भारत में राष्ट्रवाद का उदय एवं आधुनिक भारत का विकास PDF

नमस्कार आज हम भारत के इतिहास के मुख्य भाग भारत में राष्ट्रवाद का उदय एवं आधुनिक भारत का विकास के विषय में अध्ययन करेंगे। साथ ही की कैसे भारत में राष्ट्रवाद का उदय हुआ ? क्या कारण थे ? इन सभी के लिखित नोट्स पीडीऍफ़ (PDF) भी उपलब्ध कराया गया हैं।

भारत में राष्ट्रवाद का उदय

यूरोपीयन आगमन

• मध्यकाल में यूरोप और दक्षिण-पूर्ण एशिया के साथ भारत का व्यापार अनेक मार्गों से चलता था। 1453 में उस्मानिया तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया और धीरे-धीरे इनका सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी यूरोपीय क्षेत्रों एवं व्यापार पर अधिकार हो गया।

• इस अधिकार के साथ ही स्थल मार्ग व्यापार हेतु बंद हो गया, अत: यूरोपियों को नए जल मार्ग की आवश्यकता पड़ी।

• भारत में यूरोपियों के आगमन का क्रम:-

            पुर्तगाली    –     डच      –    अंग्रेज   –   डेनिस   –   फ्रांसीसी

            (1498 ई.)   (1595 ई.)  (1600 ई.)  (1616 ई.)   (1664 ई.)

• भारत में फैक्ट्री की स्थापना का क्रम –

            1.    पुर्तगाल – 1503 ई. (कोचीन)

            2.    डच – 1605 ई. (मछलीपट्टनम / मसूलीपट्टनम)

            3.    अंग्रेज – 1611 ई. (मछलीपट्टनम / मसूलीपट्टनम)

            4.    डेनमार्क – 1620 ई. (तंजौर)

            5.    फ्रांसीसी – 1668 ई. (सूरत)

पुर्तगाली

• टॉरडेसिलस की संधि (1494 .)- पुर्तगाल तथा स्पेन के बीच अटलांटिक में एक आभासी रेखा के द्वारा पुर्तगाल के लिए पूर्व तथा स्पेन के लिए पश्चिम में गैर ईसाई दुनिया को विभाजित किया गया।

वास्कोडिगामा•वास्कोडिगामा 1498 ई. में  उत्तमाशा अंतरीप द्वीप होते हुए कालीकट पहुँचा तथा उसका जमोरिन (कालीकट का राजा) के द्वारा स्वागत किया गया।•1502 ई. तक, वास्कोडिगामा की दुसरी यात्रा के दौरान कालीकट, कोचीन और कन्नूर में व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना की गई तथा उनकी किलेबंदी की गई।• अन्य व्यापारियों के विपरीत पुर्तगाली भारत में व्यापार का एकाधिकार चाहते थे।
पेड्रो अल्वरेज़ कैब्रल•1500 ई. में, कालीकट में सबसे पहले फैक्ट्री की स्थापना की।•भारतीय उपमहाद्वीप पर यूरोपियों के शासन के युग की शुरुआत।
फ्रांसिस्को डी अलमीडा(1505- 1509)•भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर जिसने शांत जल की (ब्लू वाटर) नीति कार्टेज प्रणाली की शुरुआत की इसमें भारतीय भूमि पर किले बनाने के बजाय समुद्र में शक्तिशाली होने पर बल दिया गया था।•कार्टेज प्रणाली : हिंद महासागर में पुर्तगालियों       द्वारा जारीजल परिवहन लाइसेंस या पासा
अलफांसो डी अलबुकर्क(1509-1515)•इसे भारत में पुर्तगाली शक्ति का संस्थापक माना जाता है, इसने बीजापुर से गोवा को जीत लिया, मुस्लिमों पर अत्याचार, विजयनगर के राजा श्री कृष्ण देव राय (1510 ई.) से भटकल को जीत लिया-•भारत के मूल निवासियों के साथ विवाह करने की नीति का आरंभ किया।•इसके द्वारा अपने प्रभाव क्षेत्र में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया।•1515 ई. में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गयी तथा उस समय तक पुर्तगाली भारत में सबसे मजबूत नौ- सैनिक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुके थे।
नीनो डी कुन्हा (1529-38)•इसके द्वारा 1530 ई. में कोचीन की जगह गोवा को राजधानी बनाया गया। इस प्रकार भारत में पुर्तगाली उपनिवेश की राजधानी गोवा बन गया।•उसके शासनकाल में, दीव तथा वसाई को गुजरात के राजा बहादुर शाह से छीन लिया गया तथा उस पर पुर्तगालियों का कब्जा हो गया।•बहादुर शाह 1537 ई. में दीव में पुर्तगालियों से लड़ते हुए मारे गए।•यह एक व्यवहारिक नेता था जिसने पश्चिमी तटीय क्षेत्र से परे भी पुर्तगाली साम्राज्य का विस्तार किया, उसके समय में पुर्तगाली शक्ति का विस्तार पूर्वी तट तक हुआ

डच (नीदरलैंडवासी)

• कॉर्नेलिस डी हॉटमैन पहला डच था, जो 1596 ई. में सुमात्रा और बेंटन पहुँचा था।

• डच संसद के एक चार्टर के द्वारा मार्च, 1605 ई. में यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई थी, इन्हें युद्ध करने, संधियाँ करने तथा किले बनाने की शक्ति प्राप्त थी।

• आंध्र क्षेत्र में 1605 ई. में मसूलीपट्टनम में पहले कारखाने की स्थापना की गई।

• बाद में वे पुर्तगालियों को हराकर प्रमुख यूरोपीय व्यापारिक शक्ति के प्रमुख के रूप में उभरे ।

• भारत में उनका प्रमुख केंद्र पुलिकट था, जिसे बाद में नेगापट्टनम में स्थापित किया गया।

• डच यमुना घाटी तथा मध्य भारत में उत्पादित नील (इंडिगो), बंगाल गुजरात तथा कोरोमंडल क्षेत्र से उत्पादित वस्त्र तथा रेशम, बिहार से शोरा और गंगा की घाटी से उत्पादित अफीम एवं चावल का व्यापार करते थे।

• 1623 ई. में, अंग्रेजों तथा डचों के बीच में एक संधि हुई, जिसमें डचों ने भारत में तथा अंग्रेजों ने इंडोनेशिया में अपने अधिकार क्षेत्र के दावों को वापस ले लिया।

• 1650 ई. (17वीं शताब्दी), अंग्रेज़ भारत में एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरने लगे।

• करीब 70 वर्षों तक अंग्रेजों तथा डचों के बीच में लड़ाईयाँ जारी रही जिसमें डच एक-एक करके अपने बस्तियों/उपनिवेशों को अंग्रेजों के हाथ खोते रहे।

• डचों को भारत में साम्राज्य स्थापित करने में कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, वे सिर्फ व्यापार करना चाहते थे, उनका मुख्य व्यावसायिक इंडोनेशिया के स्पाइस दीप समूहों में था जहाँ से वे व्यापार के माध्यम से बड़ा लाभ अर्जित करते थे।

• भारत में प्राय: आंग्ल डच युद्धों में डचों की हार एवं उनका ध्यान मलय द्वीप समूहों की ओर स्थानांतरित हो गया।

• बेदरा के युद्ध (1759) में अंग्रेजो के द्वारा डचों को हराया गया ।

• लंबे समय तक युद्ध के बाद दोनों पक्षों के द्वारा एक समझौता किया गया, जिसके तहत् अंग्रेजों के द्वारा इंडोनेशिया से अपने सभी दावों को वापस ले लिया तथा डचों के द्वारा भारत से अपने सभी दावों को वापस ले लिया गया।

डचों के द्वारा : मसूलीपट्टनम (1605), पुलीकट (1610), सूरत (1616), विमलीपट्टनम (1641), करिकल (1645), चिनसूरः (1653), कासिमबाजार, बरानागोर, पटना, बालासोर, नेगापट्टनम (1658) और कोचीन (1663) में फैक्टरीयों की स्थापना की गई। इसमें पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों तट शामिल थे।

ब्रिटिश (अंग्रेज)

• इंग्लैण्ड की रानी एलिजाबेथ-I के समय में 31 दिसम्बर, 1600 को ‘दि गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ लन्दन ट्रेडिंग इन्टू दि ईस्ट इंडीज’ अर्थात् ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना हुई, जिसे महारानी एलिजाबेथ ने पूर्वी देशों से व्यापार करने के लिए चार्टर प्रदान किया।

• प्रारंभ में यह अधिकार मात्र 15 वर्ष के लिए मिला था, किन्तु कालान्तर में इसे 20-20 वर्षों के लिए बढ़ाया जाने लगा। ईस्ट इंडिया कम्पनी में उस समय कुल करीब 217 साझेदार थे। कम्पनी का आरम्भिक उद्देश्य व्यापार था।

• 1609 ई. में इंग्लैंड से कैप्टन हॉकिंस भारत में मुगल बादशाह जहाँगीर के शाही दरबार में आया तथा उसने सूरत में एक अंग्रेजी व्यापार केंद्र की स्थापना करने की इजाजत मांगी, लेकिन पुर्तगालियों के दबाव के चलते जहाँगीर ने उसे इजाजत देने से मना कर दिया।

• थॉमस बेस्ट के द्वारा पुर्तगालियों पर विजय प्राप्त करते ही सूरत में एक फैक्ट्री की स्थापना की गई।

• बाद में 1613 ई. में, जहाँगीर ने अंग्रेजों (सर् थॉमस रो) को एक फरमान (अनुमति पत्र) जारी करके आगरा, अहमदाबाद और भड़ौच में उनके व्यापारिक केंद्रों को स्थापित करने की अनुमति दे दी, जिसके बाद अंग्रेजों ने 1613 ई. में सूरत में अपना पहला व्यापारिक कारखाना स्थापित किया।

• 1615 ई. में, सर थॉमस रो भारत में जेम्स प्रथम (इंग्लैंड के राजा) का दूत बनकर आया तथा भारत के अन्य हिस्सों में अंग्रेजी व्यापारिक फैक्टरियों की स्थापना के लिए जंहागीर से अनुमति प्राप्त की।

• बॉम्बे पर नियंत्रण- चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगालियों से दहेज के रूप में प्राप्त हुआ।

• मद्रास- फोर्ट सेंट जॉर्ज ने मसूलीपट्टनम की जगह ली।

• 1700 ई. तक, मुंबई, मद्रास तथा कलकत्ता भारत में अंग्रेजी उपनिवेश के तीन प्रेसिडेंसी शहर बन चुके थे, जिसकी राजधानी कलकत्ता थी।

डेनमार्क

• डेनमार्क की ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ की स्थापना 1616 ई. में हुई। इस कम्पनी ने 1620 ई. में त्रैंकोवार (तमिलनाडु) तथा 1667 ई. में सेरामपुर (पश्चिम बंगाल) में अपनी व्यापारिक फैक्ट्रियाँ स्थापित की। सेरामपुर इनका प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था।

फ्रांसीसी

• 1664 ई. में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई तथा सूरत में पहली फैक्टरी की स्थापना फ्रैंकोइस कैरो के द्वारा स्थापित ।

• फ्रैंको मार्टिन के द्वारा 1673 ई.  में पांडिचेरी की स्थापना की गई तथा वह पांडिचेरी का पहला गवर्नर भी बना। इस तरह पांडिचेरी भारत में फ्रांसीसी बस्तियों / प्रदेशों का मुख्यालय बन गया।

• 18वीं शताब्दी के शुरुआत में, अंग्रेज तथा फ्रांसीसी भारत में, मुख्य रूप से कर्नाटक तथा बंगाल के क्षेत्रों में, अपनी सर्वोच्चता / प्रभुत्व के लिए लड़ते रहे।

• तीन कर्नाटक युद्धों के बाद, अंततः अंग्रेजों के द्वारा फ्रांसीसीयों को हरा दिया गया तथा वह पांडिचेरी तक ही सीमित रह गए।

आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष

• अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के मध्य लड़े गए युद्धों को “कर्नाटक युद्ध” के नाम से जाना जाता है।

• व्यापार पर एकाधिकार और राजनीतिक नियत्रंण स्थापित करने की महत्त्वकांक्षा ने ईस्ट इंडिया कम्पनी और फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तीन कर्नाटक युद्धों को जन्म दिया।

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1740-48 ई.)

• कर्नाटक का प्रथम युद्ध यूरोप में इंग्लैंड एवं फ्रांस के बीच ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार को लेकर चल रहे संघर्ष का विस्तार था।

• 1746 ई. डूप्ले ने मद्रास पर अधिकार कर लिया और इसे कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन को वापस लौटाने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप नवाब ने फ्रांसीसियों के विरुद्ध सेना भेजी।

• डूप्ले ने इस सेना को सेंट टोमे के युद्ध की लड़ाई में पराजित कर दिया।

• कर्नाटक का प्रथम युद्ध सेंट टोमे के युद्ध के लिए प्रसिद्ध है क्योंकि यह पहला युद्ध था जो किसी भारतीय सेना और यूरोपीय सेना के बीच लड़ा गया था। इसे अडयार का युद्ध भी कहते हैं।

• वर्ष 1748 में एक्स-ला-शापेल की संधि से यूरोप में दोनों शक्तियों के मध्य समझौता होने से प्रथम कर्नाटक युद्ध भी समाप्त हो गया और मद्रास अंग्रेजों को वापस मिल गया, जिसके बदले में फ्रांसीसियों को उत्तरी अमेरिका में नए क्षेत्र मिले।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749 – 54 ई.)

• कर्नाटक में नवाब अनवरुद्दीन और भूतपूर्व नवाब दोस्द अली के दामाद चांदा साहब के बीच संघर्ष।

• हैदराबाद में निजाम की मृत्यु के बाद उसके पुत्र मुजफ्फरजंग तथा अन्य दावेदार नासिरजंग के बीच संघर्ष।

• तंजौर में गद्दी के लिए मराठे संघर्षरत थे।

• अंग्रेजों ने कर्नाटक में अनवरुद्दीन का तथा हैदराबाद में नासिरजंग का साथ दिया और फ्रांसीसियों ने कर्नाटक में चांदासाहब तथा हैदराबाद में मुजफ्फरजंग का साथ दिया।

• 1749 ई. में वेल्लोर के निकट अम्बर के युद्ध में अनवरुद्दीन मारा गया तथा चांदा साहब का कर्नाटक पर अधिकार हो गया और बाद में हैदराबाद पर भी फ्रांसीसी समर्थित मुजफ्फरजंग एवं उसके पुत्र सलावतजंग का नियंत्रण स्थापित हो गया।

• इस प्रकार प्रारम्भिक स्तर पर फ्रांसीसियों का प्रभाव स्थापित हुआ पर कुछ ही समय बाद अनवरुद्दीन के पुत्र मुहम्मद अली ने अंग्रेजों के साथ मिलकर चांदा साहब एवं फ्रांसीसियों को हराकर कर्नाटक पर अपनी सत्ता स्थापित की, लेकिन हैदराबाद पर फ्रांसीसियों का प्रभाव बना रहा।

• 1755 ई. में अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच पाण्डिचेरी की संधि हुई, जिसमें यह तय हुआ कि दोनों एक दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। 

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1758-63 ई.)

