा। रानी पद्‌मिनी सिंहल द्वीप के राजा गन्धर्वसेन की पुत्री थी।

–   दूसरा साका :- 1535 में बहादुरशाह (गुजरात सुल्तान) के आक्रमण के समय

–   तत्कालीन शासक :- विक्रमादित्य

–   जौहर :- कर्मावती के नेतृत्व में।

–   केसरिया :- देवलिया के रावत बाघसिंह  के नेतृत्व में।

–   बहादुरशाह ने अपने सेनापति रुमीखाँ को इस अभियान का नेतृत्व सौंपा था।

–   इस युद्ध में रानी कर्मावती ने मुगल शासक हुमायूँ को राखी भेजकर मदद माँगी थी।

–   तीसरा साका :- 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के समय।

–   तत्कालीन शासक :- राणा उदयसिंह

–   इस युद्ध में जयमल व फत्ता (पता) ने अदम्य वीरता का परिचय दिया।

–   इस दुर्ग में 7 प्रवेश द्वार हैं :- पाडन पोल (मुख्य व पहला प्रवेश द्वार), भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल, रामपोल।

–   नवलखा बुर्ज (बनवीर द्वारा निर्मित लघु दुर्ग) इसी किले में है।

–   दुर्ग में स्थित विजय स्तम्भ के वास्तुकार जैता, नापा, पोमा एवं पूंजा थे।

–   इस दुर्ग में स्थित जैन कीर्ति स्तम्भ (7 मंजिला) का निर्माण बघेरवाला जैन जीजा द्वारा 10वीं – 13वीं सदी में करवाया गया था। (भगवान आदिनाथ का स्मारक)।

–   राज्य का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट।

–   दुर्ग में जलापूर्ति के स्रोत :- रत्नेश्वर तालाब, कुम्भसागर, गोमुख झरना, हाथीकुण्ड, भीमलत तालाब, झालीबाव तालाब।

–   दुर्ग के भीतर स्थित फतह प्रकाश महल को संग्रहालय बना दिया गया।

–   कल्ला राठौड़ की छतरी (4 खम्भों की छतरी) इसी दुर्ग में है।

–   लाखोटा की बारी :- चित्तौड़ दुर्ग की उत्तरी खिड़की।

–   दुर्ग का सबसे प्राचीन दरवाजा :- सूरजपोल।

–   रावत बाघसिंह का स्मारक इसी दुर्ग में है।

–   विजय स्तम्भ को कर्नल जेम्स टॉड ने ‘रोम के टार्जन’ की उपमा दी।

–   दुर्ग के सम्बन्ध में प्रचलित कहावत :- गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।

मेहरानगढ़ दुर्ग

राजस्थान के दुर्ग

–   निर्माता :- राव जोधा

–   समय :- 1459 ई. में

–   नींव :- करणी माता द्वारा चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर निर्मित गिरि दुर्ग। (पचेटिया पहाड़ी पर निर्मित)।

–   आकृति :- मोर (म्यूर) के समान।

–   अन्य नाम :- म्यूरध्वज, गढ़चिन्तामणि (कुण्डली के अनुसार नामकरण)।

   इस दुर्ग की नींव में राजिया (राजाराम) मेघवाल को जीवित चुना गया।

–   प्रवेश द्वार :-

   (i) जयपोल – उत्तर-पूर्व में। मानसिंह द्वारा 1808 ई.  में निर्मित।

   (ii) फतेहपोल – दक्षिण-पश्चिम में। अजीतसिंह 1707 ई.  में निर्मित।

–   मामा-भान्जा (धन्ना और भींवा) की छतरी मेहरानगढ़ दुर्ग में लौहा पोल द्वार के पास है। यह 10 खम्भों की छतरी है।

–   भूरे खाँ की मजार इसी दुर्ग में है।

–   अन्य प्रवेश द्वार :- ध्रुव पोल, सुरज पोल, इमरत पोल तथा भैरों पोल।

–   पुस्तक प्रकाश :- इस दुर्ग में महाराजा मानसिंह द्वारा स्थापित पुस्तकालय।

   किले में तोपें :- किलकिला, शम्भुबाण, गजनी खाँ, कड़क, गजक, जमजमा, बिजली, बिच्छूबाण, नुसरत, गुब्बार, धुड़धाणी, नागपली, मागवा, मीरक आदि।

–   किलकिला तोप :- राजा अजीत सिंह द्वारा अहमदाबाद में बनवाई गई।

–   शम्भुबाण तोप :- राजा अभय सिंह ने सर बुलन्दखाँ से छीनी।

–   गजनी खाँ तोप :- 1607 ई. में राजा गजसिंह ने जालौर विजय पर हासिल की।

–   इस दुर्ग में चामुण्डा माता, मुरली मनोहर तथा आनंदघनजी के प्राचीन मंदिर हैं। 

   2008 वर्ष  में चामुण्डा मंदिर में भगदड़ मच जाने से कई लोग मारे गये इसकी जाँच हेतु जसराज चोपड़ा कमेटी का गठन किया गया।

–   वीर कीरतसिंह सोढ़ा की छतरी इसी दुर्ग में है।

–   दुर्ग के भीतर राठौड़ों की कुलदेवी, नागणेची जी का मंदिर है।

–   श्रृंगार चौकी :- महाराजा तख्तसिंह द्वारा दौलतखाने के आँगन में निर्मित चौकी, जहाँ जोधपुर के राजाओं का राजतिलक होता था।

–   प्रसिद्ध ब्रिटिश साहित्यकार रूडयार्ड किपलिंग ने इस दुर्ग के बारे में कहा कि ‘यह दुर्ग देवताओं, परियों एवं फरिश्तों द्वारा निर्मित हैं।’

–   इस दुर्ग में सोने के बारीक काम वाला मोती महल एवं भिति चित्रों से सजा फूलमहल स्थित है। ‘फूलमहल’ का निर्माण महाराजा अभयसिंह ने करवाया था।

–   दुर्ग में राणीसर एवं पद्मासर तालाब जल के मुख्य स्रोत है। राणीसर तालाब का निर्माण राव जोधा की रानी जसमा हाड़ी ने करवाया था।

–   यह दुर्ग वीर दुर्गादास की स्वामीभक्ति का साक्ष्य है।

–   दुर्ग में स्थित संग्रहालय में अकबर की तलवार रखी हुई है।

–   राजस्थान का प्रथम दुर्ग जिसमें ‘ऑडियो गाइड टूर’ की सुविधा है।

कुम्भलगढ़ दुर्ग

राजस्थान के दुर्ग

–    मेवाड़ – मारवाड़ सीमा पर राजसमन्द जिले में स्थित गिरि दुर्ग।

–   इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने मौर्य शासक सम्प्रति द्वारा निर्मित एक प्राचीन दुर्ग के ध्वंसावशेषों पर शिल्पी मंडन की देखरेख में करवाया था।

–   निर्माण काल :- 1448-1458 ई.।

–   प्रवेश द्वार :- ओरठ पोल, हल्ला पोल, हनुमान पोल, विजय पोल, भैरव पोल, चौगान पोल, पागड़ा पोल और गणेश पोल। (9 द्वार)

–   उपनाम :- मेवाड़ की तीसरी आँख, मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी, मत्स्येन्द्र, एस्ट्रूस्कन, कुंभलमेरु, कमलमीर आदि।

–   यह अरावली पर्वत की 13 ऊँची चोटियों से घिरा दुर्ग है।

–   कुम्भलगढ़ दुर्ग 36 किमी. लम्बे परकोटे से सुरक्षित है।

–   कुम्भलगढ़ दुर्ग की सुरक्षा दीवार इतनी चौड़ी है कि एक साथ आठ घुड़सवार चल सकते हैं।

–   कर्नल टॉड ने कुम्भलगढ़ की तुलना सुदृढ़ प्राचीरों, बुर्जों, कँगूरों के विचारों से ‘एस्ट्रूस्कन’ से की है।

–   इस दुर्ग में झालीबाव बावड़ी, कुम्भास्वामी, विष्णु मंदिर, मामादेव तालाब, झाली रानी की मालिया आदि अन्य प्रसिद्ध स्मारक निर्मित हैं।

