राजस्थानी चित्रकला | राजस्थान की चित्रकला

राजस्थानी चित्रकला | राजस्थान की चित्रकला

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राजस्थानी चित्रकला विश्व विख्यात है। राजस्थानी चित्रकला में राजस्थान के इतिहास , कला एंव संस्कृति की झलक है।
समय के साथ परिवर्तन के दौर में राजस्थानी चित्रकला को सरंक्षण देने के लिए विभिन योजनाए किर्यान्विन्त है।

राजस्थानी चित्रकला शैली का प्रारंभ 15वीं से 16वीं शताब्दी के मध्य माना जाता है।

प्रसिद्ध राजस्थानी चित्रकला में चटकीले-भड़कीले रंगों का प्रयोग किया गया है। विशेषतः पीले व लाल रंग का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है।राजस्थान की चित्रकला शैली में अजंता व मुगल शैली का सम्मिश्रण पाया जाता है।

राजस्थानी चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ :

– पूर्णतः भारतीय चित्र बनाये गये।

– चित्रकला में अलंकारिता की प्रधानता।

– मुगल प्रभाव के फलस्वरूप राजस्थानी चित्रकला में व्यक्ति चित्र बनाने की परम्परा शुरू हुई, जिन्हें सबीह कहा गया। इस प्रकार के चित्र जयपुर शैली में सबसे अधिक बनाये गये हैं।

– राजस्थान की चित्रकला में पट चित्र बनाये गये। इस प्रकार के चित्र अधिकतर कृष्ण-भक्ति से संबंधित है।

– यहां के चित्र प्राकृतिक अलंकरणों से सुसज्जित हैं।

राजस्थानी चित्रकला को राजपूत चित्रकला शैली भी कहा जाता है।

आनंद कुमार स्वामी- सर्वप्रथम अपने ग्रंथ ‘राजपूत पेन्टिग‘ में राजस्थान की चित्रकला के स्वरूप को 1916 ई. में उजागर किया।

मेवाड़- राजस्थानी चित्रकला का उद्गम स्थल।

दसवैकालिक सूत्र चूर्णि, आघनिर्युक्ति वृत्ति- जैसलमेर के प्राचीन भण्डारों में उपलब्ध इन चित्रों को भारतीय कला का दीप स्तंभ माना जाता है।

भित्ति चित्र व भूमि चित्र

आकारद चित्र- भरतपुर जिले के दर, कोटा जिले के दर्रा व आलणियां, जयपुर जिले के बैराठ आदि स्थानों के शैलाश्रयों में आदि मानव द्वारा उकेरे गये रेखांकित चित्र मिलते हैं।

भराड़ी- भील युवती के विवाह पर घर की भीत यानी दीवार पर भराड़ी का बड़ा ही आकर्षक और मांगलिक चित्र बनाया जाता है।

– भराड़ी भीलों की लोकदेवी है जो गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर रहे लाडा-लाड़ी (वर-वधू) के जीवन को सब प्रकार से भरा-पूरा रखती है।

सांझी- लोक चित्रकला में गोबर से बनाया गया पूजा स्थल, चबूतरे अथवा आंगन पर बनाने की परम्परा।

संझपा कोट- सांझी का एक रूप।

मांडणा- शाब्दिक अर्थ/उद्देश्य-अलंकृत करना। यह अर्मूत व ज्यामितीय शैली का अपूर्व मिश्रण होता है, स्त्री के हृदय में छिपी भावनाओं, आकांक्षाओं व भय को भी दर्शाते हैं।

कागज पर निर्मित चित्र

पाने- कागज पर बने विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र जो शुभ, समृद्धि व प्रसन्नता के द्योतक हैं।

– श्रीनाथजी के पाने सर्वाधिक कलात्मक होते हैं जिन पर 24 शृंगारों का चित्रण पाया जाता है।

लकड़ी पर निर्मित चित्र

कावड़- मंदिरनुमा लाल रंग की काष्ठाकृति होती है जिसमें कई द्वार होते हैं, सभी कपाटों पर राम, सीता, लक्ष्मण, विष्णुजी व पौराणिक कथाओं के चित्र अंकित रहते हैं, कथावाचन के साथ-साथ ये कपाट भी खुलते जाते हैं। यह चारण जाति के लोगों द्वारा बनाया जाता है।

खिलौनें- चित्तौड़गढ़ का बस्सी नामक स्थान कलात्मक वस्तुओं (खिलौनें) के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा खिलौनों हेतु उदयपुर भी प्रसिद्ध है।

मानव शरीर पर निर्मित चित्र

गोदना (टैटू)– निम्न जाति के स्त्री-पुरुषों में प्रचलित; इसमें सूई, बबूल के कांटे या किसी तेज औजार से चमड़ी को खोदकर उसमें काला रंग भरकर पक्का निशान बनाया जाता है। गोदना सौंदर्य का प्रतीक है।