• 1756 ई. में यूरोप में सप्तर्षीय युद्ध प्रारम्भ होने पर पाण्डिचेरी की संधि द्वारा स्थापित शांति समाप्त हो गई। 1757 ई. में बंगाल विजय से अंग्रजों को अपार धन मिला, जबकि फ्रांसीसी कम्पनी के सामने धन की कमी एक प्रमुख समस्या थी।

• 1760 ई. में वांडिवाश के युद्ध में सर आयर कूट ने फ्रांसीसी सेना को बुरी तरह से पराजित किया और 1761 में अंग्रेजों ने फ्रांसीसी मुख्यालय पाण्डिचेरी पर अधिकार कर लिया। पांडिचेरी की किलेबंदी नष्ट कर दी गई और भारत में फ्रांसीसियों के प्रसार की संभावनाओं को नष्ट कर दिया।

• 1763 ई. में यूरोप में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच हुई पेरिस की संधि द्वारा फ्रांसीसियों को पांडिचेरी, कराइकल, माहे एवं चन्द्र नगर वापस कर दिए गए, लेकिन वहाँ किलेबंदी पर रोक लगा दी गई।

• इसके बाद अंग्रेजों और भारतीय शक्तियों के बीच संघर्ष का दौर प्रारम्भ हुआ।

• सप्तवर्षीय युद्ध इंग्लैण्ड व फ्रांस के मध्य यूरोप में 1756-1763 ई. के मध्य लड़ा गया, जिसमें 1763 ई. में पेरिस संधि के द्वारा यह युद्ध समाप्त हुआ।

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बंगाल विजय

• 1717 ई. में मुर्शीदकुली खाँ की मुगल गवर्नर के रूप में नियुक्ति हुई लेकिन उसने बंगाल मे स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। 1740 ई. में अलीवर्दी खाँ बंगाल का नवाब बना और उसकी मृत्यु के बाद 1756 ई. में उसका पौत्र सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। सिराजुद्दौला के अंग्रेजों से मतभेद के कारण 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ।

अंग्रेजों से मतभेद के कारण ̵

1. 1717 ई. में कम्पनी को मिले दस्तक का दुरुपयोग।

2. नवाब के अंग्रेजों को किलेबंदी रोकने के आदेश की अवहेलना।

3. सिराजुद्दौला के नवाब बनने पर अंग्रेजों द्वारा दरबार में पेश होने की परंपरा का उल्लंघन।

4. अंग्रेजों द्वारा नवाब के विरोधियों जैसे घसीटी बेगम, राजवल्लभ आदि के साथ मिलकर षड‌्यंत्र।

5. अंग्रेजों द्वारा नवाब के शत्रुओं को आश्रय देना।

ब्लैक हॉल दुर्घटना (20 जून, 1756)

• 4 जून, 1756 को नवाब ने अंग्रेजों की कासिम बाजार कोठी पर हमला कर दिया और 20 जून तक फोर्ट विलियम पर भी कब्जा कर लिया।

• इसके बाद बंदी बनाए गए 146 अंग्रेज कैदियों को 14 फुट 10 इंच की कोठरी में बंद कर दिया गया। भयंकर गर्मी एवं दम घुटने से अगले दिन केवल 23 कैदी ही जीवित बचे।

• इसे ब्लैक हॉल दुर्घटना कहा जाता है।

• अंग्रेज इतिहासकार हॉलवेल ने इस ब्लैक हॉल दुर्घटना में जिंदा बचने के बाद इस घटना का उल्लेख अपनी पुस्तक “Alive the wonder” में किया।

अलीनगर की संधि (9 फरवरी, 1757 )

• रॉबर्टक्लाइव और वॉटसन के नेतृत्व में अंग्रेजों द्वारा पुन: कलकत्ता पर नियंत्रण के बाद यह संधि हुई थी। इस संधि के द्वारा अंग्रेजों को व्यापारिक सुविधाएँ, सिक्के ढालने और किलेबंदी के अधिकार मिले।

• युद्ध के हर्जाने के रूप में नवाब ने अंग्रेजों को भारी रकम दी। बदले में अंग्रेजों ने नवाब की सुरक्षा का आश्वसन दिया।

प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757)

• बंगाल पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफर, जगत सेठ, राय दुर्लभ एवं अमीचन्द के साथ मिलकर षड्यंत्र किया, जिसके तहत् मीर जाफर को नवाब बनाना तय किया गया।

• 23 जून, 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में प्लासी के मैदान में युद्ध लड़ा गया। यह औपचारिकता मात्र था क्योंकि मीर जाफर एवं दुर्लभ राय के नेतृत्व वाले हिस्से ने युद्ध में भाग ही  नहीं लिया।

• अंग्रेजों से बड़ी सेना के बावजूद नवाब को इस युद्ध से भागना पड़ा तथा बाद में मारा गया।

भारत में राष्ट्रवाद का उदय एवं आधुनिक भारत का विकास

प्लासी के युद्ध के परिणाम

• इस युद्ध के बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी के सहयोग से मीर जाफर बंगाल का नवाब बना। ईस्ट इंडिया कंपनी को अपदस्थ नवाब सिराजुद्दौला से कलकत्ता पर आक्रमण करने के मुआवज़े स्वरूप काफी धन मिला।

• कंपनी को बंगाल, बिहार और ओड़िशा में उन्मुक्त व्यापार का अधिकार भी मिला। इसके अतिरिक्त कंपनी को नवाब मीर जाफर से बंगाल के 24 परगनों की ज़मींदारी भी मिली। इस प्रकार रातों-रात यह कंपनी भारत में एक क्षेत्रीय शक्ति बन गई।

• फिर भी कंपनी की लालसा और अधिक धन पाने की थी, जिसको संतुष्ट करने में मीर जाफर सक्षम नहीं था इसलिए कंपनी ने उसके दामाद मीर कासिम के साथ गुप्त समझौता कर 1760 ई. में मीर जाफर को सिंहासन त्यागने के लिए मजबूर कर दिया।

• प्लासी युद्ध के  समय बंगाल का गवर्नर रोजर ड्रेक था एवं ब्रिटिश सेना का नेतृत्व रॉर्बट क्लाइव ने किया था।

• “प्लासी की विजय विश्वासघात थी” – पी.ई. रॉबर्टस

मीर कासिम और वेन्सिटार्ट की संधि (सितम्बर, 1760)

• मीर कासिम को नवाब बनाने हेतु कलकत्ता काउंसिल एवं मीर कासिम के बीच यह संधि हुई जिसके प्रावधान थे ̵

– कम्पनी को बर्दवान, मिदनापुर व चटगाँव के जिले देना।

– 3 वर्ष तक सिलहट के चूने के व्यापार में कम्पनी की आधी हिस्सेदारी।

– मीर कासिम द्वारा कम्पनी के दक्षिण अभियान हेतु 5 लाख रुपये की राशि देना।

– कम्पनी आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी तथा नवाब को सैनिक सहायता देगी।

–  मीर कासिम कम्पनी के मित्र या शत्रु को अपना मित्र या शत्रु मानेगा।

बक्सर का युद्ध (23 अक्टूबर, 1764)

• मीर कासिम ने आशा की थी कि कंपनी बंगाल के नवाब के रूप में उसकी संप्रभुता का सम्मान करेगी। अपनी वास्तविक शक्ति को सुनिश्चित करते हुए उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दी थी। उसने भारतीय व्यापारियों को अंग्रेज़ व्यापारियों के समान ही बिना किसी शुल्क अदायगी के व्यापार करने की अनुमति दे दी। यह कदम कंपनी की अपेक्षाओं के प्रतिकूल थे।

• अतः मीर कासिम और कंपनी के बीच लड़ाई आवश्यक हो गई। मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउदौला और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, जो अवध में रह रहा था, का समर्थन प्राप्त किया। हमेशा की भाँति अंग्रेजों ने दाँव-पेंच का सहारा लिया और शुजाउदौला के बहुत से अधिकारियों और अधीनस्थों को अपने पक्ष में कर लिया।

• अंत में दोनों सेनाओं के बीच 1764 ई. में बक्सर की लड़ाई हुई। इस लड़ाई में कंपनी की सेना के कमांडर हेक्टर मुनरो ने शुजाउदौला और मीर कासिम को बुरी तरह परास्त कर दिया। इस बीच मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने बनारस में कंपनी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। मीर कासिम दिल्ली भाग गया जहाँ अत्यंत निर्धनता में 1777 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार प्लासी में शुरू हुई प्रक्रिया को बक्सर की विजय ने पूर्ण कर दिया और बंगाल अंग्रेजों के अधीन आ गया।

• मई, 1765 में क्लाइव को युद्धोत्तर औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए पुन: भारत के गवर्नर के रूप में भेजा गया। क्लाइव ने सर्वप्रथम नवाब शुजाउदौला के साथ एक संधि की। इस संधि के द्वारा नवाब ने इलाहाबाद और कड़ा कंपनी को सौंप दिया और लड़ाई के मुआवजे के रूप में पचास लाख रुपये देना भी स्वीकार किया।

• बाद में क्लाइव ने 12 अगस्त, 1765 को मुगल बादशाह शाह आलम-II के साथ इलाहाबाद की प्रथम संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार मुगल बादशाह को कंपनी की सुरक्षा में ले लिया गया और अवध के नवाब द्वारा दिए गए दोनों इलाके उसे सौंप दिए गए।

• क्लाइव ने अवध के नवाब शुजाउदौला के साथ 16 अगस्त, 1765 को इलाहाबाद की  दूसरी संधि की।

• पुनः कंपनी ने बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी का स्थायी अधिकार सौंपने के बदले मुगल बादशाह को एक फरमान के अनुसार 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।

• इलाहाबाद की संधि ने बंगाल पर नवाब की सत्ता का अंत कर वहाँ ‘दोहरे शासन’ की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत नवाब कानून और प्रशासन की देखभाल करता था जबकि कंपनी ने राजस्व संग्रह का अधिकार अपने हाथों में रखा था। संक्षेप में, नवाब को बिना शक्ति के उत्तरदायित्व दिया गया था और कंपनी बिना किसी उत्तरदायित्व के शक्ति का आनंद ले रही थी।  

• “बक्सर के युद्ध ने प्लासी के अधूरे कार्यों को पूरा किया“- वी.. स्मिथ

• बक्सर युद्ध के समय बंगाल का नवाब मीर जाफर था।

आंग्ल – मैसूर युद्ध

युद्धकारणपरिणाम
प्रथम आंग्लमैसूर युद्ध (1767-69 ई.) गवर्नर जनरल- लॉर्ड वेरेल्स्ट• अंग्रेजों की महत्त्वकांक्षाएँ।• मालाबार के नायक सामन्तों पर हैदर अली का नियंत्रण।• कर्नाटक के नवाब मुहम्मद अली व हैदर अली में शत्रुता।• हैदरअली का अंग्रेजों की मित्रता का प्रस्ताव न मानना।मद्रास की संधि,1769 ई. –  हैदरअलीव ईस्ट इंडिया कम्पनीदोनों पक्षों ने एक-दूसरेके विजित प्रदेश तथायुद्धबंदी लौटा दिए।दोनों पक्षों ने एक-दूसरेपर किसी भी शक्ति केआक्रमण के समयसहायता देने का वचनदिया।
द्वितीय आंग्लमैसूर युद्ध (1780-84 ई.)गवर्नर जनरल- लॉर्डवॉरेन हेस्टिंग्स• अंग्रेजों द्वारा संधि की शर्त का पालन न करना।• अंग्रेजों का माहे पर अधिकार।• हैदर अली द्वारा त्रिगुट का निर्माण।• हैदर अली के फ्रांसीसियों के साथ संबंध।• काजीवरभ का युद्ध पोर्टोनोवा  सौलिदपुर के युद्धों का संबंध द्वितीय कर्नाटक युद्ध से है।मंगलौर की संधि,1784 ई. – टीपू कोमैसूर राज्य में अंग्रेजोंके व्यापारिक अधिकारको मानना पड़ा।अंग्रेजों ने आश्वासनदिया कि वे मैसूर केसाथ मित्रता बनाएरखेंगे तथा संकट केसमय उसकी मददकरेंगे।
तृतीय आंग्लमैसूर युद्ध (1790-92 ई.)गवर्नर जनरल- लॉर्ड कॉर्नवालिस• मंगलौर की संधि का अस्थायित्व ।• टीपू का फ्रांसीसियों से सम्पर्क।• मराठों को टीपू के विरुद्ध उकसाना।• निजाम को भेजे पत्र में कॉर्नवालिस द्वारा टीपू को मित्रों की सूची में शामिल न करना।श्रीरंगपट्‌टनम कीसंधि, 1792 . – टीपूसुल्तान को अपनाआधा राज्य तथा तीनकरोड़ रुपये जुर्माने केरूप में देने पड़े।
चतुर्थ आंग्लमैसूर युद्ध (1799 ई.)गवर्नर जनरल- लॉर्ड वेलेजली • टीपू का फ्रांसीसियों से सम्पर्क।• भारत पर नेपोलियन के आक्रमण का खतरा।• वेलेजली की आक्रामक नीति।• मलावली व सदापीर लड़ाइयाँ चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध से संबंधित हैं।• टीपू के राज्य का विभाजन।• दक्षिणी भारत पर अंग्रेजी प्रभुत्व तथा वेलेजली की प्रतिष्ठा में वृद्धि, टीपू की मृत्यु।

आंग्ल-मराठा युद्ध

• टीपू सुल्तान व सदापीर लड़ाइयाँ चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध से सबंधित हैं।

• टीपू को “सीधासाधा दैत्य”  भी कहा जाता है।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782 ई.) :-