–   ‘उड़ना राजकुमार’ के नाम से प्रसिद्ध कुंवर पृथ्वीराज की छतरी इसी दुर्ग में है। (12 खम्भों की छतरी)।

–   कटारगढ़ :- कुम्भलगढ़ दुर्ग में स्थित लघु दुर्ग। कटारगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। राणा कुम्भा के पुत्र ऊदा ने कटारगढ़ में ही कुम्भा की हत्या की। कटारगढ़ में ही झाली रानी का मालिया महल बना हुआ है। इसे ‘बादल महल’ भी कहा जाता है।

–   इस दुर्ग में ही महाराणा उदय सिंह का राज्याभिषेक हुआ था।

–   इस दुर्ग की ऊँचाई के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि यह इतनी बुलन्दी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की ओर देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।

–   हेमकूट, नील हिमवंत, वान्ध माधन पहाड़ियों पर निर्मित दुर्ग।

–   कुम्भलगढ़ दुर्ग से ही महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी युद्ध की तैयारी की थी। 

–   इस दुर्ग में नीलकंठ महादेव का मंदिर तथा यज्ञ की प्राचीन वेदी है।

रणथम्भौर दुर्ग

–    सवाईमाधोपुर जिले में अरावली पर्वतमालाओं से घिरा हुआ गिरि व वन दुर्ग है।

–   निर्माण :- 8वीं शताब्दी में चौहान शासकों द्वारा। (रणथम्मनदेव चौहान)

–   यह दुर्ग विषम आकार वाली सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

–   इस दुर्ग के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि –

   ‘अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है।’

   इस दुर्ग में प्रसिद्ध गणेश जी का मंदिर, पीर सदरुद्दीन की दरगाह, सुपारी महल, जौरां-भौरां (अन्न भंडार), जोगी महल, बादल महल, हम्मीर महल, हम्मीर की कचहरी, रनिहाड़ तालाब प्रमुख है।

–   पद्‌मला तालाब इसी दुर्ग में है।

–   राजस्थान का पहला साका 1301 ई. में हम्मीर देव चौहान के समय हुआ था, जब अलाउद्दीन खिलजी द्वारा रणथम्भौर पर आक्रमण किया गया। इस आक्रमण के समय इतिहासकार अमीर खुसरो भी मौजूद था।

   दुर्ग से जुड़े विशिष्ट शब्द :-

–   पाशेब :- दुर्ग में विशिष्ट चबूतरे।

–   गरगच, मगरबी :- दुर्ग से ज्वलनशील पदार्थ फेंकने के यंत्र।

   अर्रादा:- दुर्ग से पत्थरों की वर्षा करने वाला यंत्र।

–   अकबर ने इस दुर्ग में ‘सिक्का ढालने की टकसाल’ स्थापित की।

–   दुर्ग की परिधि :- 7 मील

   दुर्ग का वास्तविक नाम :- रन्त:पुर अर्थात् रण की घाटी में स्थित नगर।

–   32 खम्भों की छतरी इसी दुर्ग में है। (हम्मीर देव द्वारा निर्मित)।

–   प्रवेश द्वार :- नौलखा दरवाजा, हाथी पोल, गणेश पोल, सूरज पोल, त्रिपोलिया।

–   रणथम्भौर दुर्ग राणा हम्मीर की आन-बान-शान का प्रतीक है।

–   अकबर के शासनकाल में रणथम्भौर दुर्ग जगन्नाथ कच्छवाहा की जागीर में रहा। शाहजहां के समय यहाँ का अधिपति विट्ठलदास गौड़ था।

–   रणथम्भौर के प्रथम साके के दौरान हम्मीर की पुत्री देवल ने भी जौहर किया था।

–   पद्मला सुपारी महल (रणथम्भौर) में एक ही स्थान पर मन्दिर, मस्जिद और गिरजाघर स्थित है।

–   रणथम्भौर दुर्ग का पतन :- 11 जुलाई, 1301 ई.।

आमेर दुर्ग

–    जयपुर नगर से उत्तर की ओर 11 किमी. दूर स्थित गिरी दुर्ग।

–   कोकिलदेव ने 1036 ई. में यह दुर्ग आमेर के मीणा शासक भुट्‌टो से छीन लिया।

–   राजा मानसिंह प्रथम ने दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया।

–   हिन्दू-मुस्लिम शैली का समन्वित रूप।

–   इस दुर्ग में शीशमहल, शिला माता मंदिर, जगत शिरोमणि मंदिर, दीवाने आम, दीवाने खास, दिलखुश महल, 24 रानियों का महल, बुखारा गार्डन, सुहाग मंदिर आदि दर्शनीय स्थल हैं।

–   दुर्ग के अन्य नाम :- आम्बेर, अम्बिकापुर, अम्बर, अम्बावती।

–   आमेर दुर्ग के निकट नीचे मावठा तालाब एवं दिलाराम का बाग उसके सौन्दर्य को द्विगुणित करते हैं।

–   सुख मंदिर :- दुर्ग में स्थित यह महल राजाओं का ग्रीष्मकालीन निवास था।

–   आमेर के जगत शिरोमणि मंदिर में प्रतिष्ठापित भगवान कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति लगी हुई है। यह मूर्ति आमेर के राजा मानसिंह-प्रथम द्वारा चित्तौड़ से लाई गयी थी। इस मंदिर का निर्माण महाराजा मानसिंह की पत्नी कनकावती द्वारा अपने दिवंगत पुत्र जगतसिंह की याद में करवाया गया था।

–   1707 ई. में मुगल बादशाह मुअज्जम (बहादुरशाह) ने आमेर दुर्ग पर अधिकार कर उसका नाम मोमिनाबाद रखा।

–   दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-खास का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था।

–   दुर्ग में गणेश पोल के निर्माता सवाई जयसिंह थे।

–   बालाबाई (महाराजा पृथ्वीराज की रानी) की साल इसी दुर्ग में है।

–   प्रवेश द्वार :- जयपोल, सिंहपोल, गणेश पोल, सूरज पोल, चाँदपोल। 

–   सौभाग्य (सुहाग) मंदिर :- आयताकार महल, जो रानियों के मनोविनोद तथा हृास-परिहृास का स्थान था। इसके किवाड़ चंदन के बने हुए हैं।

–   बिशप हेबर ने आमेर के महलों को क्रेमलिन के महलों से भी ज्यादा सुन्दर एवं अलंकृत बताया।

गागरोण दुर्ग

–   जल दुर्ग (कालीसिन्ध-आहू नदी के संगम पर) परमार शासकों द्वारा निर्मित। (11वीं सदी में)

–   सामेलणी (झालावाड़) में स्थित दुर्ग।

–   अन्य नाम :- धूलरगढ़ / डोडगढ़, गर्गराटपुर

–   ‘चौहान कल्पद्रुम’ ग्रन्थ के अनुसार खींची राजवंश संस्थापक देवनसिंह (धारू) ने 12वीं सदी के उत्तरार्द्ध में डोड शासक बीजलदेव को परास्त कर इसका नाम गागरोण दुर्ग रखा।

–   इस दुर्ग में खुरासान से गागरोण आये सूफी संत ‘मिट्‌ठे साहब की दरगाह’ तथा औरंगजेब द्वारा निर्मित बुलन्द दरवाजा भी स्थित है।

–   इस दुर्ग में संत पीपा की छतरी है।

–   इस दुर्ग में भगवान मधुसूदन का मंदिर तथा कोटा रियासत के सिक्के ढालने की टकसाल है।

   इस दुर्ग में दो साके हुए –

   प्रथम साका :- 1423 ई. में मांडू सुल्तान होशंगशाह के आक्रमण के समय हुआ। उस समय गागरोण का शासक अचलदास खींची था।

   द्वितीय साका :- 1444 ई. में महमूद खिलजी के आक्रमण के समय हुआ। उस समय गागरोण का शासक पाल्हणसी था।