मेहंदी- मेहंदी का हरा रंग कुशलता व समृद्धि का तथा लाल रंग प्रेम का प्रतीक है। मेहंदी से हथेली पर अलंकरण बनाया जाता है।

महावर (मेहंदी) राजस्थान की मांगलिक लोक कला है जो सौभाग्य या सुहाग का चि मानी जाती है, सोजत (पाली) की मेहंदी विश्व प्रसिद्ध है।

कपड़े पर निर्मित चित्र

वार्तिक- कपड़े पर मोम की परत चढ़ाकर चित्र बनाना।

पिछवाई- मंदिरों में श्रीकृष्ण की प्रतिमा के पीछे दीवार को कपड़े से ढ़ककर उस पर सुंदर चित्रकारी करना।

– यह वल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों में विशेष रूप से प्रचलित है।

राजस्थान की चित्रकला की विभिन्न पद्धतियाँ :

1.  जलरंग पद्धति- इसमें मुख्यतः कागज का प्रयोग होता है। इस चित्रण में सेबल की तूलिका श्रेष्ठ मानी जाती है।

2.  वाश पद्धति- इस पद्धति में केवल पारदर्शक रंगों का प्रयोग किया जाता है।
इस पद्धति में चित्रतल में आवश्यकतानुसार रंग लगाने के बाद पानी की वाश लगाई जाती है।

3.  पेस्टल पद्धति- पेस्टल सर्वशुद्ध और साधारण चित्रण माध्यम है। इसमें रंगत बहुत समय तक खराब नहीं होती।

4.  टेम्परा पद्धति- गाढ़े अपारदर्शक रंगों के प्रयोग को टेम्परा कहा जाता है।
इसमें माध्यम के रूप में किसी पायस का उपयोग किया जाता है। पायस जलीय तरल में तैलीय अथवा मोम पदार्थ का मिश्रण होता है।

5.  तैलरंग विधि- तैल चित्रण के लिए विभिन्न प्रकार की भूमिका का प्रयोग किया जाता है।
जैसे-कैनवास, काष्ठ फलक, मौनोसाइट/हार्ड बोर्ड, गैसों, भित्ति इत्यादि।

विभिन्न चित्रशैलियों की प्रमुखता

चित्र शैलीरंग आँख मुख्य वृक्ष
जयपुर हरा             मछलीनुमा पीपल, वट
जोधपुर    पीला बादाम जैसी  आम
मेवाड़      लाल –             कदम्ब
कोटा       नीला  मछलीनुमा   खजूर
किशनगढ़ गुलाबी व सफेदखंजन जैसी  केला
राजस्थानी चित्रकला

मेवाड़ शैली

चित्रकला की सर्वाधिक प्राचीन शैली मेवाड़ शैली को विकसित करने में महाराणा कुंभा का विशेष योगदान रहा।

– यह चित्र शैली राजस्थानी चित्रकला का प्रारंभिक और मौलिक रूप है।

मेवाड़ में आरंभिक चित्र ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी‘ (सावग पड़िकमण सुत चुन्नी) ग्रंथ से 1260 ई. के प्राप्त हुये हैं।
इस ग्रंथ का चित्रांकन राजा तेजसिंह के समय में हुआ।

– यह मेवाड़ शैली का सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ है। दूसरा ग्रंथ ‘सुपासनाह चरियम‘ (पार्श्वनाथ चरित्र) 1423 ई.
में देलवाड़ा में चित्रित हुआ।

केशव की रसिक प्रिया तथा गीत गोविंद मेवाड़ शैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

प्रमुख विशेषताएं-

भित्ति चित्र परम्परा का विशेष महत्व, रंग संयोजन की विशेष प्रणाली, मुख्य व्यक्ति अथवा घटना का चित्र,
सजीवता और प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करने के लिए भवनों का चित्रण, पोथी ग्रंथों का चित्रण आदि।

– इस शेली में पीले रंग की प्रधानता है। मेवाड़ शैली के चित्रों में प्रमुखतः कदम्ब के वृक्ष को चित्रित किया गया है।

वेशभूषा- सिर पर पगड़ी, कमर में पटका, घेरदार जामा, कानों में मोती।

पुरुष आकृति- लम्बी मूंछें, विशाल आंखें, छोटा कद एवं कपोल, गठिला शरीर।

स्त्री आकृति- ओज एवं सरल भावयुक्त चेहरे, मीनकृत आंखें ठुड्डी पर तिल, लहंगा व पारदर्शी ओढ़नी, ठिगना कद, दोहरी चिबुक।

मेवाड़ शैली के प्रमुख चित्रकार- कृपाराम, भैंरूराम, नासिरूद्दीन, हीरानंद, जगन्नाथ, मनोहर, कमलचन्द्र।

प्रमुख चित्र- कृष्ण लीला, नायक-नायिका, रागमाला, बारह मासा इत्यादि विषयों से संबंधित।

राणा अमरसिंह प्रथम

(1597 से 1620 ई.) के समय में रागमाला के चित्र चावंड में निर्मित हुये।
इन चित्रों को निसारदीन ने चित्रित किया। इनका शासनकाल मेवाड़ शैली का स्वर्णयुग माना जाता है।