• 1775 ई. में रघुनाथ राव और अंग्रेजों के बीच सूरत की संधि हुई। इस संधि के अनुसार रघुनाथ राव को पेशवा बनाया जाना था तथा कम्पनी को सालसेट तथा बेसीन मिलने थे।

• अंग्रेज तथा रघुनाथ राव ने मिलकर अर्रा के युद्ध में पेशवा को पराजित किया। अंग्रेजों की कलकत्ता कौंसिल ने सूरत की संधि को निरस्त कर दिया। फलस्वरूप अंग्रेजों और पेशवा के मध्य 1776 ई.  में पूना की संधि हुई। इसके अनुसार कम्पनी ने रघुनाथ राव का साथ छोड़ दिया।

• लेकिन अंग्रेजों और मराठों के बीच शांति स्थापित नहीं हो सकी और पेशवा की सेना ने 1778 ई. में अंग्रेजों को तेलगाँव एवं बड़गाँव में पराजित किया। 1779 ई.  में बड़गाँव की संधि हुई इसके अंतर्गत अंग्रेजों को मराठों के प्रदेश वापस करने थे लेकिन अंग्रेजों ने इसे नहीं माना और उनमें अनेक युद्ध हुए।

• 1782 ई.  में महादजी सिंधिया के प्रयासों के फलस्वरूप दोनों पक्षों में सालबाई की संधि हुई और प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया। इसके अंतर्गत सालसेट एवं एलीफैंटा अंग्रेजों को मिला तथा अंग्रेजों ने माधवराव द्वितीय को पेशवा मान लिया।

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805 ई.):-

• आंग्ल-मराठा संघर्ष का दूसरा दौर फ्रांसीसी भय से प्रेरित था। लॉर्ड वेलेजली ने इससे बचने के लिए समस्त भारतीय प्रान्तों को अपने अधीन करने का निश्चय किया।

• लॉर्ड वेलेजली के मराठों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की नीति और सहायक संधि थोपने के कारण द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध आरम्भ हुआ।

• 1802 ई. में पेशवा ने अंग्रेजों के साथ बेसिन की संधि की, जिसके अंतर्गत पेशवा ने अंग्रेजों का संरक्षण स्वीकार कर लिया। एक तरह से वह पूर्ण रूप से अंग्रेजों पर निर्भर हो गए लेकिन अंग्रेजों को होल्कर शासकों से संघर्ष करना पड़ा।

• जसवंत राव होल्कर की पराजय के बाद 1804 ई. में होल्कर और अंग्रेजों के मध्य राजपुर घाट की संधि हुई और युद्ध समाप्त हो गया।

• लसवाड़ी का युद्ध द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध से संबंधित है।

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) :-

• लॉर्ड हेस्टिंग्स भारत में अहस्तक्षेप की नीति का अनुसरण करने की इच्छा से आया था लेकिन अंग्रेज़ों द्वारा पिंडारियों के दमन के कारण तृतीय मराठा युद्ध आरम्भ हुआ।

• तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818 ई.) का प्राथमिक कारण पेशवा बाजीराव-II का अपनी अधीनस्थ स्थिति से असंतुष्ट होना था। इसलिए उसने अंग्रेजों के विरुद्ध अन्य मराठा प्रमुखों को संगठित करना शुरू किया हालाँकि, बड़ौदा का गायकवाड़ उसके पक्ष में नहीं था।

• अतः उस पर दबाव डालने के लिए पेशवा ने गायकवाड़ से अहमदाबाद क्षेत्र की माँग की, यहाँ तक कि पूना में गायकवाड़ों के दूत की भी बहुत बुरी तरह से हत्या कर दी गई। इस हत्या में पेशवा के मंत्री त्रिम्बक जी का हाथ होने की आशंका थी, इसलिए पूना में ब्रिटिश रेजीडेंट एलफिंस्टन ने गायकवाड़ों की ओर से हस्तक्षेप किया। उसने त्रिम्बक जी के आत्मसमर्पण और पेशवा के साथ एक नई सहायक संधि करने की माँग की।

• इसी प्रकार, गायकवाड़, भौंसले प्रमुख अप्पा साहेब और दौलतराव सिंधिया को अंग्रेजों के साथ नई संधियाँ करनी पड़ी। मराठा सरदारों के साथ हुए इस प्रकार के व्यवहार को पेशवा ने पसंद नहीं किया। अतः उसने अंग्रेज़ों पर आक्रमण कर दिया। इसी समय नागपुर में अप्पा साहेब भोंसले ने और इंदौर में मल्हार राव- II ने अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिए। अंग्रेज़ों ने शीघ्र ही इन तीनों को अलग-अलग हरा दिया और इस प्रकार तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत 1818 ई. में हो गया।

• 1818 ई. को बाजीराव-II ने सर जॉन मेल्कम के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद पेशवा का पद समाप्त कर दिया गया और पेशवा को विठूर भेज दिया गया। पूना पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया।

• मराठों के आत्मसम्मान की तुष्टि के लिए सतारा नामक एक छोटे राज्य का अंग्रेजों द्वारा निर्माण किया गया तथा इसे शिवाजी के वंशज को सौंप दिया गया तथा पेशवा के राज्य के शेष भागों को बोम्बे प्रेजीडेन्सी में मिला दिया गया।

• किर्गी का युद्ध (5 नवम्बर, 1817), सीताबर्डी का युद्ध (27 नवम्बर, 1817 ई.) व महीदपुर युद्ध  (24 दिसम्बर, 1817) का संबंध तृतीय आंग्ला-मराठा युद्ध से संबधित है।

मराठों द्वारा सम्पन्न संधियाँ
संधिवर्षसंधिकर्ता
संगोला की सन्धि1750 ई.बालाजी बाजीराव व रामराज छत्रपति के मध्य
सुर्जी-अर्जनगाँव की सन्धि1803 ई.(30 दिसम्बर)सिन्धिया/अंग्रेज
मुंगी शिवगाँव की सन्धि1728 ई.(6 मार्च)बाजीराव प्रथम/निजाम
राक्षस-भुवन की सन्धि1763 ई.माधवराम प्रथम/निजाम
दुरई-सराय की सन्धि1738 ई.बाजीराव प्रथम/निजाम
पुरन्दर की सन्धि1665 ई.जयसिंह (मुगल)/शिवाजी
झलकी की सन्धि1752 ई.बालाजी बाजीराव/निजाम (हैदराबाद)
वार्ना की सन्धि1731 ई.शाहू/शम्भाजी द्वितीय
सूरत की सन्धि1775 ई.रघुनाथ राव/अंग्रेज (बम्बई प्रेसीडेन्सी)
पुरन्दर की सन्धि1776 ई.पेशवा माधवराव नारायण राव/अंग्रेज
बेसीन की सन्धि1802 ई.(31 दिसम्बर)बाजीराव द्वितीय/अंग्रेज
सालबाई की सन्धि1782 ई.पेशवा माधवराव नारायण राव/अंग्रेज
दिल्ली की सन्धि1719 ई.बालाजी विश्वनाथ/मुगल
बड़ौदा की सन्धि1817 ई.(6 नवम्बर)गायकवाड़/ अंग्रेज
बड़गाँव की सन्धि1779 ई.पेशवा माधवराज नारायण राव/अंग्रेज
पूना की सन्धि1817 ई.(13 जून)बाजीराव/ द्वितीय/अंग्रेज
नागपुर की सन्धि1816 ई.(27 मई)नागपुर के भौंसले/अंग्रेज
मंदसौर की सन्धि1818 ई.(6 जनवरी)होल्कर/अंग्रेज
ग्वालियर की सन्धि1817 ई.(5 नवम्बर)दौलतराव सिन्धिया/अंग्रेज
देवगाँव की सन्धि1803 ई.(17 दिसम्बर)भोंसले/अंग्रेज
राजपुर घाट की सन्धि1805 ई.(24 दिसम्बर)होल्कर/अंग्रेज

• ग्रांड डफ ने मराठा इतिहास पर “A History of  Marathas” नामक पुस्तक लिखी।

• जदुनाथ सरकार ने “Shivaji and his times” नामक पुस्तक 1919 ई. में लिखी।

सहायक संधि-लॉर्ड वेलेजली

• अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लॉर्ड वेलेजली ने एक नीति अपनाई, जो ‘सहायक संधि’ कहलाई।

• वे भारतीय शासक, जिन्हें इस संधि को स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया जाता था, उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे ब्रिटिश अनुमति के बिना किसी अन्य शक्ति से न तो लड़ाई करेंगे और न ही किसी प्रकार का संबंध रखेंगे।

• सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य की आंतरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश जनरल के नियंत्रण में एक ब्रिटिश सेना रखी जाती थी।

• इस सेना के खर्च को वहन करने के लिए उस राज्य को अपने क्षेत्र का एक हिस्सा कंपनी को देना पड़ता था या फिर केवल वार्षिक अनुदान देना पड़ता था। इसके बदले में कंपनी सहायक राज्यों को उनके आकार का विचार किए बिना बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करती थी।

• सहायक संधि स्वीकार करने वाले प्रमुख राज्य:-

   – हैदराबाद – 1798 (प्रथम राज्य)

            – मैसूर – 1799

            – अवध – 1801

            – पेशवा – 1802

डलहौजी की व्यपगत नीति (Doctrine of lapse):-

• लॉर्ड डलहौजी के काल में ब्रिटिश साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार हुआ। इसके साधन के रूप में डलहौजी ने व्यपगत नीति का प्रयोग किया। इस नीति के अंतर्गत भ्रष्टाचार या कुशासन का आरोप लगाकर राज्यों को हड़प लिया गया।

• इसी नीति का एक महत्त्वपूर्ण भाग पतन का सिद्धान्त था, जिसके अंतर्गत राज्य का स्वाभाविक या आनुवंशिक उत्तराधिकारी न होने पर, गोद निषेध द्वारा उन राज्यों को हड़प लिया गया। इसमें यह भी प्रावधान किया गया कि दत्तक पुत्र को तभी उत्तराधिकारी माना जाएगा जब ब्रिटिश सरकार उसे मान्यता दे।

• इस नीति द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल राज्य ̵

             – सतारा ̵ 1848

            – संभलपुर ̵ 1849

            – जैतपुर ̵ 1849

            – बाघाट ̵ 1850

            – उदयपुर (MP) ̵ 1852

            – झाँसी ̵ 1853

            – नागपुर ̵ 1854

            – तंजौर ̵ 1855

            – अवध ̵ (1856 ई. कुशासन के आधार पर)

अंग्रेजों की पंजाब विजय

• अंग्रेजों के लिए पंजाब विजय उनके साम्राज्य की सीमाओं को उत्तर-पश्चिम में उसकी प्राकृतिक सीमा तक विस्तृत करने के लिए आवश्यक थी। पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु से राजनीतिक अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी।

• मेजर ब्रॉसफूट को पंजाब में लॉर्ड हॉर्डिंग (1844-1848 ई.) द्वारा अंग्रेजों के राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में भेजा गया था, जिसने सिख कुलीनों को विभाजित करने और सिख सेना को सतलज नदी पार करने के लिए प्रवृत्त करने हेतु हर तरह का प्रयास किया।

• 1809 ई. में अमृतसर में की गई संधि द्वारा इस नदी को ब्रिटिश और महाराजा रणजीत सिंह के राज्यक्षेत्रों के मध्य की सीमा निर्धारित कर दी गई थी। सिख सेना ने मुश्किल से नदी पार की ही थी, कि लॉर्ड हार्डिंग ने युद्ध की घोषणा कर दी, यह युद्ध प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-1846 ई.) के नाम से जाना गया। सिखों के सेनापति तेजसिंह और अन्य सेनापतियों की हार के साथ ही यह युद्ध समाप्त हुआ।

• अंग्रेज़ लाहौर की ओर बढ़े और शांति की शर्तों का निर्देश दिया। इसी के अनुरूप मार्च, 1846 में लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि द्वारा महाराजा दिलीप सिंह ने सतलज नदी के बायीं तरफ और सतलज व व्यास नदी के बीच के सभी क्षेत्र अंग्रेज़ों को सौंप दिए।

• युद्ध के एक बड़े मुआवजे के रूप में उसे जम्मू और कश्मीर भी सौंपना पड़ा। उसकी सेना की शक्ति बहुत कम कर दी गई। इसके अतिरिक्त लाहौर में सुरक्षा सेना के साथ एक ब्रिटिश रेजीडेंट को नियुक्त किया गया।

• 1846 ई. के शांति समझौते ने न तो अंग्रेज़ों की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की पूर्ति की और न ही सिखों को संतुष्ट किया।

• लॉर्ड डलहौजी पंजाब को अधिगृहीत किए जाने के अवसर का इंतज़ार कर रहा था, उसको यह अवसर उस समय मिला जब गवर्नर मूलराज द्वारा ‘उत्तराधिकार शुल्क’ चुकाने में असमर्थता के कारण मुल्तान में विद्रोह हुआ।

• इसी बीच 20 अप्रैल,1848 को दो अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी गई। इस प्रकार का ‘विश्वास-भंग’ होने पर द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848-1849 ई.) हुआ।

• कई लड़ाइयों के बाद अंततः 12 मार्च, 1849 को सिखों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके सत्रह दिनों बाद पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में अधिग्रहण कर लिया गया। महाराजा दिलीप सिंह को इंग्लैंड निर्वासित कर दिया गया और पेंशन दी गई। प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी उससे लेकर महारानी विक्टोरिया के पास भेज दिया गया।