–   महमूद खिलजी ने इस दुर्ग को जीतकर इसका नाम ‘मुस्तफाबाद’ रखा।

–   अकबर ने गागरोण दुर्ग पृथ्वीराज को जागीर में दे दिया।

–   पृथ्वीराज ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वेलि क्रिसन रुकमणि री’ गागरोण में रहकर लिखा।

–   जालिमकोट :- गागरोण दुर्ग में कोटा के झाला जालिमसिंह द्वारा निर्मित विशाल परकोटा।

–   रामबुर्ज एवं ध्वजबुर्ज इसकी विशाल बुर्जें हैं।

–   पाषाणकालीन उपकरणों हेतु प्रसिद्ध।

–   बादशाह जहाँगीर ने यह किला बूँदी के हाड़ा शासक राव रतन हाड़ा को जागीर में दे दिया।

–   ‘गीध कराई’ :- गागरोण दुर्ग के पास स्थित ऊँची पहाड़ी।

–   यह राज्य का एकमात्र दुर्ग है, जो बिना नींव के एक चट्टान पर सीधा खड़ा है।

सोनार किला

–    भाटी वंश के शासक राव जैसल द्वारा जैसलमेर में त्रिकूट पहाड़ी पर 1155 ई. में निर्मित दुर्ग।

–   आकृति :- त्रिकूटाकृति।

–   प्रकार :- धान्वन श्रेणी का दुर्ग।

–   इस दुर्ग का निर्माण शालिवाहन द्वितीय ने पूर्ण करवाया।

–   इस दुर्ग में 99 बुर्ज हैं। (सर्वाधिक बुर्जों वाला दुर्ग)।

–   गहरे पीले पत्थरों से निर्मित।

–   प्रचलित कहावत – ‘घोड़ा कीजे काठ का पग कीजे पाषाण, अख्तर कीजे लोहे का तब पहुँचे जैसाण’।

–   इस दुर्ग के सम्बन्ध में अबुल फजल की उक्ति –

   ‘यह ऐसा दुर्ग है, जहाँ पहुँचने के लिए पत्थर की टाँगें चाहिए।’

–   सोनारगढ़ दुर्ग का निर्माण चूने का प्रयोग किए बिना पत्थरों को जोड़कर किया गया है।

–   जैसलमेर दुर्ग विश्व का एकमात्र दुर्ग है जिसकी छत लकड़ी की बनी हुई है।

–   उपनाम :-  सोनगढ़, गौहरारगढ़, त्रिकूटगढ़ एवं ‘उत्तर भड़ किवाड़’।

–   राज्य का दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट। (पहला – चित्तौड़ दुर्ग)

–   कमरकोट :- दुर्ग का घाघरानुमा दुहरा परकोटा। इसे स्थानीय लोग ‘पाड़ा’ भी कहते हैं।

–   प्रवेश द्वार :- अक्षय पोल (मुख्य प्रवेश द्वार), गणेश पोल, सूरज पोल, हवा पोल।

–   शीश महल :- दुर्ग में महारावल अखैसिंह द्वारा निर्मित सर्वोत्तम विलास।

–   दुर्ग के भीतर जैसल कुआँ प्राचीन पेयजल स्रोत है।

   ‘ढाई साके’ के लिए प्रसिद्ध :-

–   पहला साका :- 1308 से 1312-13 ई. के मध्य अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय।

   उस समय जैसलमेर का शासक मूलराज था।

–   दूसरा साका :- फिरोज तुगलक व राव दूदा के मध्य युद्ध तथा इसमें दूदा की हार हुई।

–   तीसरा अर्द्ध साका :- 1550 ई. में कंधार के अमीर अली के आक्रमण के समय।

   उस समय जैसलमेर शासक राव लूणकरण थे। इसमें केसरिया हुआ, जौहर नहीं।

–   इस दुर्ग में हस्तलिखित ग्रंथों का सबसे बड़ा भंडार ‘जिनभद्र सूरी ग्रंथ भंडार’ अवस्थित है।

–   जैसलमेर दुर्ग महलों में पत्थर पर बारीक खुदाई एवं कलात्मक जालियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

–   इस दुर्ग के भीतर ही घड़सीसर तालाब है।

–   आदिनाथ जैन मंदिर :- इस दुर्ग में स्थित सबसे प्राचीन जैन मंदिर।

–   फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे द्वारा ‘सोनार किला फिल्म’ का निर्माण किया गया।

–   दूर से देखने पर यह दुर्ग पहाड़ी पर लंगर डाले एक जहाज का आभास कराता है।

–   वर्ष 2009 में इस दुर्ग पर 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।

–   वर्ष 2009 में आए भूकम्प से इसमें दरारें पड़ गई हैं।

तारागढ़ दुर्ग (अजमेर)

–   गिरि दुर्ग।

–   निर्माण :-  चौहान शासक अजयराज द्वारा।

–   समय :- 11वीं सदी में।

–   स्थान :- अजमेर में तारागढ़ पर्वत की बीठली पहाड़ी पर।

–   उपनाम :- गढ़बीठली दुर्ग, अजयमेरु दुर्ग, राजपुताने की कुँजी, राजस्थान का जिब्राल्टर।

–   इस दुर्ग के भीतर प्रसिद्ध मुस्लिम संत मीरान साहब की दरगाह है। यह दरगाह तारागढ़ के प्रथम गवर्नर मीर हुसैन खिंगसवार की है।

–   बिशप हैबर ने तारागढ़ दुर्ग को ‘पूर्व का जिब्राल्टर’ की संज्ञा दी।

–   मेवाड़ के राणा रायमल के युवराज पृथ्वीराज ने अपनी वीरांगना पत्नी तारा के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा।

–   शीशाखान :- तारागढ़ पहाड़ी के ठीक नीचे अवस्थित प्राचीन गुफा।

–   हरविलास शारदा (इतिहासविद्) ने इस दुर्ग को भारत का प्रथम दुर्ग माना है।

–   प्रवेश द्वार :- विजय पोल, लक्ष्मी पोल, फूटा दरवाजा, भवानी पोल, हाथी पोल, अरकोट दरवाजा।

–   इस दुर्ग की प्राचीर में 14 बुर्जे हैं जिनमें घूँघट, गूगड़ी, फूटी बुर्ज, नक्कारची की बुर्ज, श्रृंगार चँवरी बुर्ज, पीपली बुर्ज, दौराई बुर्ज, फतेह बुर्ज आदि प्रमुख हैं।

–   दुर्ग के भीतर नाना साहब का झालरा, इब्राहिम का झालरा एवं गोल झालरा आदि बड़े जलाशय विद्यमान हैं।

–   घोड़े की मजार इसी दुर्ग में है।

–   रानी उमादे (रुठी रानी) जोधपुर शासक मालदेव की पत्नी थी, जिसने अंतिम दिनों में अपना जीवन इसी दुर्ग में बिताया था।

–   राव मालदेव ने अजयमेरु दुर्ग में किले के ऊपर अरहठ से पानी पहुँचाने का प्रबन्ध किया था।

तारागढ़ दुर्ग (बूँदी)

–    गिरि दुर्ग।

–   यह दुर्ग धरती से आकाश के तारे के समान दिखलाई पड़ता है।

–   निर्माण :- राव बरसिंह द्वारा 1354 ई. में।

–   लगभग 1426 फीट ऊँचे पर्वत शिखर पर निर्मित।

–   किले के बाहरी दीवार का निर्माण 18वीं सदी में फौजदार दलील ने करवाया था।

–   ‘गर्भ गुंजन’ तोप इसी दुर्ग में है।

–   कर्नल जेम्स टॉड ने बूँदी के राजमहलों को राजस्थान के सभी राजप्रासादों में सर्वश्रेष्ठ बताया है।

दुर्ग में स्थित महल :-

–   छत्र-महल, अनिरुद्ध महल, रतन-महल, बादल-महल, फूल महल।

–   प्रवेश द्वार :- हाथी पोल, गणेश पोल, हजारी पोल, पाटन पोल, भैरव पोल एवं शकल बारी दरवाजा।

–   मेवाड़ महाराणा राणा लाखा ने इस दुर्ग को जीतने की प्रतिज्ञा पूर्ण न करने पर मिट्‌टी का नकली दुर्ग बनाकर उसे ध्वस्त करके अपनी कसम पूरी की।

–   हाड़ा राजपूतों के शौर्य एवं वीरता की प्रतीक।

–   यहाँ 84 खम्भों की छतरी, शिकार बुर्ज, फूलसागर, जैतसागर और नवलसागर सरोवर बूँदी के वैभव को दर्शाते हैं।

–   महाराव उम्मेदसिंह के काल में निर्मित चित्रशाला (रंगविलास) बूँदी चित्रशैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।

–   बूँदी दुर्ग की प्राचीर (शहरपनाह) का निर्माण राव बुद्धसिंह ने सन् 1700 ई. के लगभग करवाया।

भटनेर का किला

–    घग्घर नदी के मुहाने पर हनुमानगढ़ में स्थित धान्वन दुर्ग।

–   निर्माता :- भूपत भाटी द्वारा तीसरी शताब्दी में। (295 ई.)