महाराणा अमरसिंह द्वितीय के काल में शिव प्रसन्न अमर-विलास महल मुगल शैली में बने जिन्हें आजकल ‘बाड़ी-महल‘ माना जाता है।

राणा कर्णसिंह के काल में मर्दाना महल एवं जनाना महल का निर्माण हुआ।

मेवाड़ में राणा जगतसिंह प्रथम का काल भी चित्रकला के विकास का श्रेष्ठ काल था।

– इस काल में रागमाला, रसिक प्रिया, गीगोविंद, रामायण इत्यादि लघु चित्रों का निर्माण हुआ।

– राणा जगतसिंह कालीन प्रमुख चित्रकार साहबदीन और मनोहर रहे हैं। साहबदीन की शैली का प्रभाव मेवाड़ में आज भी देखा जा सकता है।

चितेरों की ओरी-

महाराणा जगत सिंह प्रथम ने राजमहल में यह कला विद्यालय स्थापित किया।
इसे ‘तसवीरां रो कारखानो‘ नाम से भी जाना जाता था।

महाराणा संग्रामसिह द्वितीय के पश्चात् साहित्यिक ग्रंथों के आधार पर लघु चित्रों की परम्परा लगभग समाप्त हो जाती है।

उदयपुर के राजकीय संग्रहालय में मेवाड़ शैली के लघु चित्रों का विशाल भण्डार है।

– यह विश्व में मेवाड़ शैली का सबसे विशाल संग्रह है। इस संग्रह में ‘रसिक प्रिया‘ का चित्र सबसे प्राचीन चित्र है।

पराक्रम शैली का विकास साधारण तौर पर उदयपुर से हुआ।

कलीला-दमना

अरबी-फारसी ग्रंथों में कलीला-दमना एवं मुल्ला दो प्याजा के लतीफे उल्लेखनीय हैं।

‘कलीला दमना‘ पंचतंत्र का अनुवाद है।

करटक तथा दमनक का बदलता हुआ रूप कलीला-दमना है।

कलीलादमना एक रूपात्मक कहानी है जिसमें एक ब्राह्मण ‘राजपुत्रों‘ को उपदेशात्मक कहानियां सुनाता है।

ब्राह्मण अपनी शिक्षा को जानवरों के प्रतीक स्वरूप प्रस्तुत करता है।

सुरयानी- सन् 570 में इस भाषा में पंचतंत्र का अनुवाद हुआ व करटक आर दमनक क्रमशः
कलीलाक और दमनाक हो गए।

अब्दुला इब्ने मुकफा- 15वीं शताब्दी में इन्होंने फारसी भाषा में पंचतंत्र का अनुवाद ‘अन्वारे सुहैली‘ शीर्षक से किया।

बगदाद- कलीला-दमना के आधार पर सर्वप्रथम सचित्र पुस्तक 1258 ई. में यहां तैयार की गई।

अबुल-फजल- मुगल सम्राट अकबर के काल में इन्होंने इसका अनुवाद फारसी में ‘आयरे दानिश‘ के नाम से किया।

नाथद्वारा शैली

यहां की चित्रकारी में भक्तों ने अनेक अवतारों की लीलाओं का रोचक वर्णन किया है।

नाथद्वारा में मुख्यतः कृष्ण यशोदा के चित्र हैं।

कृष्ण की लीला का जितना मोहक रूप यहां बताया गया है उतना अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।
कृष्ण लीला के चित्रों में मौलिकता और कल्पना की पराकाष्ठा देखने को मिलती है।
यहाँ की चित्रकला शैली ‘पिछवाई’ कहलाती है।

जोधपुर (मारवाड़) शैली

जोधपुर के अतिरिक्त नागौर, जालौर, मेड़ता व कुचामन इत्यादि भी कला के उत्तम केन्द्र थे।
इसीलिए इसे जोधपुर शैली न कहकर मारवाड़ी शैली कहना अधिक उचित होगा।

मारवाड़ चित्रकला में अजन्ता शैली की परम्परा का निर्वाह किया है।

मारवाड शैली के पूर्ण विकास का काल 16वीं से 17वीं सदी रहा।

मारवाड़ शैली के चित्र राजकीय विषयों को लेकर बनाये गये।

यह शैली मुगल शैली सेइतनी प्रभावित हुई कि अपनी स्वतंत्र सत्ता ही खो बैठी।

– मुगल कला के प्रभाव के कारण इस शैली में अंतःपुर के विलासितापूर्ण दृश्य भी बनाये गये।
स्त्रियों का अंकन लावण्यपूर्ण है। यह शैली बाद में सामाजिक जीवन के अधिक निकट आई।

राव मालदेव-

मारवाड़ में कला एवं संस्कृति को नवीन परिवेश देने का श्रेय इन्हें दिया जाता है। मालदेव से पूर्व मारवाड़ की चित्रकला शैली पर मेवाड़ का पूर्ण प्रभाव था।