अंग्रेजों एवं भारतीय राज्यों के बीच हुई प्रमुख संधियाँ-

संधिवर्षसंधिकर्ता
अलीनगर की संधि9 फरवरी, 1757बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला औरईस्ट इंडिया कंपनी के बीच। इससंधि में अंग्रेजों के प्रतिनिधि के रूपमें क्लाइव और वॉटसन शामिल थे।
अमृतसर की संधि28 अप्रैल, 1809महाराजा रणजीत सिंह और ईस्टइण्डिया कंपनी के बीच इस संधि केसमय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्डमिन्टो थे, जिन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनीकी ओर से प्रतिनिधित्व किया था।
इलाहाबाद की संधि1765 ई.क्लाइव और मुगल बादशाहशाहआलम-II के बीच।
उदयपुर की संधि1818 ई.उदयपुर के राजा राणा और अंग्रेजोंके बीच।
गंडमक की संधि1879 ई.वायसराय लॉर्ड लिटन औरअफगानिस्तान के अपदस्थ अमीरशेर अली के बीच।
देवगाँव की संधि17 दिसम्बर, 1803रघुजी भौंसले और अंग्रेजों के बीच।
पुरंदर की संधिमार्च, 1776मराठों और ईस्ट इंडिया कंपनी केबीच।
पूना की संधि1817 ई.पेशवा बाजीराव-II और अंग्रेजों केबीच।
बड़गाँव की संधि1779 ई.मराठों और कंपनी के बीच (प्रथमआंग्ल-मराठा युद्ध के समय)। इससंधि पर अंग्रेजों की ओर से कर्नलकाकवर्न ने हस्ताक्षर किया था।
बनारस की संधिप्रथम संधि – 1773 ई.अवध के नवाब शुजाउद्दौला औरअंग्रेज ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच।
द्वितीय संधि – 1776 ई.काशी नरेश चैत सिंह और ईस्टइण्डिया कंपनी के बीच।
बेसीन की संधि31 दिसम्बर, 1802मराठा पेशवा बाजीराव-II औरअंग्रेजों के बीच।
सालबाई की संधि1782 ई.महाराजा शिन्दे और ईस्ट इण्डियाकंपनी के बीच।
सुर्जीअर्जन गाँव की संधि1803 ई.अंग्रेजों और दौलत राव के बीच।

गवर्नर जनरल/वायसराय

गवर्नर जनरलउनके शासनकाल के दौरान उनका योगदान / महत्त्व
वारेन हेस्टिंग्स1773-1785 ई.• वर्ष 1773 का विनियमन अधिनियम ।• वर्ष 1781 का अधिनियम, जिसके तहत् कलकत्ता में गवर्नर जनरल इन काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट के बीच अधिकार क्षेत्र की शक्तियों को स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया था।• पिट्स इंडिया अधिनियम, 1784 ई.• 1774 ई. का रोहिल्ला युद्ध ।• 1775-82 ई. में प्रथम मराठा युद्ध और 1782 ई. में सालबाई की संधि ।• 1780-84 ई. में द्वितीय मैसूर युद्ध ।• बनारस के महाराजा चैत सिंह के साथ तनावपूर्ण संबंध, जिसके कारण इंग्लैंड में हेस्टिंग्स का महाभियोग चला।• बंगाल की एशियाटिक सोसायटी की स्थापना (1784 ई.)।
लॉर्ड कॉर्नवालिस1786-1793 ई.• तृतीय मैसूर युद्ध (1790-92 ई.) और श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792 ई.)।  • कॉर्निवालिस कोड (1793 ई.) न्यायिक सुधार, और राजस्व प्रशासन और नागरिक अधिकार क्षेत्र का पृथक्करण ।• बंगाल की स्थाई बंदोबस्त व्यवस्था (1793 ई.)• प्रशासनिक मशीनरी का यूरोपीयकरण और नागरिक सेवाओं की शुरूआत ।
सर जॉन शोर1793-1798 ई.• वर्ष 1793 का चार्टर एक्ट ।• निज़ाम और मराठों (1795 ई.) के बीच खारदा की लड़ाई।
लॉर्ड वेलेजली1798-1805 ई.• सहायक संधि प्रणाली (1798 ई.) का परिचय हैदराबाद के निज़ाम के साथ प्रथम संधि । चौथा मैसूर युद्ध (1799 ई.)।• द्वितीय मराठा युद्ध (1803-05 ई.)।• तंजौर (1799 ई.), सूरत (1800 ई.) और कर्नाटक (1801 ई. ) के प्रशासन को संभाला। बेसीन की संधि (1802 ई.)।
सर जॉर्ज बेल1805-1807 ई.• वेल्लोर विद्रोह (1806 ई.)।
लॉर्ड मिंटो।1807-1813 ई.• (1809 ई.) में रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की संधि।
लॉर्ड हेस्टिंग्स1813-1823 ई.• एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814-16 ई.) और सागौली की संधि, (1816 ई.)।• तीसरा मराठा युद्ध (1817-19 ई.) और मराठा परिसंघ का विघटन बॉम्बे प्रेसीडेंसी का निर्माण (1818 ई.)।• पिंडारियों के साथ संघर्ष (1817-1818 ई.)।• सिंधिया (1817 ई.) के साथ संधि ।• मद्रास के गवर्नर (1820 ई.) थॉमस मुनरो द्वारा रैयतवाड़ी प्रणाली की स्थापना ।
लॉर्ड एमहर्स्ट1823-1828 ई.• प्रथम बर्मा युद्ध (1824-1826 ई.)• छतरपुर का अधिग्रहण (1826 ई.)
लॉर्ड विलियम बेंटिक1828- 1835 ई.• सती और अन्य क्रूर प्रथाओं का उन्मूलन (1829 ई.)• ठगी का दमन (1830 ई.) ।• वर्ष 1833 का चार्टर एक्ट ।• वर्ष 1835 का संकल्प, और शैक्षिक सुधार और आधिकारिक भाषा के रूप में अंग्रेजी की         शुरूआत।• मैसूर (1831 ई.), कुर्ग (1834 ई.) और केंद्रीय कछार (1834 ई.) का अधिग्रहण रणजीत सिंह के साथ ‘स्थायी मित्रता’ की संधि।• कॉर्नवालिस द्वारा स्थापित अपील और सर्किट के प्रांतीय न्यायालयों का उन्मूलन, राजस्व और सर्किट के आयुक्तों की नियुक्ति ।
लॉर्ड मेटकाफ1835-1836 ई.• भारत में प्रेस पर प्रतिबंधों को हटाने वाला नया प्रेस कानून।
लॉर्ड ऑकलैंड1836-1842 ई.• प्रथम अफगान युद्ध (1838-42 ई.) रणजीत सिंह की मृत्यु (1839 ई.) 
लॉर्ड एलनबरो1842-1844 ई.• सिंध का अधिग्रहण (1843 ई.)।• ग्वालियर के साथ युद्ध (1843 ई.)।
लॉर्ड हार्डिंग I1844-1848 ई.• प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46 ई.) और लाहौर की संधि (1846 ई.)।• कन्या भ्रूण हत्या और मानव बलि को समाप्त करने हेतु सामाजिक सुधार।
लॉर्ड डलहौजी1848-1856 ई.• द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848-49 ई.) और पंजाब का विलोपन (1849 ई.)। लोअर बर्मा या पेगु (1852 ई.) का अधिग्रहण ।• सतरा (1848 ई.), जैतपुर और संभलपुर (1849 ई.), उदयपुर (1852 ई.), झाँसी (1853 ई.), नागपुर (1854 ई.) और अवध (1856 ई.) का व्यपगत के सिद्धांत (doctrine of lapse) द्वारा अधिग्रहण । 1854 ई. के “वुड्स (चार्ल्स वुड, कंट्रोल ऑफ बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष) का शैक्षिक डिस्पैच” और एंग्लो-वर्नाक्यूलर स्कूल और सरकारी कॉलेज खोलना।• 1853 ई. का रेलवे विद्रोह और 1853 ई. में बॉम्बे और थाने को जोड़ने वाली पहली रेलवे लाइन बिछाना ।• टेलीग्राफ (कलकत्ता को बॉम्बे, मद्रास और पेशावर से जोड़ने के लिए 4000 मील की टेलीग्राफ लाइनों) और डाक (डाकघर अधिनियम, 1854 ई.) में सुधार।• गंगा नहर को खुली नहर (open canal) घोषित किया गया (1854 ई.), हर प्रान्त में अलग- अलग लोक निर्माण विभाग की स्थापना ।• विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, ( 1856 ई.)।
लॉर्ड कैनिंग1856-1857 ई.• 1857 में कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना।• 1857 का विद्रोह।

वायसराय

लॉर्ड कैनिंग1858-1862 ई.• भारत सरकार अधिनियम, 1858 इंडिया कंपनी से ब्रिटिश शासन को सत्ता हस्तांतरण।• 1859 में यूरोपीय सैनिकों द्वारा श्वेत विद्रोह• भारतीय परिषद् अधिनियम, 1861 ई.।
लॉर्ड एलगिन I1862-1863 ई.• वहाबी आंदोलन
लॉर्ड लॉरेंस1864-1869 ई.• भूटान युद्ध (1865 ई.)• कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास (1865 ई.) में उच्च न्यायालयों की स्थापना ।
लॉर्ड मेयो1869-1872 ई.• भारतीय राजकुमारों के राजनीतिक प्रशिक्षण के लिए काठियावाड़ में राजकोट कॉलेज और अजमेर में मेयो कॉलेज का उद्घाटन।• भारतीय सांख्यिकी सर्वेक्षण की स्थापना ।• कृषि और वाणिज्य विभाग की स्थापना ।• राज्य रेलवे की शुरुआत।
लॉर्ड नॉर्थब्रुक1872-1876 ई.• 1875 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स का भारत दौरा ।• बड़ौदा के गायकवाड़ के खिलाफ मुकदमा ।• पंजाब में कूका आंदोलन।
लॉर्ड लिटन1876-1880 ई.• मद्रास, बंबई, मैसूर, हैदराबाद, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों को प्रभावित करने वाला 1876-78 ई. का अकाल, रिचर्ड स्ट्रेची (1878 ई.) की अध्यक्षता में अकाल आयोग की नियुक्ति ।• रॉयल टाइटल एक्ट, (1876 ई.), क्वीन विक्टोरिया ने ‘कैसर-ए-हिंद’ या भारत की महारानी की उपाधि धारण की।• वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट, (1878 ई.)।• आर्म्स एक्ट, (1878 ई.) ।• दूसरा अफगान युद्ध (1878-80 ई.)।
लॉर्ड रिपन1880-1884 ई.• वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, (1882 ई.) का निरसन ।• श्रम स्थितियों में सुधार करने के लिए प्रथम फैक्ट्री अधिनियम, (1881 ई.)।• वित्तीय विकेंद्रीकरण कुछ और समय के लिए लागू रहने दिया गया ।• स्थानीय स्वशासन पर सरकारी प्रस्ताव (1882 ई.) रिपन को स्थानीय स्वशासन के पिता के रूप में जाना जाता है।• सर विलियम हंटर (1882 ई.) की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग की नियुक्ति ।• इलबर्ट बिल विवाद (1883-84 ई.)।• मैसूर के प्रति किए गए अन्याय को समाप्त करने की भावना से मैसूर के स्वर्गवासी राजा के दत्तक पुत्र को मैसूर पुनः लौटाकर अपनी उदारता का परिचय दिया।
लॉर्ड डफरिन1884-1888 ई.• तीसरा बर्मा युद्ध (1885-86 ई.) ।• भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ।
लॉर्ड लैंसडाउन1888-1894 ई.• कारखाना अधिनियम, (1891 ई.) ।• नागरिक सेवाओं को शाही प्रांतीय और अधीनस्थ में वर्गीकृत करना ।• भारतीय परिषद अधिनियम, (1892 ई.) ।• भारत और अफगानिस्तान के बीच (अब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन को परिभाषित करने के लिए डूरंड आयोग की स्थापना) रेखा का एक छोटा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारत को छूता है।
लॉर्ड एलगिन II1894-1899 ई.• चापेकर बंधुओं (1897 ई.) द्वारा दो ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या ।
लॉर्ड कर्जन1899-1905 ई.• पुलिस प्रशासन की समीक्षा करने के लिए सर एंड्र्यू फ्रेजर के तहत् पुलिस आयोग (1902 ई.) की नियुक्ति ।• विश्वविद्यालय आयोग, (1902 ई.) और भारतीय विश्वविद्यालयों अधिनियम, (1904 ई.) को पारित करना ।• वाणिज्य और उद्योग विभाग की स्थापना।• कलकत्ता निगम अधिनियम, (1899 ई.)।• प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, (1904 ई.)।• बंगाल का विभाजन (1905 ई.)।• कर्जन- किचनर विवाद । 
लॉर्ड मिंटो I1905-1910 ई.• विभाजन और स्वदेशी आंदोलन की लोकप्रियता ।• सूरत में 1907 ई.  के वार्षिक सत्र में कांग्रेस में विभाजन।• आगा खान (1906 ई.) द्वारा मुस्लिम लीग की स्थापना।
लॉर्ड हार्डिंग II1910-1916 ई.• वर्ष 1911 में बंगाल प्रेसीडेंसी (बॉम्बे और मद्रास की तरह) का निर्माण।• कलकत्ता से दिल्ली (1911 ई.) राजधानी स्थानांतरण।• मदन मोहन मालवीय द्वारा हिंदू महासभा (1915 ई.) की स्थापना ।• दिल्ली (1911 ई.) में आयोजित किंग जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक दरबार ।
लॉर्ड चेम्सफोर्ड1916-1921 ई.• एनी बेसेंट और तिलक (1916 ई.) द्वारा होम रूल लीग का गठन।• कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन (1916 ई.)।• कांग्रेस और मुस्लिम लीग (1916 ई.) के बीच लखनऊ समझौता।• गाँधी की वापसी के बाद साबरमती आश्रम की स्थापना (1916 ई.), चंपारण सत्याग्रह (1916 ई.), खेड़ा सत्याग्रह (1918 ई.), और अहमदाबाद में सत्याग्रह (1918 ई.) का शुभारंभ ।• मोंटेग्यू की अगस्त घोषणा (1917 ई.)• भारत सरकार अधिनियम, (1919 ई.)।• रौलेट एक्ट (1919 ई.)।• जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919 ई.)।• असहयोग और खिलाफत आंदोलन की शुरूआत।• पूना में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना (1916 ई.) और शैक्षिक नीति में सुधार के लिए सल्डलर आयोग (1917 ई.) की नियुक्ति ।• तिलक की मृत्यु (1 अगस्त, 1920 ई.) ।• बिहार के गवर्नर के रूप में एस. पी. सिन्हा की नियुक्ति (गवर्नर बनने वाले पहले भारतीय)।
लॉर्ड रीडिंग1921-1926 ई.• चौरी चौरा की घटना (5 फरवरी, 1922 ई.) और असहयोग आंदोलन की वापसी।• केरल में मोपला विद्रोह (1921 ई.)।• वर्ष 1910 के प्रेस एक्ट को रद्द करना और वर्ष 1919 का रौलट एक्ट ।• आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम और कपास उत्पाद शुल्क का उन्मूलन।• मुल्तान, अमृतसर, दिल्ली, अलीगढ़, और कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे ।• काकोरी ट्रेन डकैती (1925 ई.)।• स्वामी श्रद्धानंद की हत्या (1926 ई.)।• सी आर दास और मोतीलाल नेहरू (1922 ई.) द्वारा स्वराज पार्टी की स्थापना।• दिल्ली और लंदन दोनों में आईसीएस के लिए एक साथ परीक्षा आयोजित करने का निर्णय 1923 ई. से प्रभावी ।
लॉर्ड इरविन1926-1931 ई.• साइमन कमीशन (1928 ई.) का भारतीय दौरा और भारतीयों द्वारा आयोग का बहिष्कार।• भारत के भावी संविधान के सुझावों के लिए लखनऊ (1928 ई.) में एक अखिल पार्टी सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी रिपोर्ट को नेहरू रिपोर्ट या नेहरू संविधान कहा जाता था।• हारकोर्ट बटलर भारतीय राज्य आयोग (1927 ई.) की नियुक्ति ।• लाहौर के सहायक पुलिस अधीक्षक, सॉन्डर्स की हत्या, दिल्ली के असेम्बली हॉल में बम विस्फोट (1929 ई.), लाहौर षड्यंत्र केस और जतिन दास की मौत के बाद लंबे समय तक भूख हड़ताल (1929 ई.), और दिल्ली में ट्रेन बम दुर्घटना ( 1929 ई.)।• कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन (1929 ई.), पूर्ण स्वराज संकल्प।• सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए गाँधी द्वारा दांडी मार्च (12 मार्च, 1930 ई.)।• लॉर्ड इरविन (1929 ई.) द्वारा ‘दीपावली घोषणा’ ।• प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930 ई.) का बहिष्कार।• गाँधी-इरविन पैक्ट (1931 ई.), सविनय अवज्ञा आंदोलन का निलंबन
लॉर्ड विलिंगडन1931-1936 ई.• द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931 ई.) और सम्मेलन की विफलता, सविनय अवज्ञा आंदोलन को फिर से शुरू किया गया।• कम्युनल अवार्ड की घोषणा (1932 ई.) जिसके तहत् अलग-अलग सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र स्थापित किए गए थे।• यरवदा जेल में गाँधीजी का पूना संधि के समाप्त होने तक आमरण अनशन ।• तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932 ई.)।• व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा सत्याग्रह का शुभारंभ (1933 ई.)।• वर्ष 1935 का भारत सरकार अधिनियम ।• आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण (1934 ई.) द्वारा अखिल भारतीय किसान सभा (1936 ई.) और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना ।• बर्मा, भारत (1935 ई.) से अलग हो गया।
लॉर्ड लिनलिथगो1936-1944 ई.• प्रथम आम चुनाव (1936-37 ई.), कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला।• द्वितीय विश्व युद्ध (1939 ई.) के कारण कांग्रेस मंत्रालयों का इस्तीफा।• सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के पचासवें सत्र (1938 ई.) में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुने गए। वर्ष 1939 में बोस का इस्तीफा और फॉरवर्ड ब्लॉक (1939 ई.) का गठन।• मुस्लिम लीग द्वारा लाहौर संकल्प (मार्च, 1940 ई.), मुसलमानों के लिए अलग राज्य की माँग ।• वायसराय द्वारा अगस्त प्रस्ताव (1940 ई.), कांग्रेस द्वारा इसकी आलोचना और मुस्लिम लीग द्वारा समर्थन।• विंस्टन चर्चिल, इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चुने गए (1940 ई.)।• सुभाष चंद्र बोस का भारत से पलायन (1941 ई.) और इंडियन नेशनल आर्मी का संगठन ।• क्रिप्स मिशन भारत को डोमिनियन राज्य का दर्जा देने और संविधान सभा की स्थापना की योजना का प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा इसकी अस्वीकृति।• कांग्रेस द्वारा “भारत छोड़ो संकल्प पारित (1942 ई.), अगस्त क्रांति का प्रकोप या राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद 1942 ई. का विद्रोह ।• मुस्लिम लीग के करांची सत्र (1944 ई.) में डिवाइड एंड किट का नारा ।
लॉर्ड वेवल1944-1947 ई.• सी राजगोपालाचारी की सीआर फॉर्मूला (1944 ई.), गाँधी – जिन्ना वार्ता की असफलता (1944 ई.) • वेवेल योजना और शिमला सम्मेलन (1942 ई.)।• द्वितीय विश्व युद्ध का अंत (1945 ई.)।• कैबिनेट मिशन (1946 ई.) का प्रस्ताव और कांग्रेस द्वारा इसकी स्वीकृति।• मुस्लिम लीग द्वारा डायरेक्ट एक्शन डे’ (16 अगस्त, 1946 ई.) का पालन ।• संविधान सभा के चुनाव, कांग्रेस द्वारा अंतरिम सरकार का गठन (सितंबर, 1946 ई.)।• 20 फरवरी, 1947 ई. को क्लीमेंट एटली (इंग्लैंड के प्रधान मंत्री) द्वारा भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की घोषणा।
लॉर्ड माउंटबेटन1947-1948 ई.• तीन जून योजना (3 जून, 1947 ई.) की घोषणा।• हाउस ऑफ कॉमन्स में भारतीय स्वतंत्रता विधेयक का प्रस्ताव ।• बंगाल और पंजाब के विभाजन के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ के तहत् दो सीमा आयोगों की नियुक्ति ।