–   दिल्ली-मुल्तान मार्ग पर स्थित।

–   उपनाम :- उत्तरी सीमा का प्रहरी

–   1001 में महमूद गजनवी ने इस पर अधिकार कर लिया।

–   1398 ई. में तैमूर लंग ने राव दूलचन्द भाटी को परास्त कर इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

–   इस दुर्ग में 52 विशाल बुर्ज हैं।

–   किले का निर्माण पकी हुई ईटों और चूने से हुआ था।

–   सर्वाधिक विदेशी आक्रमण सहने वाला दुर्ग।

–   तैमूर के आक्रमण के समय यहाँ हिन्दू स्त्रियों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं द्वारा भी जौहर किया गया था।

–   तैमूर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-तैमूरी’ में इस दुर्ग की प्रशंसा में लिखा है कि उसने इतना सुरक्षित व मजबूत दुर्ग पूरे हिन्दुस्तान में कहीं नहीं देखा।

–   पुनर्निर्माण :- राजा अभयराव भाटी द्वारा।

–   बीकानेर के राजा सूरतसिंह द्वारा सन् 1805 में मंगलवार के दिन इस किले को फतह करने के कारण भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया।

–   इस दुर्ग में बलबन के किलेदार शेर खाँ की कब्र है।

–   भटनेर दुर्ग में एक प्रवेश द्वार पर एक राजा के साथ 6 नारियों की आकृतियाँ बनी हैं।

बाला किला

–   निर्माण :- 1049 ई. में अलघुराय द्वारा।

–   इस दुर्ग के नीचे एक नगर ‘अलपुर’ बसाया गया।

–   मुगल शासक बाबर ने इस दुर्ग में कुछ दिनों तक विश्राम किया।

–   सलीमशाह (शेरशाह का उत्तराधिकारी) के काल में यहाँ सलीम सागर जलाशय बनाया गया।

–   औरंगजेब ने यह दुर्ग आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह को दे दिया था।

–   1775 ई. में अलवर महाराजा राव प्रतापसिंह ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

–   उपनाम :- आँख वाला किला, बावनगढ़ का लाड़ला।

–   अलवर दुर्ग की प्राचीर 6 मील लम्बी है।

–   किले में प्रमुख बुर्ज :- नौगजा बुर्ज, काबुल एवं खुद बुर्ज, बंगला बुर्ज।

–   प्रवेश द्वार :- चाँद पोल, सूरज पोल, कृष्ण पोल, लक्ष्मण पोल, जय पोल।

–   जल के मुख्य स्रोत :- सलीम सागर तालाब एवं सूरज कुण्ड।

–   बंगला बुर्ज के निर्माता :- महाराजा शिवदान सिंह।

–   सलीम सागर जलाशय का निर्माण चाँद काजी द्वारा करवाया गया।

सिवाणा दुर्ग

–    गिरि दुर्ग, सहाय दुर्ग, कुमट दुर्ग।

–   निर्माण :- परमार शासक वीर नारायण पंवार द्वारा।

–   समय :- 954 ई. में (10वीं सदी)।

–   स्थान :- बाड़मेर जिले के सिवाना कस्बे में स्थित।

–   यह दुर्ग हल्देश्वर पहाड़ी पर स्थित है।

–   प्रारम्भिक नाम :- कुम्थाना।

दुर्ग में 2 साके हुए –

–   प्रथम साका :- 1308 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय। उस समय दुर्ग का रक्षक सातलदेव सोनगरा था। अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाणा दुर्ग का नाम खैराबाद रखा था।

–   द्वितीय साका :- अकबर ने मोटा राजा उदयसिंह के नेतृत्व में सिवाणा शासक वीर कल्ला रायमलोत पर आक्रमण किया। वीर कल्ला वीर गति को प्राप्त हुए तथा हाड़ी रानी ने सभी स्त्रियों के साथ जौहर किया।

–   राव मालदेव ने गिरि सुमेल युद्ध (1544 ई.) के बाद शेरशाह की सेना द्वारा पीछा किये जाने पर सिवाणा दुर्ग में पश्रय लिया था।

–   जोधपुर शासकों की संकटकाल में शरणस्थली के रूप में प्रसिद्ध दुर्ग।

–   ‘शेर-ए-राजस्थान’ नाम से विख्यात जयनारायण व्यास को राज्य के सिवाणा दुर्ग में बंदी बनाकर रखा गया।

–   भांडेलाव :- दुर्ग में अवस्थित प्रसिद्ध तालाब।

नाहरगढ़ दुर्ग

–    जयपुर

–   निर्माण :- 1734 ई. में सवाई जयसिंह द्वारा।

–   उपनाम :- सुदर्शनगढ़, सुलक्षणगढ़

–   आकार :- जयपुर के मुकुट के समान।

–   इस दुर्ग में महाराजा माधोसिंह द्वितीय ने अपनी 9 पासवानों हेतु एक जैसे 9 महल बनवाये।

   9 महल :- सूरज प्रकाश, खुशहाल प्रकाश, जवाहर प्रकाश, ललित प्रकाश, आनन्द प्रकाश, लक्ष्मी प्रकाश, चाँद प्रकाश, फूल प्रकाश और बसन्त प्रकाश।

–   सवाई जगतसिंह की प्रेमिका रसकपूर कुछ समय तक इसी किले में कैद करके रखी गई थी।

–   नामकरण :- नाहरसिंह भोमिया के नाम पर।

अन्य लेख

लौहागढ़ दुर्ग

–    भरतपुर में स्थित पारिख व भूमि दुर्ग।

–   निर्माण :- 1733 ई. में जाट राजा सूरजमल द्वारा।

–   पत्थर की पक्की प्राचीर से घिरा दुर्ग।

–   इस दुर्ग के चारों और गहरी खाई है जिसमें मोती झील से सुजान गंगा नहर द्वारा पानी लाया गया है।

–   इस दुर्ग के प्रवेश द्वार पर लगा हुआ अष्ट धातु दरवाजा है, जिसे महाराजा जवाहरसिंह 1765 ई. में दिल्ली में मुगलों से जीतने के बाद लाल किले से लाए थे।

–   मिट्‌टी से बना दुर्ग अपनी अजेयता के लिए प्रसिद्ध है। इस किले को अंग्रेज व मुगल नहीं जीत पाये।

–   लॉर्ड लेक ने इस दुर्ग को जीतने का पाँच बार असफल प्रयास किया।

–   दुर्ग में महलखास, कोठीखास, किशोरी महल, सिलह खाना, दरबार खास आदि प्रमुख महल हैं।

–   18 मार्च, 1948 को मत्स्य संघ का उद्‌घाटन इसी दुर्ग में हुआ था।

–   किले में 8 बुर्ज हैं, जिसमें जवाहर बुर्ज एवं फतेह बुर्ज प्रमुख हैं।

–   मैदानी दुर्गों की श्रेणी में विश्व का सर्वश्रेष्ठ दुर्ग।

मांडलगढ़ दुर्ग

–    भीलवाड़ा में गिरि दुर्ग

–   यह दुर्ग बनास, बेड़च एवं मेनाल नदियों के त्रिवेणी संगम के समीप स्थित है।

–   शृंगि ऋषि अभिलेख के अनुसार मंडलाकृति (कटोरेनुमा) का होने के कारण इसका नाम मांडलगढ़ पड़ा।