– इनके समय चोखेलाव महल में मार्शल टाइप के चित्र बनाये गये। इसमें बल्लियों पर राम-रावण युद्ध का भावपूर्ण चित्रण किया गया है। इनका मूल उद्देश्य प्राचीन पौराणिक गाथाओं का यशोगान करना था।

– मालदेव के समय में (1531-1562 ई. के मध्य) मारवाड़ में स्वतंत्र चित्र शैली का जन्म व विकास हुआ।

प्रमुख चित्र- मूमल निहालदे, ढ़ोला मारू, कल्याण रागिनी, रूपमति बाज बहादुर, जंगल में कैम्प, दरबारी जीवन, राजसी ठाठ, उत्तराध्यान सूत्र (1591 ई. में चित्रित), मरु के टीलें, छोटी-छोटी झाड़ियों व पौधों के चित्र।

इस शैली में पीले व लाल रंग की प्रधानता है।

प्रमुख चित्रकार-

किशनदास भाटी, शिवदास भाटी एवं देवदास भाटी, वीरजी, नारायनदा, भाटी अमरदास, छज्जू भाटी, जीतमल, काला, रामू।

जोधपुर शैली में बादाम की तरह आंखों तथा पशु-पक्षियों में प्रमुखतः ऊंट व कौए को चित्रित किया गया है। इस शैली में आम के वृक्ष को प्रमुख रूप से चित्रित किया गया है।

द महाराजा ऑफ जोधपुर द ग्लेक्सी लिव्स आन-

प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक अनु मल्होत्रा ने बप्पाजी के नाम से लोकप्रिय जोधपुर राजघराने के महाराज गजसिंह द्वितीय के ऊपर यह एक वृत्त चित्र बनाया है जिसमें राजघराने की परम्परागत जीवनशैली में तेजी से आ रही गिरावट को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

– फिल्म समारोहों में पहले ही प्रदर्शित हो चुका यह वृत्तचित्र डिस्कवरी चैनल पर भी दो भागों में दिखाया गया। यह वृत्तचित्र जोधपुर के महाराज के एक साल के दौरान के क्रियाकलापों पर आधारित है।

महाराजा अजीतसिंह- मारवाड़ शैली का स्वतंत्र रूप से उदय इनके शासनकाल में हुआ। इनके शासनकाल के चित्र सम्भवतः मारवाड़ शैली के सबसे अधिक सुन्दर एवं प्राणवान चित्र हैं।

विजयसिंह- इनके समय में भक्ति और शृंगार रस के चित्रों का निर्माण हुआ। इस समय चित्रों में मुगल प्रभाव समाप्त हो गया।

महाराजा मानसिंह- इनके शासनकाल में मारवाड़ शैली का अंतिम महत्वपूर्ण चरण प्रारम्भ हुआ। इन्होंने कर्नल टॉड को मारवाड़ का इतिहास लिखने में मदद प्रदान की।

बीकानेर शैली

रायसिंह- इन्होंने मुगल कलाकारों की दक्षता से प्रभावित होकर उनमें से कुछ को अपने साथ ले आये। इनमें उस्ता अली रजा व उस्ता हामिद रुकनुद्दीन प्रमुख थे।

गजसिंह- इनके समय बीकानेर राज दरबार में मुख्य चित्रकार शाह मुहम्मद थे जो कि लाहौर से आये थे।

राजा अनूपसिंह- इनके काल में बीकानेर शैली का समृद्ध काल देखने को मिलता है।

– इनके समय के प्रमुख चित्रकारों में अलीरजा, हसन और रामलाल आदि के नाम उल्लेखनीय है।

महाराजा डूंगरसिंह-

इनके शासनकाल में बीकानेर शैली में मुगल प्रभाव कम होता चला गया और यूरोपीयन प्रभाव की ओर से यहां की चित्रकला का प्रभाव बढ़ा।

बीकानेर में कर्णसिंह और कल्याणमल ने भी चित्रकला को पूरा संरक्षण प्रदान किया। सबसे प्राचीन रेखांकन राव कल्याणमल के समय का है।

मेघदूत- बीकानेर की मौलिक शैली के सर्वप्रथम दर्शन हमें कालिदास के मेघदूत में मिलते हैं।

उस्ता कला- इस शैली के उद्भव का श्रेय उस्ता कलाकारों को दिया जाता है। यह बीकानेर शैली की निजी विशेषता है। बीकानेर के चित्रकार अनेक चित्रों पर अपना नाम और तिथि अंकित करते थे।

– मथेरणा व उस्ता परिवार बीकानेर शैली के प्रसिद्ध परिवार रहे हैं।

– बीकानेर शैली पर मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। बीकानेर के चित्रकार अधिकतर मुसलमान थे।

हरमन गोएट्ज-

जर्मन कलाविद्, इन्होंने बीकानेर की लघु चित्र शैली के उद्भव के संबंध में आर्ट एण्ड आर्किटेक्ट ऑफ बीकानेर पुस्तक की रचना की।