भारतीय राज्यों के प्रति ब्रिटिश नीति

• ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत में अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना निम्नलिखित चरणों में पूर्ण की :

1.    कंपनी द्वारा सफलता के लिए संघर्ष (1740-1765 ई.)

2.    घेरे की नीति (1765-1813 ई.)

3.    अधीनस्थ पार्थक्य की नीति (1813-1857 ई.)

4.    अधीनस्थ संघ की नीति (1858-1935 ई.)

5.    बराबरी की नीति (1935-1947 ई.)

1. रियासतों के समक्ष आने की नीति: (1740-1765 ई.)

• डुप्ले द्वारा भारत में कंपनी को व्यापारिक से राजनीतिक कंपनी बनाने का प्रयास किया गया।

• इलाहाबाद संधि ̵ यह संधि रॉबर्ट क्लाइव और शाहआलम  द्वितीय के बीच हुई। इस संधि के तहत् बंगाल, बिहार व उड़ीसा के दीवानी अधिकार अंग्रेजों को प्राप्त हो गए।

2. घेरे की नीति: (1765-1813 .) (रिंग फेंस नीति)

• इस नीति का निर्माता – वॉरेन हेस्टिंग्स

• मुख्य उद्देश्य – बफर स्टेट बनाना

• 1798 ई. लॉर्ड वेलेजली जब गवर्नर जनरल बनकर आया तब इसी नीति के तहत् उसने सहायक संधियाँ की।

• सर्वप्रथम  1798 ई. में हैदराबाद के निजाम ने सहायक संधि की वही 1809 में की राजस्थान की समस्त रियासतों ने भी सहायक संधि स्वीकार कर ली।

• इस नीति के तहत् विशाल ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई।

3. अधीनस्थ पार्थक्य की नीति: (1813-1857 ई.)

• इस नीति के तहत् ईस्ट इण्डिया कंपनी का लक्ष्य – साम्राज्य स्थापित कर सर्वश्रेष्ठता की ओर अग्रसर होना था।

• इसके तहत् रियासतों के – बाह्य मामले कंपनी के अधीन जबकि आंतरिक मामलों में उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की गई।

• इसके तहत् रियासतों को एक अंग्रेजी रेजीमेंट रखना अनिवार्य था।

• इस रेजीमेंट ने रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारंभ प्रारंभ कर दिया।

• वर्ष 1833 के चार्टर अधिनियम द्वारा कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को समाप्त कर अब केवल राजनीतिक मामलों में पूर्ण अधिकार प्रदान किया।

• इस नीति के तहत्  1834 ई. में कंपनी के डायरेक्टर्स ने रियासतों के विलय का निश्चिय किया।

• लॉर्ड विलयम बैटिंग सम्पूर्ण भारत का प्रथम गवर्नर जनरल के आने के बाद रियासतों का विलय प्रारंभ हुआ।

 जैसे –

• मैसूर 1831 ई., कचार 1832 ई., कुर्ग 1834 ई., जयन्तिया 1835 ई. बैटिंग के द्वारा इन रियासतों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय।

• करनूल व माण्डवी 1839 ई., कोलाबा 1840 ई., जालौर 1840 ई. इनका विलय ऑकलैण्ड के  समय ब्रिटिश साम्राज्य में हुआ।

 अधिनस्थ पार्थक्य नीति:

 बैटिंग व ऑकलैण्ड – रियासतों  को ब्रिटिश साम्राज्य में विलय

लॉर्ड डलहौजी की व्यपगत नीति का अधीनस्थ

• राज्य हड़प नीति

• गोद निषेध प्रथा

• डॉक्टरीन सिद्धांत

गोद निषेध प्रथा – राजा की उत्तरजीवी संतान नहीं होने पर राज्य का ब्रिटिश सत्ता में विलय।

• लॉर्ड डलहौजी को ही आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में जाना जाता है।

• डलहौजी के शासन काल में सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) की स्थापना हुई थी।

भारत में तीन प्रकार की रियासतें

1. ऐसी रियासतें जो कभी किसी के अधीन नहीं रहीं और न ही किसी प्रकार का कर अदा किया। ऐसी रियासतों को अनुमति का अधिकार नहीं था।

2. ऐसी रियासतें जो मुगल सम्राट के अधीन या पेशवा के अधीन रहीं उन्हें अग्रेंजों से अनुमति आवश्यक थी।

3. जो अंग्रेजों ने शासकों द्वारा प्रदत्त सनद (आज्ञा पत्र द्वारा) स्थापित की हो। यहाँ पर अंग्रेजों ने गोद लेने की अनुमति प्रदान नहीं की अपितु सीधे ही हड़प लिया।

 – सर्वप्रथम डलहौजी ने 1848 ई. में सतारा को हड़पा था।

 –  सन् 1856 में अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर 13 फरवरी, 1856 ई. को इसका ब्रिटिश साम्राज्य में  विलय कर दिया गया।

– 1849 ई. में पंजाब का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में किया गया।

4. अधीनस्थ संघ की नीति: (1858-1935 ई.)

• 1857 ई. की क्रांति के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया था।

• भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया गया।

• वायसराय का पद सृजित किया गया। गवर्नर जनरल के पद के स्थान पर।

• लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।

• 1858 ई. में ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया की घोषणा के साथ ही भारतीय रियासतों हेतु अधीनस्थ संघ की नीति प्रारंभ हुई। कम्पनी के समस्त अधिकार छीन लिए गए।

• 1876 ई. के राजकीय उपाधि अधिनियम द्वारा महारानी विक्टोरिया को केसरहिंद की उपाधि व उसे भारत की सम्राज्ञी घोषित कर दिया गया।

• इसी कारण अब सरकार को रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल गया।

लॉर्ड कर्जन (1899-1905 .) ने रियासतों के संरक्षण व अनाधिकार नीति का प्रारंभ किया तथा प्रजा के प्रशासन की तरफ ध्यान देने का निर्देश दिया।

• लॉर्ड कर्जन ने सिंचाई विभाग, पुलिस आयोग और विश्व विद्यालय आयोग की स्थापना की।

• रेलवे बोर्ड की स्थापना (1905 ई.) की।

• “भारतीय पुरातत्व विभाग” की स्थापना भी लॉर्ड कर्जन के काल में हुई थी।

• 1905 ईनरेन्द्र मंडल द्वारा अधीनस्थ संघ नीति पर जोर दिया।

उद्घाटन – फरवरी, 1921

• इसके तहत् रियासतों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया-

1. पूर्ण वैधानिकता प्राप्त रियासतें – इन्हें सीधा प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया, कुल 109 रियासतें थी।

2. ऐसी रियासतें जिनके वैधानिक व क्षेत्राधिकार सीमित थे, वे आपस में सहमति से 12 प्रतिनिधियों का चयन करें। ऐसी 127 रियासतें थीं।

3. जागीर रियासत या सामन्तराही रियासतें = 326 रियासतें

4. नरेन्द्र मण्डल सलाहकारी व परामर्शवादी निकाय था।

• इसके असफल होने पर 1927 ई. में बटलर समिति की स्थापना की गई। इस समिति ने रियासतों के मामलों में क्राउन को सर्वश्रेष्ठ माना तथा उनके रीति– रिवाजों की तरफ ध्यान देने की सिफारिश की।

5. बराबर की नीति (1935-1947 ई.)