–   नामकरण :- माण्डिया भील के नाम पर। 12वीं सदी में निर्मित।

–   बीजासण का पहाड़ दुर्ग के समीप ही स्थित है।

–   दुर्ग के अंदर दो कुण्डेश्वर व जालेश्वर महादेव मंदिर, ऋषभदेव जैन मंदिर, सागर एवं सागरी जलाशय, जालेसर एवं देवसागर तालाब स्थित है।

–   1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व लगभग एक माह तक कुँवर मानसिंह इस दुर्ग में रहे।

जयगढ़ दुर्ग

–    गिरि दुर्ग।

–   निर्माण :- मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा।

–   परिवर्द्धनकर्ता :- सवाई जयसिंह द्वितीय।

–   स्थान :- चिल्ह का टीला (जयपुर) में।

–   प्रवेश द्वार :- डूंगर दरवाजा, अवनि दरवाजा एवं भैरु दरवाजा।

–   उपनाम :- रहस्यमयी दुर्ग, संकटमोचक दुर्ग, चिल्ह का टीला दुर्ग।

–   कच्छवाहा राजाओं का राजकोष रखा हुआ था, श्रीमती इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में गुप्त खजाने के लिए खुदाई की गई।

–   इसका निर्माण प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र के निर्धारित मानकों के अनुसार किया गया है।

–   इस दुर्ग के प्रमुख भवनों में जलेब चौक, सुभट निवास, खिलबत निवास, लक्ष्मी निवास, ललित मंदिर, आराम मंदिर आदि हैं।

–   विजयगढ़ी :- किले में स्थित लघु दुर्ग।

–   दिया बुर्ज :- सबसे ऊँचा बुर्ज (7 मंजिला)।

–   जयबाण :- 1720 ई. में निर्मित एशिया की सबसे बड़ी तोप।

   जयबाण तोप की मारक क्षमता :- 32 किलोमीटर 

–   जयगढ़ दुर्ग भारत का एकमात्र दुर्ग है, जहाँ तोप ढालने का संयंत्र लगा हुआ है।

–   बादली, बजरंगबण, मचवान :- इस दुर्ग में निर्मित तोपें।

–   इस किले में कठपुतलीघर स्थित है।

–   शांतिकाल में यह दुर्ग विशिष्ट राजनीतिक बंदियों के लिए कैदखाने के रूप में काम आता है।

दौसा किला

–    दौसा जिले में देव गिरि पहाड़ी पर गुर्जर-प्रतिहारों (बड़गुर्जरों) द्वारा निर्मित गिरि दुर्ग।

–   आकार :- छाजले के समान।

–   11वीं सदी में कच्छवाहों ने यह दुर्ग बड़गुजरों से छीन लिया।

–   दुर्ग प्रवेश द्वार :- हाथी पोल एवं मोरी दरवाजा।

–   दुर्ग का निचला भाग दोहरे परकोटे से आबद्ध है।

–   दुर्ग में प्रसिद्ध ‘राजाजी का कुआँ’ तथा बैजनाथ महादेव मंदिर है।

–   इस दुर्ग में ’14 राजाओं की साल’ है।

–   दादूपंथी सन्त सुन्दरदास जी का जन्म स्थान माना जाता है।

अचलगढ़ दुर्ग

–    परमार शासकों द्वारा 9वीं सदी में आबू (सिरोही) में निर्मित गिरि दुर्ग।

–   कर्नल टॉड ने माउण्ट आबू को ‘हिन्दू ओलम्पस’ (देव पर्वत) कहा है।

–   परमारों की राजधानी :- चन्द्रावती

–   1452 ई. में महाराणा कुम्भा द्वारा पुनर्निर्माण।

–   प्रवेश द्वार :- हनुमान पोल, गणेश पोल, चम्पा पोल, भैरव पोल।

–   दुर्ग में दर्शनीय स्थल :- अचलेश्वर महादेव मंदिर, मन्दाकिनी कुण्ड, सावन-भादो झील, ओखा रानी का महल आदि।

–   ‘भंवराथल’ नामक स्थान का सम्बन्ध इसी दुर्ग से है जहाँ आक्रमणकारी महमूद बेगड़ा एवं उसके सैनिकों पर मधुमक्खियों ने आक्रमण कर दिया था।

–   इस दुर्ग के पास ही भरथरी की गुफाएँ हैं।

स्वर्णगिरी दुर्ग

–    जालौर में स्थित गिरि दुर्ग।

–   इसका निर्माण सूकड़ी नदी के किनारे गुर्जर नरेश नागभट्‌ट प्रथम ने करवाया था।

–   अन्य नाम :- सोनगिरी, कनकाचल, जलालाबाद, जाबालिपुर।

–   जालौर दुर्ग के तोपखाने में परमार शासक वीसल का शिलालेख प्राप्त हुआ, जिसमें उसकी रानी मेलरदेवी द्वारा सन् 1118 ई. में सिंधु राजेश्वर मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाये जाने का वर्णन भी है।

–   प्रतिहार नरेश वत्सराज के शासनकाल में 778 ई. में जैन आचार्य उद्योतन सूरि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ कुवलयमाला की रचना की।

–   चौहानों की जालौर शाखा का संस्थापक :- कीर्तिपाल।

–   सुंधा पर्वत अभिलेख में कीर्तिपाल के लिए ‘राजेश्वर’ शब्द का प्रयोग हुआ।

–   अलाउद्दीन खिलजी ने कान्हड़देव के समय 1311-12 ई. में जालौर पर आक्रमण कर इस दुर्ग का नाम ‘जलालाबाद’ रख दिया।

–   1311 ई. में इस दुर्ग का पतन बीका नामक दहिया राजपूत की गद्दारी से हुआ था।

–   इस दुर्ग में संत मलिक शाह की दरगाह, परमार कालीन कीर्ति स्तम्भ, ‘स्वर्णगिरि’ मंदिर (जैन मंदिर), तोपखाना मस्जिद, आशापुरा माता का मंदिर एवं वीरमदेव की चौकी प्रमुख है।

–   स्वतंत्रता आन्दोलन के समय मथुरादास माथुर, गणेशीलाल व्यास, फतहराज जोशी जैसे नेताओं को किले में नजरबंद रखा गया।

–   किले में बनी तोपखाना मस्जिद पूर्व में परमार शासक भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी।

जूनागढ़ दुर्ग

–    धान्वन दुर्ग, भूमि दुर्ग एवं पारिख दुर्ग।

–   1589 ई. में महाराजा रायसिंह ने इस दुर्ग की नींव रखी, जो 1594 में बनकर पूर्ण हुआ।

–   आकृति :- चतुष्कोण या चतुर्भुजाकृति।

–   लाल पत्थरों से निर्मित होने के कारण ‘लालगढ़’ भी कहा जाता है।

–   प्रवेश द्वार :- बाहरी :- कर्णपोल एवं चाँदपोल।

   भीतरी :- दौलत पोल, फतेह पोल, रतन पोल, सूरज पोल एवं ध्रुव पोल।

–   सूरज पोल पर राजा रायसिंह की प्रशस्ति उत्कीर्ण है। (प्रशस्ति रचयिता जैता)

–   सूरजपोल दरवाजे के दोनों तरफ 1567 ई. के चित्तौड़ साके में वीरगति पाने वाले जयमल मेड़तिया व उसके बहनोई आमेर के राव फत्ता (पता) सिसोदिया की गजारुढ़ मूर्तियाँ स्थापित हैं।

–   दुर्ग की प्राचीर बहुत सुदृढ़ है तथा उनमें 37 बुर्जे बनी हुई हैं।

–   राजपूत एवं मुगल स्थापत्य शैली का समन्वय है।

–   उपनाम :- जमीन का जेवर लालगढ़ दुर्ग, रातीघाटी का किला।

–   दुर्ग के अनूपमहल में शासकों का राजतिलक होता था।

–   दुर्ग के दर्शनीय स्थल :- अनूप संग्रहालय, फूल महल, चन्द्र महल, लाल निवास, छत्र महल, गंगा निवास, दलेल निवास, रतन निवास आदि।