राजपूत पेंटिंग्ज बीकानेर शैली अपने व्यक्तित्व का बोध कराती है और इसका दृष्टिकोण अत्यन्त मार्मिक है।

प्रमुख चित्र- कृष्ण लीला, भागवत् गीता, भागवत् पुराण (बीकानेर शैली का प्रारंभिक चित्र, महाराजा रायसिंह के समय चित्रित), रागमाला, बारहमासा, रसिकप्रिया, रागरागिनी, शिकार महफिल तथा सामंती वैभव के दृश्य इत्यादि।

बीकानेर शैली के चित्रों में पीले रंग का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है।

पुरुष आकृति- दाढ़ी-मूंछों युक्त वीर भाव प्रदर्शित करती हुई उग्र आकृति।

वेशभूषा- ऊंची शिखर के आकार की पगड़ी, फैला हुआ जामा, पीठ पर ढाल और हाथ में भाला लिये हुए।

स्त्री आकृति- इकहरी तन्वंगी नायिका, धनुषाकार भृकुटी, लम्बी नाक, उन्नत ग्रीवा एवं पतले अधर।

वेशभूषा- तंग चोली, घेरदार घाघरा, मोतियों के आभूषण एवं पारदर्शी ओढ़नी।

किशनगढ़ शैली

इस शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय एरिक डिक्सन व डॉ. फैयाज अली को है। एरिक डिक्सन व कार्ल खंडालवाड़ की अंग्रेजी पुस्तकों में किशनगढ़ शैली के चित्रों के सम्मोहन और उनकी शैलगत विशिष्टताओं को विश्लेषित किया गया है।

किशनगढ़ की स्थापना की नींव किशनसिंह ने सन् 1609 में रखी।

किशनगढ़ चित्र शैली का विकास रूप सिंह के पुत्र मानसिंह (1658-1706) के समय प्रारंभ हुआ।

सांवतसिंह (नागरीदास) का शासनकाल किशनगढ़ शैली का समृद्ध काल था। किशनगढ़ को सर्वाधिक ख्याति इनके शासनकाल में मिली।

– ये ब्रजभाषा में भक्ति और शृंगार की रचनाएं करते थे। इस युग को किशनगढ़ शैली का स्वर्ण युग माना जात है। इनका शासन काल 1699 से 1764 ई. तक का था।

किशनगढ़ शैली को उत्कृष्ट स्वरूप प्रदान करने का श्रेय राजा सावंतसिंह, बणी-ठणी और मोरध्वज निहालचन्द को दिया जाता है।

बनी-ठनी/बणी ठणी-

सावंतसिह की प्रेयसी। बणी ठणी को उस काल के चित्रकारों ने राधा के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है।

– विख्यात कलाकार निहालचन्द ने भक्त नागरीदास तथा उकनी प्राण प्रेयसी बनी बनी-ठणी को राधा और कृष्ण का रूप देकर उनके जीवन को चित्रबद्ध किया।

– किशनगढ़ चित्र शैली के इस चित्र में नारी सौंदर्य की पूर्ण अभिव्यक्ति है। यह चित्र सन् 1778 का है जिसका आकार 48.8 × 36.6 सेमी. है।

– यह आज भी किशनगढ़ महाराजा के संग्रहालय में सुरक्षित है जिसकी एक मौलिक प्रति अल्बर्ट हॉल पेरिस में है जो सौंदर्य में मोनालिसा से आगे हैं।

– एरिक डिक्सन ने बनी-ठणी को भारतीय मोनालिसा की संज्ञा दी।

– किशनगढ़ शैली की राधा (बनी-ठणी) का चित्र डाक-टिकटों के माध्यम से प्रसिद्ध हुआ जो भारत सरकार के डाकतार विभाग द्वारा 5 मई, 1973 को जारी किया गया था।

पुरुष आकृति-

समुन्नत ललाट, पतले अधर, लम्बी आजानुबाहें, छरहरे पुरुष, लम्बी ग्रीवा, मादक भाव से युक्त नृत्य, नकीली चिबुक।

वेशभूषा- कमर में दुपट्टा, पेंच बंधी पगड़िया, लम्बा जामा।

स्त्री आकृति- लम्बी नाक, पंखुड़ियों के समान अधर, लम्बे बाल, लम्बी व सुराहीदार ग्रीवा, पतली भृकुटी (बत्तख, हंस, सारस, बगुला) के चित्र। इस शैली में भित्ति चित्रण व रागरागिनी चित्रण नहीं मिलता है।

किशनगढ़ शैली में गुलाबी व सफेद रंगों को प्रमुखता दी गई है।

किशनगढ़ शैली मे मुख्यतः केले के वृक्ष को चित्रित किया गया है।

वेसरि- किशनगढ़ शैली में प्रयुक्त नाक का प्रमुख आभूषण।

चांदनी रात की संगोष्ठी- किशनगढ़ चित्रकला शैली में चित्रकार अमरचंद द्वारा सावंतसिंह के शासनकाल के दौरान बनाया गया चित्र।