• 1919 ई. में प्रांतों में द्वैध शासन की स्थापना की  गई।

• 1935 ई. के अधिनियम द्वारा प्रांतों में द्वैध शासन को समाप्त कर केन्द्र में द्वैध शासन की व्यवस्था की गई।

• इस अधिनियम द्वारा भारतीय संघ की विधानसभा में भारतीय शासकों को 125 स्थान तथा विधान परिषद् में 104 स्थान प्रदान किए गए।

• यह संघ अस्तित्व में नहीं आ पाया।

1857 की क्रांति

1857 के विद्रोह के प्रमुख कारण

राजनीतिक कारण

• 1857 ई. की क्रांति के राजनीतिक कारणों में लॉर्ड वेलेजली की ‘सहायक संधि’ तथा लॉर्ड डलहौजी का ‘व्यपगत का सिद्धांत’ (Doctrine of lapse) प्रमुख था।

• वेलेजली की ‘सहायक संधि’ के अनुसार भारतीय राजाओं को अपने राज्यों में कंपनी की सेना रखनी पड़ती थी। सहायक संधि से भारतीय राजाओं की स्वतंत्रता समाप्त होने लगी और राज्यों में कंपनी का हस्तक्षेप बढ़ने लगा था।

• लॉर्ड डलहौजी की ‘राज्य हड़प नीति’ या ‘व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of lapse) द्वारा अंग्रेज़ों ने हिंदू राजाओं के दत्तक पुत्र लेने के अधिकार को समाप्त कर दिया। वैध उत्तराधिकारी नहीं होने की स्थिति में राज्यों का विलय अंग्रेजी राज्यों में कर लिया जाता था।

• रियासतों के विलय के अतिरिक्त पेशवा (नाना साहब) की पेंशन रोके जाने का विषय भी असंतोष का कारण बना।

प्रशासनिक कारण

• अंग्रेजों ने भेदभावपूर्ण नीति अपनाते हुए, भारतीयों को प्रशासनिक सेवाओं में सम्मिलित नहीं होने दिया तथा उच्च पदों पर भारतीयों को हटाकर ब्रिटिश लोगों को नियुक्त किया गया। अंग्रेज़ भारतीयों को उच्च सेवाओं हेतु अयोग्य मानते थे। इन सब बातों से क्षुब्ध होकर भारतीयों में आक्रोश का भाव जागृत हो चुका था, जो 1857 ई. की क्रांति के रूप में सामने आया।

• अंग्रेज़ न्याय के क्षेत्र में भी स्वयं को भारतीयों से उच्च व श्रेष्ठ समझते थे। भारतीय जज किसी अंग्रेज़ के विरुद्ध मुकदमे की सुनवाई नहीं कर सकते थे। अंग्रेज़ों की न्याय प्रणाली पक्षपातपूर्ण, दीर्घावधिक व खर्चीली थी। अतः भारतीय इससे असंतुष्ट थे, जो 1857 ई. के विद्रोह में जनाक्रोश का एक कारण बना।

• डलहौजी ने तंजौर तथा कर्नाटक के नवाबों की उपाधियाँ जब्त कर ली, मुगल शासक बहादुरशाह को अपमानित कर लाल किला खाली करने को कहा और लॉर्ड कैनिंग ने घोषणा की कि बहादुरशाह के उत्तराधिकारी मुगल सम्राट नहीं सिर्फ राजा ही कहलाएँगे। परिणामतः मुगलों ने क्रांति के समय विद्रोहियों का साथ दिया।

• प्रशासन संबंधी कार्यों में योग्यता की जगह धर्म को आधार बनाया गया जिससे ईसाईयत की धर्मांतरण पद्धति का प्रसार हुआ, जिससे आमजन में विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई।

• 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही अकालों की बारंबारता ने ब्रिटिश प्रशासनिक तंत्र की पोल खोल दी।

सामाजिक एवं धार्मिक कारण

• सांस्कृतिक सुधार की नीतियों से पारंपरिक भारतीय संस्कृति को हीन मानकर बदलाव करना, इससे समाज का रूढ़िवादी वर्ग ब्रिटिशों के विरुद्ध खड़ा हो गया।

• 1850 ई. में आए ‘धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम’ द्वारा ईसाई धर्म को ग्रहण करने वाले को पैतृक संपत्ति में अधिकार मिल गया। इससे हिंदू समाज में असंतोष की भावना फैल गई।

• 1813 ई. के चार्टर एक्ट में ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया गया। कालांतर में बेरोजगारों, विधवाओं, जनजातियों व अनाथों का धर्मांतरण करवाया गया तथा साथ ही अंग्रेजों की नस्लवादी भेदभावपूर्ण नीतियों ने भी विद्रोह की पृष्ठभूमि को तैयार किया।

• 1856 ई. में डलहौजी के समय प्रस्तुत विधवा पुनर्विवाह अधिनियम लॉर्ड कैनिंग के शासन में पारित हुआ। इसके पहले भी सती प्रथा, दास प्रथा व नर बलि प्रथा पर लगाई गई रोक के कारण सामाजिक तनाव व्याप्त था।

• पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय समाज की मूल विशेषताओं को समाप्त कर दिया। परिणामतः परम्परागत शिक्षा समर्थकों ने विद्रोह के समय अंग्रेज़ों का विरोध किया।

आर्थिक कारण

• ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों, यथा- स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी तथा महालवाड़ी व्यवस्था आदि के द्वारा किसानों का जमकर शोषण किया गया।

• व्यापारिक कंपनी ने अपनी समस्त नीतियों के मूल में आर्थिक लाभ को केंद्र में रखा।

• कंपनी की नीतियों ने पारंपरिक उद्योगों को समाप्त कर दिया। इससे दस्तकारी व हथकरघा उद्योग में संलग्न वर्ग व किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत शोचनीय हो गई तथा कृषि के वाणिज्यीकरण से खाद्य संकट उत्पन्न हो गया।

सैन्य कारण

• सेना में भारतीय और अंग्रेज़ी सैनिकों का अनुपात लगभग 5:1 था।

• सैन्य सेवा में नस्लीय भेदभाव विद्यमान थे और योग्यता के बावजूद भारतीय सैनिक अधिकतम सूबेदार पद तक पहुँच सकते थे और साथ ही उनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता था।

• लॉर्ड कैनिंग के समय 1856 ई. में ‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम पारित किया गया, जिसके द्वारा किसी भी समय किसी भी स्थान पर, समुद्र पार भी सैनिकों का जाना अंग्रेजी आदेश पर निर्भर हो गया। यह भारतीयों के सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ़ था।

• 1854 ई. में डाकघर अधिनियम लाया गया, जिसके द्वारा अब सैनिकों को भी पत्र पर स्टैंप लगाना अनिवार्य हो गया। यह सैनिकों के विशेषाधिकारों के हनन जैसा था।

• 1857 ई. के विद्रोह के दमन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय फौज के नव गठन के लिए ‘पील आयोग’ का गठन किया, जिसने सेना के रेजीमेंटों को जाति, समुदाय और धर्म के आधार पर विभाजित किया।

तात्कालिक कारण

• दिसंबर, 1856 ई. में सरकार ने पुरानी लोहे वाली बंदूक ‘ब्राउन बेस’ के स्थान पर ‘एनफील्ड राइफल’ के प्रयोग का निश्चय किया। इसमें लगने वाले कारतूस के ऊपरी भाग को दाँतों से खोलना पड़ता था।

• बंगाल सेना में यह बात फैल गई कि कारतूस की खोल में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है। अतः इससे हिंदू और मुस्लिम सैनिकों को लगा कि चर्बीदार कारतूस का प्रयोग उनके धर्म को नष्ट कर देगा।

• अधिकारियों ने इस अफवाह की जाँच किए बिना तुरंत इसका खंडन कर दिया। कालांतर में यह बात सही साबित हुई कि गाय और सूअर की चर्बी वास्तव में वूलिच शस्त्रागार में प्रयोग की जाती थी।

• सैनिकों का विश्वास था कि सरकार जान-बूझकर ऐसे कारतूसों का प्रयोग करके उनके धर्म को नष्ट करने तथा उन्हें ईसाई बनाने का प्रयत्न कर रही है। अतः सैनिकों ने क्षुब्ध होकर अंगेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

1857 के विद्रोह का प्रारंभ

• 29 मार्च, 1857 ई. को 34वीं रेजीमेंट, बैरकपुर के सैनिक मंगल पाण्डे द्वारा चर्बी लगे कारतूस के प्रयोग के विरोध ने विद्रोह का  प्रारंभ किया तथा विद्रोह की शुरुआत कर दी।

• उसने सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट बाग एवं मेजर सार्जेण्ट की गोली मारकर हत्या कर दी। 8 अप्रैल, 1857 ई. को सैन्य अदालत के निर्णय के बाद मंगल पाण्डे को फाँसी की सज़ा दे दी गई, जो कि 1857 ई. की क्रांति का प्रथम शहीद माना गया।

• 1857 ई. के विद्रोह के दौरान बैरकपुर में कमांडिंग ऑफिसर हैरसे था।

• 10 मई, 1857 ई. को मेरठ छावनी में तैनात भारतीय सेना ने चर्बी युक्त कारतूस के प्रयोग से इनकार कर दिया एवं अपने अधिकारियों पर गोलियाँ चलाई और विद्रोह प्रारंभ कर दिया। इस समय मेरठ में सैन्य छावनी के अधिकारी जनरल हेविड थे।

विद्रोह का विस्तार

 दिल्ली

• विद्रोह का आरंभ 10 मई, 1857 ई. को मेरठ छावनी में हुआ। 20वीं N.I. के सिपाहियों ने अपने अधिकारियों पर गोली चलाई और अपने साथियों को मुक्त करवा कर दिल्ली की ओर कूच किया तथा 11 मई को मेरठ के विद्रोही दिल्ली पहुँचे और 12 मई, 1857 ई. को उन्होंने दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा मुगल बादशाह बहादुरशाह द्वितीय को पुनः भारत का सम्राट व क्रांति का नेता घोषित किया।

• दिल्ली में मुगल शासक बहादुरशाह द्वितीय को प्रतीकात्मक नेतृत्व दिया गया, किंतु वास्तविक नेतृत्व बख्त खाँ के पास था। हालाँकि दिल्ली पर अंग्रेज़ों का पुनः अधिकार सितंबर, 1857 ई. को पूरी तरह हो गया।’ इस संघर्ष को दबाने के लिए अंग्रेज अधिकारी जॉन निकोलसन, हडसन व लॉरेंस को भेजा गया जिसमें जॉन निकोलसन मारा गया।

• हडसन ने सम्राट के दो पुत्रों और पौत्र को यह वचन देकर कि उन्हें कोई क्षति नहीं पहुँचाई जाएगी, गोली मार कर हत्या कर दी। बहादुरशाह द्वितीय की गिरफ्तारी हुमायूँ के मकबरे से हुई थी। इसकी सूचना जीनत महल ने दी थी। बहादुरशाह द्वितीय को रंगून भेज दिया गया जहाँ 1862 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

लखनऊ

• जून, 1857 ई. में विद्रोह का प्रारंभ बेगम हज़रत महल (महक परी के नाम से भी जानी जाती थी) के नेतृत्व में हुआ। उन्होंने अपने अल्पायु पुत्र बिरजिस कादिर को नवाब घोषित कर दिया तथा अपना प्रशासन स्थापित किया। चीफ कमिश्नर हेनरी लॉरेंस, लखनऊ में स्थित ब्रिटिश रेजीडेंसी की रक्षा करते हुए मारे गए। अंत में कैम्पबेल ने मार्च, 1858 ई. में विद्रोह को दबा कर लखनऊ पर पुनः कब्जा कर लिया।

• तात्या टोपे के नेतृत्व में ‘चिनहट’ के पास अंग्रेजी सेना को हराया गया और हेवलॉक मारा गया। कालांतर में कर्नल नील भी लखनऊ में मारा गया।

 कानपुर

• 5 जून, 1857 ई. को कानपुर अंग्रेजों के हाथ से निकल गया। यहाँ पर पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब (धोंदूपंत) ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। इसमें उनकी सहायता तात्या टोपे ने की थी, जिनका असली नाम रामचंद्र पांडुरंग था।

• दिसंबर, 1857 ई. में कैंपबेल ने कानपुर पर फिर से अधिकार कर लिया। नाना साहब अंत में नेपाल चले गए।

झाँसी

• झाँसी में जून, 1857 ई. में रानी लक्ष्मीबाई (जन्म-वाराणसी, मृत्यु ग्वालियर) के नेतृत्व में विद्रोह प्रारंभ हुआ। झाँसी में ह्यूरोज की सेना से पराजित होकर वे ग्वालियर पहुँची। तात्या टोपे झाँसी की रानी से जाकर मिले। झाँसी की रानी सैनिक वेशभूषा में लड़ती हुई दुर्ग की दीवारों के पास वीरगति को प्राप्त हुई।

• तात्या टोपे ने अंग्रेजों को सर्वाधिक परेशान किया और सिंधिया की अस्वीकृति के बावजूद ग्वालियर की सेना व जनता का उन्हें सहयोग मिला। अपने गुरिल्ला युद्धों द्वारा उन्होंने विद्रोह को एक नया आयाम दिया, किंतु बाद में उनके विश्वासघाती मित्र मान सिंह ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया और वर्ष 1859 में ग्वालियर में उन्हें फाँसी दे दी गई।

बिहार

• जगदीशपुर में विद्रोह का नेतृत्व कुँवर सिंह ने किया। कुँवर सिंह की मृत्यु के बाद विद्रोह का नेतृत्व इनके भाई अमर सिंह ने किया। अंत में विलियम टेलर एवं विंसेट आयर ने यहाँ विद्रोह को दबा दिया।

फैज़ाबाद

• फैज़ाबाद में विद्रोह का नेतृत्व अहमदुल्लाह ने किया। कैम्पबेल ने यहाँ के विद्रोह को दबाया।

• अहमदुल्ला ने अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद का नारा दिया था।

इलाहाबाद

• इलाहाबाद में जून के प्रारंभ में विद्रोह हुआ, जिसकी कमान मौलवी लियाकत अली ने संभाली। अंत में जनरल नील ने यहाँ के विद्रोह को दबा दिया। विद्रोह के दौरान तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद को आपातकालीन मुख्यालय बनाया था।

बनारस

• सामान्य जनता का विद्रोह।

• कर्नल नील द्वारा दमन।

• यहाँ बच्चों व स्त्रियों को भी मृत्युदंड दे दिया गया।

बरेली

• बरेली में खान बहादुर खाँ ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया और अपने आप को ‘नवाब’ घोषित किया।

• कैंपबेल ने यहाँ के विद्रोह को भी दबा दिया और खान बहादुर को फाँसी की सजा दी गई।

राजस्थान

• राजस्थान में कोटा ब्रिटिश विरोधियों का प्रमुख केंद्र था। यहाँ जयदयाल और मेहराब खाँ ने विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया।

 असम

• असम में विद्रोह की शुरुआत मनीराम दत्त ने की तथा अंत में राजा के पोते कंदर्पश्वर सिंघा को राजा घोषित कर दिया। मनीराम को पकड़कर कलकत्ता में फाँसी दे दी गई।

उड़ीसा

• उड़ीसा में संबलपुर के राजकुमार सुरेंद्र साई विद्रोहियों के नेता बने। 1862 ई. में सुरेंद्र साई ने आत्मसमर्पण कर दिया। इन्हें देश से निकाल दिया गया।

• फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्लाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध फतवा जारी किया और जिहाद का नारा दिया। अंग्रेजों ने इनके ऊपर 50 हज़ार रुपये का इनाम घोषित किया था।

• विद्रोह के समय एक झंडा गीत की रचना हुई, जिसे अजीमुल्लाह ने लिखा था।

• लंदन टाइम्स के पत्रकार ‘माइकल रसेल’ ने इस विद्रोह का सजीव वर्णन किया।

• बंगाल, पंजाब, राजपूताना, पटियाला, जींद, हैदराबाद, मद्रास आदि ऐसे क्षेत्र थे, जहाँ पर विद्रोह पनप नहीं सका। यहाँ के शासक व जमींदार वर्ग ने विद्रोह को कुचलने में ब्रिटिशों की सहायता भी की।

• 1857 ई. के विद्रोह में अवध में इस तरह जनता ने भाग लिया कि यह स्वतंत्रता संग्राम जैसा प्रतीत होने लगा।