–   दुर्ग में दो कुएँ :- रामसर एवं रानीसर।

–   दुर्ग के भीतर 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर हैं, जिसमें सिंह पर सवार गणपति (हेरंब गणपति) की दुर्लभ प्रतिमा है।

–   राजस्थान में पहली बार लिफ्ट इसी दुर्ग में लगाई थी।

–   जूनागढ़ दुर्ग के सम्बन्ध में दीनानाथ दुबे की उक्ति –

   ‘दीवारों के भी कान होते है पर जूनागढ़ के महलों की दीवारें तो बोलती हैं।’

–   यह दुर्ग वास्तव में आगरा के दुर्ग से मिलता-जुलता है।

भैसरोड़गढ़ दुर्ग

–    जल दुर्ग

–   चित्तौड़गढ़ में चम्बल और बामनी नदियों के संगम पर स्थित।

–   निर्माता :- भैंसाशाह नामक व्यापारी तथा रोड़ा चारण द्वारा।

–   उपनाम :- राजस्थान का वैल्लोर।

–   कर्नल टॉड ने इसे ‘अमेद्य दुर्ग’ कहा है।

नागौर दुर्ग

–    धान्वन दुर्ग व स्थल दुर्ग।

–   निर्माण :- वि. स. 1211 में कैमास (चौहान शासक सोमेश्वर का सामन्त) द्वारा

–   उपनाम :- अहिच्छत्रपुर दुर्ग, नागदुर्ग।

–   दुर्ग में सिराई पोल, बिचली पोल, कचहरी पोल, सूरज पोल, धूपी पोल व राज पोल नामक 6 दरवाजे हैं।

–   सुदृढ़ प्राचीर एवं जल परिखा इस दुर्ग की महत्वपूर्ण सामरिक विशेषता थी।

–   1570 ई. में अकबर अजमेर में ख्वाजा साहब की जियारत करने के बाद नागौर आया तथा यहाँ पर लगभग दो महीने रहा। उसने यहाँ एक तालाब खुदवाया जिसका नाम शुक्र तालाब था।

–   नागौर का दुर्ग वीर शिरोमणि अमरसिंह राठौड़ के शौर्य एवं स्वाभिमान के लिए प्रसिद्ध है।

–   अकबर ने इस दुर्ग को बीकानेर शासक रायसिंह को सौंपा।

–   नागौर दुर्ग दुहरे परकोटे से आबद्ध हैं जिसमें 28 विशाल बुर्जे हैं।

–   दुर्ग के भीतर बादल महल एवं शीश महल में सुन्दर भित्ति चित्र बने हैं।

–   नागौर के दुर्ग की मुख्य विशेषता यह है कि इसके बाहर से चलाये गये तोपों के गोले किले के महलों को क्षति पहुँचाये बिना ही ऊपर से निकल जाते हैं।

–   इस दुर्ग में वीर अमरसिंह राठौड़ की छतरी, तारकीन की दरगाह, ज्ञानी तालाब, वंशीवाला का मंदिर, वरमाया का मंदिर, अन्न गोदाम आदि ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख हैं।

चूरू का किला

–   निर्माता :- 1739 ई. में ठाकुर कुशालसिंह

–   दुर्ग में गोपीनाथ मंदिर है।

–   अपनी आजादी व अस्मिता के लिए इस दुर्ग में ठाकुरों ने गोले-बारुद खत्म होने पर दुश्मनों पर चाँदी के गोले दागे। (ठाकुर :- शिवसिंह)

शेरगढ़ दुर्ग (धौलपुर)

–    गिरि दुर्ग

–   जोधपुर के राव मालदेव द्वारा निर्मित।

–   जीर्णोद्धार :- शेरशाह सूरी द्वारा

–   यह साम्प्रदायिक सद्‌भाव का जीता जागता नमूना है जिसमें एक तरफ सद्दीक खाँ का मकबरा तथा दूसरी तरफ हनुमानजी का मन्दिर है।

–   सैय्यद की मजार इसी दुर्ग में है। (शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित)

–   यह दुर्ग 1804 ई. से 1811 ई. की अवधि में धौलपुर के प्रथम राजा शासक कीरतसिंह की राजधानी रहा था।

–   अष्टधातु की विशाल ‘हुनहुंकार’ तोप इसी दुर्ग में है।

शेरगढ़ दुर्ग

–    बारां परवन नदी के किनारे

–   यह गिरि व जल दुर्ग है।

–   उपनाम :- कोषवर्द्धन दुर्ग, दक्षिण का द्वार।

–   कोषवर्द्धन पर्वत शिखर पर अवस्थित।

–   देवदत्त द्वारा दुर्ग के प्रवेश द्वार (बरखेड़ी दरवाजा) के पास उत्कीर्ण शिलालेख (वि. स. 847) से ज्ञात होता है कि यहाँ बिन्दुनाग, पद्‌मनाग, सर्वनाग तथा देवदत्त आदि नागवंशीय शासकों ने शासन किया।

–   देवदत्त ने दुर्ग के पास ही एक बौद्ध मठ एवं बौद्ध विहार बनवाया था।

–   इस दुर्ग में झाला जालिमसिंह ने शेरगढ़ का जीर्णोद्धार करवाया तथा ‘झालाओं की हवेली’ भवन का निर्माण किया।

–   इस दुर्ग में सोमनाथ मंदिर, चारभुजा मंदिर, झालाओं की हवेली, अमीर खाँ महल आदि दर्शनीय स्थल हैं।

मैगजीन किला

–    अजमेर में मुगल शासक अकबर द्वारा 1571-72 ई. में निर्माण।

–   अन्य नाम :- अकबर का दौलतखाना, मुगल किला।

–   यह मुगलों द्वारा मुस्लिम-हिन्दू दुर्ग निर्माण पद्धति से बनाया गया राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है।

–   1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध की अन्तिम योजना इसी दुर्ग में बनी थी।

–   10 जनवरी, 1616 को इंग्लैण्ड सम्राट जेम्स प्रथम के दूत टॉमस रो ने इसी दुर्ग में बादशाह जहाँगीर से मुलाकात की थी।

–   1801 ई. में अंग्रेजों ने इस किले पर अधिकार कर इसे अपना शस्त्रागार (मैगजीन) बना लिया।

–   अकबर का किला वर्गाकार व पश्चिमोन्मुखी है।

–   अकबर के पुत्र दनियाल तथा शाहजहाँ के पुत्र शहजादा शुजा का जन्म इसी किले में हुआ।

–   इस किले में राजकीय पुरातात्विक संग्रहालय (राजपुताना म्यूजियम) है।

बयाना दुर्ग

–    गिरि व वन दुर्ग।

–   यादव वंशी राजा विजयपाल ने यह दुर्ग भरतपुर में दमदमा पहाड़ी पर 1040 ई. के लगभग बनाया था।

–   दुर्ग का अन्य नाम :- विजयमंदिरगढ़

–   भीम लाट (उषा लाट) :- दुर्ग के भीतर लाल पत्थरों से निर्मित 8 मंजिला ऊँची लाट। इसे राजस्थान की कुतुबमीनार कहा जाता है। इसे महाराजा विष्णुवर्द्धन द्वारा बनवाया गया था।

–   उषा मंदिर :- वि. स. 1012 ई. में रानी चित्रलेखा द्वारा निर्मित।

–   इस दुर्ग में समुद्रगुप्त द्वारा बनाया गया विजय स्तम्भ भी है।

–   खानवा के युद्ध के बाद बाबर इसी दुर्ग में आया था।

–   यहाँ लोदी मीनार, अकबर की छतरी, जहाँगीरी दरवाजा, सराय सादुल्ला (1565 ई. में निर्मित), दाउद खाँ की मीनार दर्शनीय है।