बूंदी शैली

बूंदी शैली राजस्थानी चित्रकला की विचारधारा का आरंभिक केन्द्र था।

राव उम्मेदसिंह- बूंदी शैली का सर्वाधिक विकास किया। बूंदी शैली का राव उम्मेदसिंह का जंगली सूअर का शिकार करते हुए चित्र सन् 1750 ई. का है।

बूंदी शैली में शिकार के चित्र हरे रंग में बनाये गये हैं।

चित्रशाला (रंगविलास/रंगीन चित्र)– महाराव उम्मेदसिंह के शासनकाल में निर्मित (1749-73 ई.), राजस्थानी बूदी चित्रकला शैली का उत्कृष्ट रूप प्रस्तुत करती है। बूंदी चित्र शैली के भित्ति चित्रों में हाड़ा शासकों के शौर्य, पराक्रम तथा विलासिता का प्रभाव प्रतिबिम्बित होता है। चटकीले रंगों का प्रयोग इन चित्रों की मुख्य विशेषता है।

कोटा-बूंदी क्षेत्र- राजस्थान की विभिन्न रियासतों में भित्ति चित्रांकन की दृष्टि से सर्वाधिक विकसित क्षेत्र रहा।

प्रमुख चित्र- पशु-पक्षी, रागमाला (सर्वप्रमुख चित्र), फल-फूल, दरबार, घुड़दौड़, राग-रंग, बसंत रागिनी, बारहमासा, वासुकसज्जा नायिका, कृष्णलीलाक।

रागमाला- बूंदी चित्र शैली का विश्व प्रसिद्ध चित्र। इन ऐतिहासिक चित्रों का चित्रण बूंदी के हाड़ा शासक राव रतनसिंह के समय में 1626 ई. के आस-पास हुआ।

प्रमुख चित्रकार- सुर्जन, रामलाल और अहमद अली।

प्रमुख विशेषताएं- बारीक वस्त्र, मोटे गाल, आम के पत्तों जैसी आंखें, गुम्बज, नुकीला नाक और छोटा कद। बूंदी शैली में लाल व पीले रंगों का प्रयोग किया गया है।

बूंदी शैली में प्रमुखतः खजूर के वृक्ष को चित्रित किया गया है। वर्षा में नाचता हुआ मोर राजस्थान की एक विशेषता है। इस क्षेत्र में बूंदी की शैली बेमिसाल है।

राजा रामसिंह, राव गोपीनाथ, छत्रसाल और बिशनसिंह आदि ने बूंदी में कला को विशेष प्रोत्साहन दिया। बूंदी शैली में मुख्यतः बत्तख, हिरण व शेर जैसे पशुओं को चित्रित किया गया है।

बूंदी चित्रकला शैली मेवाड़ चित्रकला शैली से प्रभावित रही।

कोटा शैली (हाड़ौती शैली)

महारावल रामसिंह एवं राजा उम्मेदसिंह- कोटा चित्रकला के आश्रयदात्ता। रामसिंह ने कोटा (राजस्थानी ) शैली को स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान किया।

कोटा शैली में प्रमुखतः पशु-पक्षियों में शेर व बत्तख का चित्रण मिलता है।

कौटा शैली का सर्वश्रेष्ठट उदाहरण ‘आखेट दृश्य‘ है।

कोटा शैली के चित्रों में प्रमुखतः नीले रंग का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

कोटा शैली में मुख्यतः खजूर के वृक्ष को चित्रित किया गया है।

प्रमुख चित्र- कृष्ण लीला, राग-रागिनियां, बारहमासा एवं दरबारी दृश्य।

प्रमुख चित्रकार- गाविंद, लालचंद, रघुनाथदास व लक्ष्मी नारायण।

वल्लभ सम्प्रदाय- कोटा शैली पर इसका प्रभाव देखा जा सकता है।

जयपुर (ढूंढाड़) शैली

प्रमुख विशेषताएं- मछली के समान व मादक नेत्रों युक्त स्त्री चित्र, कमर तक फैले केश।

– जयपुर शैली में प्रमुखतः हरे रंग की प्रधानता है।

प्रमुख चित्रकार- साहिबराम, सालिगराम एवं लक्ष्मणराम।

साहिबराम- जयपुर शैली के प्रसिद्ध चित्रकार, महाराजा ईश्वर सिंह का आदमकद चित्र बनाया।

श्री वेदुपाल बन्नू- प्रसिद्ध चित्रकार, इन्होंने हाथी दांत की पटरियों पर अनेक सुन्दर चित्र बनाये। ‘बारहमासा‘ को नये अंदाज में प्रस्तुत किया। इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार प्रापत हो चुके हैं।