विद्रोह का परिणाम

• स्वतंत्रता संग्राम की दृष्टि से भले ही यह विद्रोह असफल रहा हो परंतु इसके दूरगामी परिणाम काफी उपयोगी रहे। मुगल साम्राज्य का दरवाजा सदा के लिए बंद हो गया। ब्रिटिश क्राउन ने कंपनी से भारत पर शासन करने के सभी अधिकार वापस ले लिए।

• 1 नवंबर, 1858 ई. को इलाहाबाद में आयोजित दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा को पढ़ा। उद्घघोषणा में भारत में कंपनी का शासन समाप्त कर भारत का शासन सीधे क्राउन के अधीन कर दिया गया।

• इस अधिनियम के द्वारा भारत राज्य सचिव के पद का प्रावधान किया गया तथा उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय इंडिया काउंसिल (मंत्रणा समिति) की स्थापना की गई। इन सदस्यों में 8 की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार द्वारा तथा 7 की नियुक्ति ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ द्वारा किया जाना सुनिश्चित किया गया।

• भारत सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था और इस प्रकार संसद के प्रति उत्तरदायी होता था।

• 1858 ई. के अधिनियम के तहत् भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय कहा जाने लगा। इस तरह लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने। ब्रिटिश के साम्राज्य विस्तार पर रोक, धार्मिक मामलों में अहस्तक्षेप, सबके लिए एक समान कानूनी सुरक्षा उपलब्ध कराना, भारतीयों  प्राचीन अधिकारों की रक्षा व रीति-रिवाजों के प्रति सम्मान के वायदे भारत सरकार अधिनियम, 1858 ई. के तहत् किए गए।

• अंग्रेजों की सेना का पुनर्गठन किया गया ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचा जा सके। अब भारतीय सैनिकों की संख्या में वृद्धि की गई तथ तोपखाना पूर्णतः यूरोपीय सैनिकों के हाथों में सौंप दिया गया। विद्रोह के पूर्व बंगाल व अवध के सैनिकों की संख्या सर्वाधिक थी, परंतु अब सिखों व गोरखों की संख्या में काफी बढ़ोतरी कर दी गई।

1857 के विद्रोह के बारे में इतिहासकारों के मत

• “यह धर्मांधों का ईसाइयों के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध था”- एल.ई.आर. रीज

• “यह राष्ट्रीय विद्रोह था, न कि सिपाही विद्रोह“ – बेंजामिन डिजरैली

• “1857 का विद्रोह न तो प्रथम था, न ही राष्ट्रीय था और यह न ही स्वतंत्रता संग्राम था।“ – आर. सी. मजूमदार

• “यह पूर्णतया देशभक्ति रहित और स्वार्थी सिपाही विद्रोह था।“ – सीले

• “यह सिपाही विद्रोह के अतिरिक्त कुछ नहीं था। “- जॉन लॉरेंस

• “यह सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष था।“ – टी.आर. होम्स

• “यह विद्रोह राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया सुनियोजित स्वतंत्रता ग्राम था।“ – वी.डी. सावरकर

• “यह अंग्रेज़ों के विरुद्ध हिंदू व मुसलमानों का षड्यंत्र था।“ – जेम्स आउट्रम व डब्ल्यू. टेलर

1857 ई. के विद्रोह से संबंधित प्रमुख पुस्तकें एवं उनके लेखक

‘द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेस 1857’वी. डी. सावरकर
‘द पीजेंट एंड द राज’एरिक थॉमस स्टोक्स
‘1857 द ग्रेट रेबेलियन’अशोक मेहता
‘द सिपॉय म्यूटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ 1857’आर. सी. मजूमदार
‘सिविल रिबेलियन इन इंडियन म्यूटिनीस 1857-1859’शशि भूषण चौधरी
‘द हिस्ट्री ऑफ द सिपॉय वॉर इन इंडिया’जॉन विलियम काये
‘द कॉजेज ऑफ द इंडियन रिवोल्ट’ (1858)सर सैय्यद अहमद खाँ
‘द सिपॉय म्यूटिनी ऑफ 1857’ ए सोशल एनालिसिसएच.पी. चट्टोपाध्याय
‘1857’एस.एन.सेन
1857 का विद्रोह संक्षेप में
केन्द्रविद्रोहीविद्रोह कुचलने वाले अंग्रेज अधिकारी
दिल्ली11-12 मई, 1857बहादुरशाह, बख्त खाँनिकलसन, हडसन
कानपुर5 जून, 1857 ई.नाना साहब, तात्या टोपेकॉलिन कैम्पबेल, हेवलॉक
लखनऊ/अवध4 जून, 1857 ई.बेगम हजरत महलकैम्पबेल
झाँसी, ग्वालियर4 जून, 1857रानी लक्ष्मी, तात्या टोपेजनरल ह्यूरोज
जगदीशपुर12 जून, 1857कुंवर सिंहविलियम टेलर, विंसेट आयर
फैजाबादजून, 1857मौलवी अहमद उल्लाजनरल रेनॉर्ड
इलाहाबाद6 जून, 1857लियाकत अलीकर्नल नील
बरेलीजून, 1857खान बहादुर खान (बख्त खाँ)विंसेट आयर, कैम्पबेल
फतेहपुरअजीमुल्लारेनर्ड एवं कैम्पबेल

• डॉ. ताराचन्द को भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का सरकारी इतिहासकार माना जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश प्रभाव

• भारत में अनेक विदेशी शक्तियों का आगमन हुआ, जिसमें ब्रिटिश प्रमुख है क्योंकि ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था उपनिवेशी अर्थव्यवस्था (Colonial Economy) में रूपान्तरित हो गई तथा भारतीय अर्थव्यवस्था की सभी नीतियाँ एवं कार्यक्रम औपनिवेशिक हितों के अनुसार बनने लगे। 1757 ई. में ‘प्लासी युद्ध’ के बाद ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने बंगाल पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

1. अनौद्योगिकीकरण एवं भारतीय हस्तशिल्प का ह्रास ̵ 1813 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा ब्रिटिशों को भारत से व्यापार करने की आजादी मिलने के बाद भारतीय बाजार सस्ते एवं मशीन निर्मित आयात से भर गए। इधर भारतीय उत्पादों का यूरोपीय बाजारों में प्रवेश करना अत्यंत कठिन हो गया। 1820 ई. के पश्चात् यूरोपीय बाजार भारतीय उत्पादों के लिए बंद हो गए। भारत में रेलवे के विकास ने यूरोपीय उत्पादों को भारत के दूर-दराज क्षेत्रों में भर जाने से भारतीय माल अंग्रेजों के सस्ते माल से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सका। इसके कारण भारत के अनेक शहरों का पतन हुआ तथा भारतीय शिल्पियों ने गाँवों की ओर पलायन किया। अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों के कारण बहुत से भारतीय दस्तकारों ने अपने परंपरागत व्यवसाय को त्याग दिया। वे गाँवों में जाकर खेती करने लगे। 1901 ई. और 1941 ई. के बीच कृषि पर निर्भर जनसंख्या का 63.7% थी। यह दबाव ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की घोर गरीबी के मुख्य कारणों में से एक था। भारत एक सम्पूर्ण निर्यातक देश से सम्पूर्ण आयातक देश बना गया।

• वर्ष 1813 एक्ट द्वारा कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया था।

2. किसानों की दरिद्रता – कालान्तर में लगान व्यवस्था में व्याप्त असंगतियों के कारण वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1772 ई. में बंगाल में द्वैध शासन का अंत कर राजस्व वसूली का काम स्वयं कम्पनी की देखरेख में शुरू किया।

इजारेदारी प्रथा

• सन् 1772 में एक पंचवर्षीय इजारेदारी प्रथा चालू  की गई। इस नई प्रथा में सबसे अधिक बोली लगाने वाले को भू-राजस्व वसूली का ठेका दिया जाता था।

• इस प्रथा से भू-राजस्व की रकम तो बढ़ गई पर वास्तविक वसूली प्रतिवर्ष घटती-बढ़ती रहती थी। यह योजना कृषि की उन्नति, कृषकों का शोषण बंद करने और कंपनी की धन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकी।

• इस पंचवर्षीय इजारेदारी प्रथा के असफल होने के बाद इसे 1776 ई. में एक वर्षीय कर दिया।

 इसमें जमींदारों को प्राथमिकता दी गई।               

• इसी समय ब्रिटेन अपना अमेरिकी उपनिवेश खो चुका था। अत: वो भारत को मजबूत उपनिवेश बनाने को प्रयासरत था।

• वॉरेन हेस्टिंग्स के बाद गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस का आगमन हुआ। उन्होंने यह अनुभव किया कि कृषि अर्थव्यवस्था में गिरावट के कारण कंपनी की राजस्व दर में उतार-चढ़ाव हो रहा है, तो उन्होंने नई प्रथा को शुरू किया।

जमींदारी/स्थायी/इस्तमरारी व्यवस्था (1793 ई.)

• वर्ष 1790 में कॉर्नवालिस ने एक 10 वर्षीय भू-राजस्व लागू की, जिसे स्थायी बंदोबस्त के नाम से जाना गया। इसमें भूमि का मालिक तथा लगान वसूली का अधिकारी जमीदार को ही माना गया। सन् 1793 में कॉर्नवालिस ने 10 वर्षीय व्यवस्था को बदलकर स्थायी कर दिया। लगान वसूली का 10/11 भाग सरकार का  तथा शेष 1/11 भाग जमींदार का तय कर दिया गया, जमींदार किसानों से कितना लगान वसूल करे यह तय नहीं होने के कारण जमींदार किसानों से अत्यधिक लगान वसूलते थे जिससे किसानों पर शोषण बढ़ने लगा। वर्ष 1793 के अधिनियम-14 से सरकार को जमींदार की संपत्ति जब्त करने का अधिकार मिला। सन् 1794 में सूर्यास्त का नियम लागू कर दिया अर्थात् नियत समय तक सरकार के पास लगान न पहुँचने पर जमींदारी नीलाम की जाने लगी। यह व्यवस्था भारत के 19% भाग पर लागू की गई, जिसमें बंगाल, बिहारउड़ीसा के अतिरिक्त बनारस व उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्र शामिल कर जमीनों की नीलामी के कारण उपसामंतीकरण का उदय हुआ। अंग्रेजों को भारत में जमींदारों के रूप में एक सामंती मित्र मिल गया जो  चाहते थे, की अंग्रेज यहाँ बसे रहे। इसलिए 1857 ई. के विद्रोह में जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया।

रैय्यतवाड़ी व्यवस्था (1820 ई.)

• इसमें प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार (किसान) को भूमि का स्वामी माना गया। यदि किसान निर्धारित लगान जमा नहीं कर पाया तो उसे भू-स्वामित्व से वंचित कर दिया जाता था। इस व्यवस्था का जन्मदाता टॉमस मुनरो और कैप्टन रीड को कहा जाता है। 1792 ई. में पहली बार रैय्यतवाड़ी व्यवस्था तमिलनाडु के बारामहल जिले में कर्नल रीड द्वारा लागू की गई। सन् 1820 में इसे मद्रास में लागू किया गया। यहाँ मुनरो को गवर्नर नियुक्त किया गया। 1825 ई. में यह व्यवस्था बंबई तथा 1858 ई. तक यह संपूर्ण दक्कन और अन्य क्षेत्रों में लागू की गई। यह व्यवस्था भारत के 51% भू-भाग पर लागू की गई थी, यह व्यवस्था 30 वर्षों के लिए लागू की गई और इसकी दर 1/3 निश्चित की गई। अधिकांश क्षेत्रों में अधिक राजस्व प्राप्ति के लिए लगान की दरें ऊँची रखी गई थी।

महालवाड़ी व्यवस्था (1882 ई.)

• महाल का अर्थ – गाँव होता है। इस व्यवस्था में गाँव के मुखिया से सरकार का लगान वसूली का समझौता होता था। इस व्यवस्था को होल्ट मैकेंजी ने शुरू किया। 1820 ई. में इस योजना का प्रतिवेदन दिया व 1822 ई. में महालवाड़़ी व्यवस्था को कानूनी रूप से लागू किया गया। यह व्यवस्था मध्य प्रांत, उत्तर प्रदेश एवं पंजाब में लागू थी। इस व्यवस्था में महाल के मुखिया को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। इससे सरकार को लगान वसूली में अधिक खर्च करना पड़ा यह व्यवस्था बुरी तरह विफल रही।

• इस व्यवस्था को रेग्यूलेशन -7 के द्वारा ब्रिटिश भारत के 30% भाग पर लागू किया गया।

3. पुराने जमींदारों की तबाही तथा नई जमींदारी व्यवस्था का उदय–   

• ब्रिटिश शासन के पिछले कुछ दशकों में बंगाल व मद्रास के पुराने जमींदार तबाह हो गए। यह सबसे ऊँची बोली लगाने वाले जमींदार को ही राजस्व वसूली के अधिकार नीलाम करने की वॉरेन हेस्टिंग्स की नीति के कारण हुआ। वसूली संबंधी सख्ती के कारण राजस्व अदायगी में विलंब के कारण जमींदारी संपत्तियाँ बड़ी कठोरता से नीलाम कर दी गई। लगभग आधी भू-संपत्तियाँ पुराने जमींदारों के हाथों से निकलकर सौदागरों तथा अन्य धनी वर्गों के पास जा चुकी थी। ये किसानों से बहुत अधिक लगान ऐठते तथा जब भी चाहते उन्हें बेदखल कर देते।

• उत्तर मद्रास में स्थायी बंदोबस्त और उत्तर प्रदेश में अस्थायी जमींदारी बंदोबस्त भी स्थानीय जमींदार के लिए समान रूप से कठोर थे।

• जमींदार भू-राजस्व समय पर अदा कर सकें, इसके लिए किसानों के परंपरागत अधिकार समाप्त हो गए। रैय्यतवाड़ी क्षेत्रों में भी जमींदार- रैय्यत संबंधों की प्रणाली धीरे-धीरे असफल हो गई। अधिकाधिक जमीन महाजनों, सौदागरों और धनी किसानों के हाथ में चली गई। बटाईदारी नामक एक अन्य प्रथा का प्रसार हुआ। जमींदारी प्रथा के प्रसार के कारण बिचौलियों का उदय हुआ। जमींदारों एवं किसानों के मध्य कोई परंपरागत समझौता न होने के कारण इन जमींदारों ने कृषि के विकास के लिए न किसी प्रकार का निवेश किया न ही इस कार्य में रुचि ली। इन जमींदारों का हित ब्रिटिश शासन के चलते रहने से ही था और इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में अंग्रेजों का साथ दिया।