–   इस मंदिर का मुख्य द्वार लाल पत्थरों का बना है।

–   राजस्थान का एकमात्र दुर्ग जिसमें सर्वाधिक कब्रे हैं।

–   यह दुर्ग दिल्ली के सुल्तानों के युद्ध के संचालन व सैनिक विश्राम गृह का कार्य करता था।

–   हुमायूँ के शासनकाल में उसके चचेरे भाई मुहम्मद जमान मिर्जा को इसी दुर्ग में कैद रखा गया।

खण्डार का किला

–    सवाईमाधोपुर से लगभग 40 किमी. पूर्व में स्थित गिरि दुर्ग।

–   आकृति :- त्रिभुजाकार।

–   यहाँ अष्टधातु निर्मित ‘शारदा तोप’ अपनी मारक क्षमता हेतु प्रसिद्ध है। यह रणथम्भौर के चौहान वंशीय शासकों द्वारा 8वीं – 9वीं सदी में निर्मित दुर्ग है।

–   इस दुर्ग का उपयोग मूलत: सैन्य साज-सज्जा, युद्ध अभियानों की तैयारी, सैनिक प्रशिक्षण तथा अन्य सैनिक गतिविधियों के लिए किया जाता है।

–   दुर्ग में प्रमुख जलाशय :- सता कुण्ड, लक्ष्मण कुण्ड, बाण कुण्ड, झिरी कुण्ड आदि।

तिमनगढ़ (त्रिभुवनगढ़)

–    करौली में निर्मित गिरि दुर्ग।

–   निर्माता :- तहणपाल अथवा त्रिभुवनपाल द्वारा 11वीं सदी में।

–   मुस्लिम आधिपत्य के बाद इसका नाम इस्लामाबाद कर दिया गया था।

–   त्रिभुवनगिरि पहाड़ी पर निर्मित।

–   मुख्य प्रवेश द्वार :- जगनपोल एवं सूर्यपोल।

–   हसन निजामी द्वारा लिखित ‘ताज-उल-मिसिर’ तथा मिनहाज सिराज कृत ‘तबकाते नासिरी’ में तिमनगढ़ के ऊपर गौरी के अधिकार का उल्लेख हुआ है।

–   दुर्ग में खास महल, ननद-भोजाई का कुआँ, राजगिरी, दुर्गाध्यक्ष के महल आदि हैं।

भोपालगढ़ दुर्ग

–    खेतड़ी में तत्कालीन ठाकुर भोपालसिंह द्वारा 1770 ई. में निर्मित।

–   उपनाम :- खेतड़ी का हवा महल।

–   यह दुर्ग संकीर्ण गलियारों के लिए प्रसिद्ध है।

बसन्तगढ़ दुर्ग

–    सिरोही जिले में बसन्तगढ़ दुर्ग का निर्माण मेवाड़ महाराणा कुम्भा ने करवाया था। दुर्ग में सूर्य मन्दिर एवं दत्तात्रेय का मंदिर स्थित है।

–   दुर्ग के प्राचीरों में सीमेन्ट या चूने का प्रयोग नहीं किया गया है। दुर्ग की पहाड़ी पर खींवल माता का मंदिर बना हुआ है।

भानगढ़ दुर्ग

–    अजबगढ़ (अलवर) में स्थित।

–   निर्माता :- माधोसिंह द्वारा 1631 ई. में।

–   वर्तमान में ‘भूतहा किले’ के रूप में प्रसिद्ध है।

–   यह दुर्ग सरिस्का अभयारण्य की सीमा के पास पहाड़ी पर स्थित है।

–   इस दुर्ग में मंगला माता मंदिर, नटणी की हवेली, भैरव गोपीनाथ, हनुमान मंदिर, सेवडे की छतरी सुरंग, गोमुख कुण्ड, बालकनाथ की धूनी आदि वर्तमान में खण्डहरों के रूप में हैं।

नीमराणा किला

–    ‘पंचमहल’ के नाम से विख्यात दुर्ग।

–   अलवर में 1464 ई. में चौहान शासकों के द्वारा निर्मित।

–   वर्ष 2008 में ‘नीमराणा फोर्ट पैलेस’ में तब्दील।  

कोटा दुर्ग

–    चम्बल नदी के किनारे स्थित जल दुर्ग।

–   निर्माता :- माधोसिंह द्वारा।

–   प्रवेश द्वार :- पाटन पोल, कैथूनी पोल, सूरज पोल, हाथी पोल एवं किशोरपुरा दरवाजा।

–   महल :- जैतसिंह महल, कँवरपदा महल, केसर महल, अर्जुन महल, चन्द्र महल, हवा महल आदि।

   दुर्ग के भीतर ‘महाराजा माधवसिंह म्यूजियम’ रियासतकालीन कला एवं संस्कृति का अद्भूत खजाना है।

अन्य दुर्ग

1. राजोरगढ़ दुर्ग :

–    टहला कस्बा (अलवर) में स्थित दुर्ग।

–   यहाँ 12वीं सदी तक बड़गूजर शासकों का अधिकार रहा।

–   10वीं सदी में मंथन देव ने भव्य नीलकण्ठ महादेव मंदिर बनवाया।

–   नौगजा मंदिर :- जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का मंदिर।

–   अन्य नाम :- नीलकण्ठ दुर्ग।

–   इस दुर्ग का उपयोग मुख्य रूप से सैनिक कार्यों व युद्ध अभियानों हेतु होता था।

2. कांकणवाड़ी का दुर्ग :

–    गिरि व वन दुर्ग।

–   अलवर के सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य के मध्य

–   सघन और बीहड़ वन में स्थित।

–   निर्माता :- महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा।

–   मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने पराजित भाई दाराशिकोह को इसी दुर्ग में कैद रखा था।

–   कांकणवाड़ी दुर्ग दूर से तो दिखाई देता है परन्तु पास जाने पर वृक्षों के झुरमुट में छिप जाता है।

3. सोजत दुर्ग

–    गिरि दुर्ग।

–   राव जोधा के पुत्र नीम्बा द्वारा 15वीं सदी में निर्मित। मेवाड़-मारवाड़ सीमा पर स्थित दुर्ग।

–   जोधपुर शासक राव मालदेव ने इस दुर्ग के चारों ओर विशाल एवं सुदृढ़ परकोटे का निर्माण करवाया।

–   इस दुर्ग में राव मालदेव के पुत्र राम ने रामेलाव तालाब बनवाया।

4. माधोराजपुरा का किला

–    जयपुर में स्थित स्थल दुर्ग।

–   निर्माता :- सवाई माधोसिंह प्रथम (मराठा विजय के उपलक्ष्य में निर्माण)।

–   इस किले के साथ अमीर खां पिण्डारी की बेगमों को बंधक बनाने तथा लदाणा के ठाकुर भरतसिंह नारुका की वीरता की रोमांचक दास्तान जुड़ी हुई है।

5. चौमू का किला

–   जयपुर के चौमू कस्बे में अवस्थित भूमि दुर्ग।

–   निर्माण :- ठाकुर कर्णसिंह द्वारा (बेणीदास नामक साधु के आशीर्वाद से)

–   अन्य नाम :- रघुनाथगढ़, धाराधारगढ़।

–   प्रवेश द्वार :- रावण दरवाजा, होली दरवाजा, बावड़ी दरवाजा, पीहाला दरवाजा।

6.नाहरगढ़ दुर्ग

–    बारां में।

–   लाल पत्थरों से निर्मित।

–   इसकी आकृति दिल्ली के लाल किले के समान है।

7.शाहबाद का किला

–    बारां में स्थित गिरि दुर्ग। प्रथम मान्यता के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 9वीं सदी में परमार शासकों द्वारा किया गया था। जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार इस दुर्ग का निर्माता चौहान शासक मुकुटमणिदेव था। इस दुर्ग का जिर्णोद्वार अफगान शासक शेरशाह सूरी द्वारा करवाया गया। इस दुर्ग में रखी ‘नवलबाण तोप’ दूर तक मार करने के कारण प्रसिद्ध है।