रामचन्द्र मुसव्विर- इन्होंने तवायफों के चित्र बनाये।

शिवनारायणजी- तैलचित्र बनाने वाले प्रसिद्ध कलाकार।

राजस्थान में व्यक्ति शैली के चित्र अधिकतर जयपुर शैली में पाये जाते हैं। जयपुर शैली पर मुगल शैली का प्रभाव देखा जा सकता है।

इस शैली के चित्र अपनी सजावट व उज्ज्वलता के लिए प्रसिद्ध है।

प्रमुख चित्र- बिहारी सतसई, गोवर्द्धन धारण, टोडी रागिनी, कृष्ण लीला, साधारण जन-जीवन, रास मंडल, महाभारत व रामायण महाराजा सवाई जगतसिंह एवं पुण्डरिक जी की हवेली के भित्तिचित्र।

जयपुर शैली में पीपल के वृक्ष को प्रमुख रूप से दर्शाया गया है एवं पशु-पक्षियों में मोर के चित्रों की प्रधानता है।

अलवर शैली

राजा प्रतापसिंह- अलवर शैली को प्रारंभ किया।

राव राजा बख्तावरसिंह- अलवर शैली को मौलिक स्वरूप प्रदान किया। ये चन्द्रसखी एवं बख्तेश के नाम से काव्य रचना करते थे। दानलीला इनका प्रमुख ग्रंथ है।

विनयसिंह- प्रसिद्ध शासक, इनके शासनकाल में गुलामअली, आगामिर्जादेहलवी एव नत्थासिंह दरबेश प्रमुख चित्रकार थे।

बलवंत सिंह- कला प्रेमी शासक, इनके शासनकाल में जमनादास, छोटेलाल, बकसाराम, नन्दराम प्रमुख कलाकार थे।

हाथीदांत- इस शैली में हाथीदांत पर चित्रण किया गया है। मूलचंद- हाथीदांत पर चित्र बनाने के सिद्धहस्त कलाकार।

बसलो चित्रण (बोर्डर पर चित्रण) के लिए अलवर चित्रशैली प्रसिद्ध है। इस शैली में गणिकाओं (वेश्याओं) के चित्र अधिक मिलते हैं।

योगासन- यह इस शैली का प्रमुख विषय रहा है।

तिजारा गांव के कलाकार बहुत विख्यात थे जिन्होंने अलवर के राज महलों की दीवारों पर विख्यात चित्रों का संग्रह किया।

प्रमुख चित्रकार- यहां के विख्यता कलाकारों में डालचन्द एवं सालिगराम प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त बलदेव, गुलामगली, सालगा का नाम भी उल्लेखनीय है।

कामशास्त्र- महाराजा शिवदान सिंह के समय चित्रित।

इस शैली में लाल, हरे एवं सुनहरी रंग का प्रयोग होता है।

राजस्थानी चित्रकला : विविध

आधुनिक काल में राजस्थानी चित्रकला के नमूने जयपुर म्यूजियम में भित्ति चित्रों के रूप में उपलब्ध होते हैं।

जर्मन चित्रकार मूलर ने 1920-1945 ई. तक जोधपुर, बीकानेर और जयपुर में रहकर यथार्थवादी पद्धति के चित्र बनाए।

भित्ति तैयार करने हेतु राहोली का चूना अरायशी चित्रण के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

जहांगीर के समय में आराईश पद्धति इटली से भारत लाई गई।

चित्रकला के विकास हेतु कार्यतर संस्थाए :

जोधपुर       चितेरा, धोरां

जयपुर        आयाम, पैग, कलावृत्त, क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुप

उदयपुर       तूलिका कलाकार परिषद

कुंदरलाल मिस्त्री- इन्हें राजस्थान में आधुनिक चित्रकला को प्रारंभ करने का श्रेय दिया जाता है। राजस्थानी चित्रकला | राजस्थान की चित्रकला

रामगोपाल विजयवर्गीय-

सवाईमाधोपुर जिले के बालेर गांव में 1905 ई. में जन्म हुआ। एकल चित्र प्रदर्शनी की परम्परा को प्रारंभ करने वाले राजस्थान के सुप्रसिद्ध चित्रकार प्रसिद्ध चित्रकार, इनके नाम पर ही विजयवर्गीय शैली का जन्म हुआ है। चित्र गीतिका इनकी अनूठी रचना है। हाल ही में इनकी 77 कविताओं के काव्य संग्रह बोधांजली का विमोचन किया गया। ये राजस्थान के प्रथम चित्रकार हैं जिन्हें यह सम्मान दिया गया है।

स्व. भूरसिंह शेखावत- धोंधलिया (बीकानेर) में 1914 में जन्में प्रसिद्ध चित्रकार। देशभक्तों एवं शहीदों का चित्रण किया।

बी.जी. शर्मा- विश्व प्रसिद्ध सहेलियों की बाड़ी के पास इन्होंने बी.जी. शर्मा चित्रालय 13 अप्रैल, 1993 को प्रारंभ किया।