8. लक्ष्मणगढ़ दुर्ग

–    सीकर।

9. भूमगढ़/असीरगढ़ दुर्ग

–    टोंक में 17वीं सदी में ब्राह्मण भोला द्वारा निर्मित।

–   उपनाम :- दक्खन की चाबी।

10. कुचामन दुर्ग

–    जालिम सिंह द्वारा कुचामन (नागौर) में इस दुर्ग की नींव रखी गई। गिरि दुर्ग।

–   उपनाम :- जागीरी किलों का सिरमौर।

11. फतेहपुर दुर्ग

–    धान्वन व भूमि दुर्ग।

   शेखावाटियों का सबसे महत्वपूर्ण दुर्ग।

–   निर्माता :- 1453 ई. में फतन खाँ कायमखानी द्वारा।

   दुर्ग के भीतर ‘तेलिन का महल’ बड़ा प्रसिद्ध है।

12. सज्जनगढ़ दुर्ग

–    उदयपुर की बांसदरा पहाड़ियों पर निर्मित।

–   निर्माता :- महाराणा सज्जनसिंह द्वारा

   गिरि दुर्ग।

–   उपनाम :- उदयपुर का मुकुटमणि।

–   दुर्ग में महाराणा सज्जनसिंह द्वारा 1881 ई. में वाणी विलास पैलेस एवं गुलाबबाड़ी का निर्माण करवाया।

13.टॉडगढ़ दुर्ग

–   अजमेर में कर्नल जेम्स टॉड द्वारा निर्मित।

14. करणसर दुर्ग

–    जयपुर में चार बुर्जों वाला किला।

–   निर्माता :- बहादुरसिंह राणावत

15. गीजगढ़ दुर्ग

–    दौसा में।

–   गीजगढ़ चम्पावतों की जागीर का ठिकाना था। यह किला नाव या जहाज की आकृतिनुमा स्वरूप में निर्मित है।

16. उटगिरी का किला

–    कल्याणपुर (करौली) के पास स्थित

–   दुर्ग का मुख्य द्वार :- इमली पोल।

–   निर्माता :- लोधी राजपूत।

–   अन्य नाम :- उदित नगर दुर्ग।

17. वैरगढ़ दुर्ग

–    भरतपुर में।

–   निर्माता :- प्रतापसिंह (1726 ई. में)

18.मंडरायल दुर्ग

–    करौली में चम्बल नदी के तट पर एक ऊँची पहाड़ी पर लाल पत्थरों से निर्मित दुर्ग।

–   उपनाम :- ग्वालियर दुर्ग की चाबी।

19. मालकोट का दुर्ग

–    मेड़ता (नागौर) में। राजा मालदेव द्वारा निर्मित।

20. तिजारा का दुर्ग

–    अलवर में। तिजारा में हजरत गद्दनशाह पीर की मजार है।

21. बनेड़ा का किला

–    भीलवाड़ा में।

   यह राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है जो निर्माण से लेकर अभी तक अपने मूल स्वरूप में यथावत स्थित में है।

22. कोटकास्ता का किला

–    जालौर में।

   इसे ‘नाथों का दुर्ग’ भी कहा जाता है।

23. गुमट का दुर्ग

–    बाड़ी (धौलपुर) में।

24. राजगढ़ दुर्ग

–    अलवर में।

25. मनोहरथाना दुर्ग

–    झालावाड़ में। (जल दुर्ग)

–   निर्माता :- महाराव भीमसिंह (कोटा)।

26. सोढ़लगढ़ दुर्ग

–    सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) में स्थित धान्वन दुर्ग।

   बीकानेर नरेश सूरतसिंह द्वारा 1799 ई. में निर्मित।

27. किलोणगढ़ दुर्ग

–    बाड़मेर में 1552 ई. में राव भीमोजी द्वारा निर्मित गिरि दुर्ग।

28. ऊँटाला का किला

–    वल्लभगढ़ (उदयपुर) में स्थित दुर्ग।

29. झाइन दुर्ग

–    सवाईमाधोपुर।

   उपनाम :- रणथम्भौर की कुंजी।

30. मीठडी दुर्ग

–    जयपुर।

31. नवल खाँ दुर्ग :

–    झालावाड़ में।

   निर्माता :- झाला पृथ्वीसिंह।

32. काकोड़ दुर्ग

–    टोंक में।

33. बोराज का दुर्ग    

–    जयपुर में।

34. तोहन दुर्ग

–    कांकरोली (राजसमन्द)

35. टांई का किला

–    टांई (झुंझुनूं)

36.केहरीगढ़ दुर्ग

–    अजमेर

37. पचेवर का किला

–    टोंक

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :-

–   राजस्थान में सर्वाधिक दुर्गों का निर्माण मेवाड़ महाराणा कुम्भा द्वारा किया गया था। कुम्भा ने 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण किया।

–   जो दुर्ग दुश्मन द्वारा जीते नहीं गये हो, उन्हें बाला किला कहा जाता है।

–   रणथम्भौर की विजय के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग उलुग खान को सौंपा।

–   हम्मीर देव ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सेनापति मीर मुहम्मदशाह को रणथम्भौर दुर्ग में शरण दी थी।

–   कुम्भलगढ़ दुर्ग की दीवार की लम्बाई 36 किमी. है।

–   घूंघट, गूगड़ी, बांदरा, इमली :- तारागढ़ (अजमेर) की प्राचीर की विशाल बुर्जे।

–   मर्दानशाह की मस्जिद मंडरायल दुर्ग (करौली) में है।

–   पाशीब :- किले की प्राचीर से हमला करने के लिए रेत एवं अन्य वस्तुओं से निर्मित एक ऊँचा चबूतरा।

–   शुक्रनीति के अनुसार सैन्य दुर्ग सर्वश्रेष्ठ दुर्ग है।

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग : एक दृष्टि में
दुर्गनिर्माताउपनाम
जैसलमेरराव जैसलसोनारगढ़,त्रिकुटगढ़उत्तर भड़ किवाड़
जोधपुरराव जोधामेहरानगढ़मयूरध्वजगढ़गढ़चिंतामणि
जालोरप्रतिहार शासकसुवर्णगिरिसोनलगढ़जाबालिपुरकनकाचल
भरतपुरसूरजमललोहागढ़मिट्टी काकिला
हनुमानगढ़भाटी राजा भूपतभटनेर दुर्गउत्तरी सीमा का प्रहरी
भैंसरोड़गढ़भैंसाशाह व्यापारी व रोड़ चारण (बंजारा)राजस्थान का वेल्लोर
चूरूठाकुर कुशालसिंहचाँदी के गोले दागने वाला किला
अजमेरअजयपालअजयमेरुगढ़बीठलीतारागढ़,राजस्थान का जिब्राल्टर
चित्तौड़गढ़मौर्य राजा चित्रांग (चित्रांगद)चित्रकूट किलागढ़ों का सिरमौर
कुम्भलगढ़(राजसमन्द)महाराणा कुम्भामेवाड़ की आँखकुंभलमेरुकुंभलमेरमाहोर
मैग्जीन (अजमेर)अकबरअकबर का किलाअकबर का दौलतखाना
गागरोण (झालावाड़)डोड, परमार राजाओं द्वारा निर्मित मालदेधूलरगढ़डोडगढ़
शेरगढ़ (धौलपुर)मालदेवदक्खिन का द्वार गढ़
जयगढ़ (जयपुर)सवाई जयसिंहमिर्जा राजा  जयसिंहचिल्ह का टोला
नाहरगढ़ (जयपुर)सवाई जयसिंह II, सवाई रामसिंह IIसुदर्शनगढ़

नदियों के तट पर स्थित दुर्ग

दुर्गजिलानदी
गागरोण का दुर्गझालावाड़कालीसिंध व आहू नदियों के संगम पर स्थित
मनोहर थाना दुर्गझालावाड़परवन व काली खाड् नदियों के संगम पर स्थित
चित्तौड़गढ़चित्तौड़गढ़गंभीरी व बेड़च नदियों के संगम पर स्थित
सुवर्णगिरिजालोरसूकड़ी
कोटा दुर्गकोटाचम्बल

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