देवकी नंदन शर्मा- अलवर निवासी, भित्ति व पशु-पक्षी चित्रण में विशेष ख्याति अर्जित की, ये Master Of Nature & Living Objects के नाम से प्रसिद्ध हैं।

गोवर्धन लाल ‘बाबा‘- कांकरोली (राजसमंद) में जन्में, ‘भीलों के चित्तेरे‘ के उपनाम से प्रसिद्ध, इनके द्वारा बनाया गया प्रमुख चित्र बारात है।

जगमोहन माथोड़िया- श्वान विषय पर सर्वाधिक चित्र बनाने हेतु इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में शामिल किया गया है।

रवि वर्मा- केरल के चित्रकार, भारतीय चित्रकला के पितामह कहलाते हैं।

सौभागमल गहलोत- जयपुर के चित्रकार, इन्हें ‘नीड़ का चित्तेरा‘ कहा जाता है।

हमीदुल्ला- प्रसिद्ध रंगकर्मी, इनका जन्म जयपुर में हुआ।

प्रसिद्ध कृतियां- हर बार, उत्तर-उर्वशी एवं उलझी आकृतियां।

अराशिया

फ्रेस्को तकनीक पर आधारित इन चित्रों को कहा जाता है।

– फ्रेस्को बुनो- ताजा प्लास्टर की हई नम भित्ति पर किया गया चित्रांकन जिसे आलागीला, आरायशा व शेखावाटी क्षेत्र में पणा के नाम से जाना जाता है। यह भित्ति चित्रकला शैली इटली सेभारत लायी गई व राजस्थान में सर्वप्रथम जयपुर में इस पद्धति का प्रारंभ हुआ।

शेखावाटी क्षेत्र- यह क्षेत्र राजस्थान की ऑपन एयर आर्ट गैलेरी के लिए विश्व विख्यात है, इस क्षेत्र की हवेलियां ‘Fresco Printings’ के लिए प्रसिद्ध है।

– शेखावाटी के भित्ति चित्रों में लोकजीवन की झांकी सर्वाधिक देखने को मिलती है।

पुष्पदत्त- आमेर शैली के प्रमुख चित्रकार।

पंडित द्वारका प्रसाद शर्मा- राजस्थान के प्रसिद्ध चित्रकार, ‘गुरुजी‘ की संज्ञा से अभिहित हैं।

फूलचंद वर्मा- राज्य के प्रसिद्ध चित्रकार, नारायना (जयपुर) के मूल निवासी। इन्होंने प्रकृति एवं राजस्थान की लघुचित्र शैली को ही अपने चित्रांकन का आधार बनाया।

– ‘बतखों की मुद्राएं‘ शीर्षक कृति पर राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा इन्हें 1972 में सम्मानित किया गया।

टैम्परा- फूलचंद वर्मा ने चित्रकला की इस पद्धति का प्रयोग किया।

ज्योति स्वरूप शर्मा-

जोधपुर निवासी, ऊंट की खाल पर चित्रांकन (उस्ता कला) करने के कुशल कारीगर। ये चमड़े पर चित्रांकन करने में मारवाड़ी और मुगल शैली दोनों में दक्ष हैं।

– इनका मुख्य चित्र ‘शृंखला‘ है। इन्होंने रेणुका आर्ट्स हस्तशिल्प शोध संस्थान की स्थापना की।

– इनके द्वारा 26 इऔच की ढ़ाल पर जो बारीक चित्रकारी की गई है वह निःसंदेह कलाकार की भावना और साधना का जीवंत साक्ष्य है। सम्पूर्ण ढाल मुगल शैली में चित्रित है। इस ढाल पर आठ मुगल बादशाहों के चित्रों के अलावा, शाहजहां की याद में लिखा कलमा है। हजरत मोहम्मद साहब की तारीफ में शेर-शायरी है एवं कुरान शरीफ की आयते हैं। इनके द्वारा सारा काम अरेबिक केलीग्राफी (हस्तलेख कला) में किया गया है।

जोतदान- चित्रों (पेंटिंग्स) का संग्रह (एलबम)। देवगढ़ ठिकाने में चोखा और बगता नामक बड़े ख्याति प्राप्त चित्रकार हुए हैं। अमेरिका में इनचित्रों पर शोधकार्य भी हुआ है तथा इन चित्रों को देवगढ़ शैली का बताया गया है।

सुरजीत कौर चोयल- ये हिन्दुस्तान की पहली चित्रकार है जिनके चित्रों को जापान की प्रतिष्ठित कला दीर्घा ‘फुकोका संग्रहालय‘ ने अपनी कला दीर्घा के लिए उपयुक्त समझा।

चित्तेरा- फड़ चित्रित करने का कार्य भीलवाड़ा व चित्तौड़गढ़ के जोशी गौत्र के छीपें करते हैं जिन्हें चित्तेरा कहा  जाता है। चित्तेरा जोधपुर में स्थित चित्रकला के विकास हेतु प्रयासरत संस्था भी है।

राजस्थानी चित्रकला | राजस्थान की चित्रकला

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