4. कृषि में ठहराव एवं उसकी बर्बादी –

• कृषि पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव, अत्यधिक भू-राजस्व निर्धारण जमींदारी प्रथा के पनपने, बढ़ती ऋणग्रस्तता और किसानों की बढ़ती दरिद्रता के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि के द्वारा होने लगा। वर्ष 1901 ई. से 1939 ई. के बीच कुल कृषि उत्पादन 14% कम हो गया। जमींदारों का गाँवों से कोई संबंध नहीं था तथा सरकार द्वारा कृषि तकनीक एवं कृषि से संबंधित शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय अत्यल्प था।

• इन सभी कारणों से भारतीय कृषि का धीरे-धीरे पतन होने लगा तथा उसकी उत्पादकता कम हो गई।

5. भारतीय कृषि का वाणिज्यीकरण ̵

• इस दौर में कुछ विशेष फसलों का उत्पादन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए होने लगा न कि ग्रामीण उपयोग के लिए। मूँगफली, गन्ना, पटसन, कपास, नील, अफीम, चाय, तिलहन, तंबाकू, मसाले, फलों तथा सब्जियों जैसी वाणिज्य फसलों का उत्पादन बढ़ गया। वाणिज्यीकरण के फलस्वरूप किसान ऋण के बोझ में और दब गए, उसकी जमीनें नीलाम हो गई उन्हें अकाल का सामना करना पड़ा तथा दक्षिण भारत में व्यापक पैमाने पर आंदोलन हुए।

6. आधुनिक उद्योगों का विकास ̵

• उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में बड़े पैमाने पर आधुनिक उद्योगों की स्थापना की गई, जिसके कारण भारत में मशीनी युग प्रारंभ हुआ। पहली कपड़ा मिल 1854 ई. में कावासजी नाना भाई डावर ने बंबई में शुरू की और पहली जूट मिल 1855 ई. में रिशरा (बंगाल) में स्थापित की गई। इन उद्योगों का विस्तार धीरे-धीरे मगर सतत रूप से हुआ। 1879 ई. तक भारत में 56 सूती मिल स्थापित हुईं जिनमें लगभग 43000 लोग काम करते थे।

• सन् 1905 तक 200 सूती मिलें व 36 से अधिक जूट मिलें थी लेकिन इस अवधि में भारतीय स्वामित्व वाले उद्योगों के समक्ष अनेक समस्याएँ थी जैसे- भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रशुल्क संरक्षण का अभाव, विदेशी उद्योगों से असमान प्रतिस्पर्द्धा तथा ब्रिटिश उद्योगपतियों द्वारा दृढ़ विरोध आदि। तकनीकी शिक्षा को संरक्षण न दिए जाने के कारण उद्योगों को तकनीकी रूप से दक्ष मानवशक्ति के अभाव का सामना करना पड़ा।

• औद्योगिक पूँजीवादी वर्ग तथा श्रमिक वर्ग का उदय इस चरण की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।

7. रेलवे का विकास क्रम ̵

• 1846 ई. में लॉर्ड हॉर्डिंग द्वारा सैन्य यातायात के लिए पहली बार भारत में रेलवे के विकास की बात की गई।

• भारत में रेलवे के विकास क्रम का प्रथम चरण 1849 ई. से 1864 ई. तक माना जाता है।

• 1849 ई. में पहली रेलवे लाइन कलकत्ता से रानीगंज तक बिछाई गई।

• 1853 ई. में डलहौजी के काल में रेलवे के विकास में तीव्रता आई। इसमें निवेश की शुरुआत सार्वजनिक कंपनियों ने नहीं बल्कि निजी कंपनियों ने की।

• देश में पहली रेल मुंबई से थाणे के बीच चलाई गई (16 अप्रैल, 1853 ई. )

• 1856 ई. में भारत में विदेशी निवेश की शुरुआत रेलवे के संदर्भ में ही हुई।

• 1869 ई. तक रेलवे प्रबंधन के लिए 33 कंपनियाँ थी जिनमें 24 निजी, 5 सरकारी व 4 देशी रियासतें थी।

• 1879 ई. में लिटन के कार्यकाल में सबसे पहले पूर्वी रेलवे को खरीदा गया।

• वर्ष 1905 ई. में कर्जन ने थॉमस रॉबर्टसन के नेतृत्व में एक रेलवे बोर्ड की स्थापना की।

• एकबर्थ आयोग (1921-22 ई.) की रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 1925 ई. में रेलवे बजट को आम बजट से अलग कर दिया गया।

• सन् 1947 में आजादी के पहले के.सी. नियोगी की अध्यक्षता में रेलवे वित्त से संबंधित तथ्यों के निरीक्षण के लिए एक समिति का गठन हुआ।

• सन् 1853 में भारत में पहला चाय बागान स्थापित हुआ और 1837 ई. में असम चाय लिमिटेड की स्थापना की गई। वर्ष 1916 में थॉमस हॉलैंड के नेतृत्व में एक ‘औद्योगिक आयोग’ भारत आया। इब्राहिम रहीमतुल्ला की अध्यक्षता में वित्तीय आयोग ने भी भारत के उद्योगों के संरक्षण की माँग की। 1830 ई. में आधुनिक इस्पात तैयार करने का प्रथम प्रयास अर्काट (मद्रास) में जेसिया मार्सल हिट द्वारा किया गया। 1874 ई. में ‘बंगाल आयरन एण्ड वर्क्स कंपनी’ स्थापित हुई जो भारत में पहली आधुनिक लौह इस्पात कंपनी बनी। वर्ष 1907 में निजी क्षेत्र में पहला इस्पात कारखाना लगाया गया (TISSCO)।

• टाटा लौह इस्पात कारखाना, वर्ष 1927 में फिक्की (FICCI) की स्थापना से भारतीय उद्योगपतियों व स्वदेशी उद्योगों को संरचनात्मक आधार मिला।

8. आर्थिक निकास ̵

• भारतीय उत्पाद का वह हिस्सा जो जनता के उपभोग के लिए उपलब्ध नहीं था तथा राजनीतिक कारणों से जिसका प्रवाह इंग्लैण्ड की ओर हो रहा था जिसके बदले में भारत को कुछ नहीं प्राप्त हो रहा था। इसे आर्थिक निकास की संज्ञा दी गई। दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक ‘पॅावर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में सर्वप्रथम आर्थिक निकास की अवधारणा प्रस्तुत की। भारतीय धन के इंग्लैण्ड में निकासी के कारण भारत में पूँजी का निर्माण एवं संरक्षण नहीं हो सका, जबकि इंग्लैण्ड की समृद्धि बढ़ती गई। इस धन के निकास से भारत में रोजगार तथा आय की संभावनाओं पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। रमेशचन्द्र दत्त ने अपनी पुस्तक ‘इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में धन निकास का उल्लेख किया है।

9. दरिद्रता और अकाल ̵

• देश में पहला अकाल 1860-61 ई. में पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में पड़ा जिसमें दो लाख लोगों की मृत्यु हुई। 1865-66 ई. में उड़ीसा, बंगाल, बिहार और मद्रास में अकाल के कारण 20 लाख लोगों की जान गई। केवल उड़ीसा में 10 लाख लोग मारे गए। इस समय का सबसे भयंकर अकाल 1876-78 ई. में मद्रास, मैसूर, हैदराबाद, महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में पड़ा। पशुओं एवं अन्य संसाधनों के अभाव में कई बार किसान खेती भी नहीं कर पाते थे। वर्ष 1850 से 1900 के बीच तकरीबन 2 करोड़ 80 लाख लोग केवल सूखे के कारण काल के ग्रास में समा गए।

ब्रिटिश काल में गठित आयोग
आयोगअध्यक्षस्थापना वर्षगवर्नर जनरलविषय वस्तु
इनाम आयोगइनाम1852 ई.लॉर्ड डलहौजीभू-स्वामियों की उपाधियों की जाँच हेतु।
हर्शल समितिहर्शल1893 ई.लॉर्ड लेंस डाउनटकसाल संबंधी सुझाव के लिए।
फ्रेजर आयोगएन्ड्रफ्रेजर1902 ई.लॉर्ड कर्जनपुलिस प्रशासन।
शाही आयोगलॉर्ड इसलिंग्टन1912 ई.लॉर्ड हॉर्डिंगलोक सेवा (नागरिक सेवा)।
शाही आयोगलॉर्ड ली1923 ई.लॉर्ड रीडिंगनागरिक सेवा।
स्कीन समिति(भारतीय सैन्डहर्स्ट समिति)सर एन्ड्रयू स्कीन1925 ई.लॉर्ड रीडिंगसेना का भारतीयकरण करने के बारे में।
रेल समितिसर विलियम एकवर्थ1924 ई.लॉर्ड रीडिंगभारतीय रेल।
बटलर समितिसर हरकोर्ट बटलर1927 ई.लॉर्ड इरविनदेशी राज्यों व ब्रिटिश परमसत्ता के बीच संबंधों को परिभाषित करने के लिए।
हिटले आयोगजे.एच.हिटले1929 ई.लॉर्ड इरविनश्रमिकों के बारे में।
लिण्डसे आयोगए.डी.लिण्डसे1929 ई.लॉर्ड इरविनमिशनरी शिक्षा के विकास के लिए
भारतीय परिसीमन (सीमा निर्देश) समितिसर लौरी हेमन्ड1935 ई.लॉर्ड वेलिंगटननिर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन।
विकेन्द्रीकरण पर शाही आयोग1908 ई.लॉर्ड मिन्टोस्थानीय स्वशासन तथा विकेन्द्रीकरण पर सिफारिश
लोक सेवा आयोगसर चार्ल्स एटचिन्सन1886 ई.लॉर्ड डफरिनसिविल सेवा परीक्षा प्रणाली के बारे में रिपोर्ट।
मुड्डिमैन कमेटी(रिफोम इन्क्वायरी कमेटी)एलेक्जेण्डर मुड्डिमैन1924 ई.लॉर्ड रीडिंग1919 के अधिनियम के द्वैधशासन की जाँच।
मुद्रा से संबंधित आयोग
आयोग/समिति का नामगठन का वर्षमुख्य सिफारिशें व उद्देश्यगवर्नर जनरल
मेंसीफील्ड आयोग1866 ई.मुद्रा समस्या पर विचारलॉर्ड लारेन्स
हर्शल समिति1893 ई.टकसाल संबंधी सुझावलॉर्ड लेंसडाउन
सर हेनरी फाउलर समिति1898 ई.सौवरिन व रुपया दोनों एक शिलिंग चार पेन्स प्रति रुपये की दर से असीमित कानूनी टेंडर बना दिया गए।लॉर्ड एल्ग्नि द्वितीय
सर हेनरी बेमिंगटन समिति1919-20 ई.इसकी सिफारिशों पर एक राजस्व आयोग (Fiscal Commission) गठित किया गया, जिसके अध्यक्ष एम. रहीममुल्ला थे।लॉर्ड चेम्सफोर्ड
हिल्डन यंग कमीशन1925 ई.मुद्रा व्यवस्था पर सिफारिशलॉर्ड रीडिंग
चेम्बरलेन आयोग (द रॉयल कमीशन ऑनइंडियन फाइनेंस एण्ड करेन्सी)1931 ई.मुद्रा प्रणाली पर सुझावलॉर्ड इरविन
        

• 1861 ई. में पेपर एक्ट लागू हुआ। 1862 ई. में भारत में स्वीकृत पत्र मुद्रा की शुरुआत हुई।

• 1900 ई. में गोल्ड स्टैंडर्ड रिज़र्व की स्थापना हुई।

बौद्धिक जागरण

सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन

1. ब्रह्म समाज

• 20 अगस्त, 1828 ई. को कलकत्ता में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापना।

• राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का पिता, अतीत व भविष्य के बीच का सेतु तथा भारत में पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है।

• राय को भारत में “पत्रकारिता का अग्रदूत/भाषायी प्रेस का  प्रर्वतक” माना जाता है।

• राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित संगठन –

            1. आत्मीय सभा – 1815 ई.

            (डच घड़ीसाज डेविड हेमर के सहयोग से)

            2. वेदान्त कॉलेज – 1825 ई.

            3. ब्रिटिश यूनिटेरियन एसोसिएशन

• राजा राममोहन राय की पुस्तकें –

            1. तुहफात-उल-मुवाहिद्दीन (फारसी, 1809 ई. में)

            (एकेश्वरवादियों को उपहार)

            2. प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस (1820 ई.)

            3. हिन्दू उत्तराधिकार के नियम

• राजा राममोहन राय के समाचार पत्र –

            1. मिरातुल अखबार (फारसी)

            2. संवाद कौमुदी (बांग्ला)

            3. प्रज्ञाचंद

• राजा राममोहन राय बचपन में सीरामपुर मिशनरियों के सम्पर्क में आए थे।

• मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की थी।

• 1829 ई. में सती प्रथा पर रोक लगवाई। (अधिनियम-17)

• 1833 ई. में ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में इनका निधन हो गया और ब्रिस्टल में इनका स्मारक बना हुआ है।

• राजा राममोहन राय ने अवतारवाद, जातिवाद, मूर्तिपूजा, बाल-विवाह, बहु-विवाह, सती-प्रथा, धार्मिक अन्धविश्वास आदि का विरोध किया था।

• आधुनिक शिक्षा, महिला शिक्षा, विधवा विवाह, प्रेस की स्वतंत्रता, पूँजीवाद, स्थायी बन्दोबस्त आदि के समर्थक थे।

• एकेश्वरवाद के पक्ष में तर्क दिए।

• बहुदेववाद व वर्ण व्यवस्था की आलोचना की।

• यूरोपीय मानववाद का समर्थन करते थे।

• ब्रह्म समाज की स्थापना में द्वारिकानाथ टैगोर प्रमुख सहयोगी थे। ब्रह्म समाज के प्रथम मंत्री ताराचन्द चक्रवर्ती (24 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजी, हिब्रू, ग्रीक, फ्रेंच, लेटिन आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।) थे। प्रसन्न कुमार टैगोर व चन्द्रशेखर देव उनके प्रमुख अनुयायी थे।

• 1823 ई. में स्पेनिश क्रांति की सफलता पर सार्वजनिक भोज दिया। आयरलैण्ड में जमींदारों के उत्पीड़क राज की आलोचना की।

• कम्पनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त करने, भारतीय वस्तुओं से भारी निर्यात शुल्क हटाने, उच्च सेवाओं के भारतीयकरण, कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण, न्यायिक समानता आदि की माँग की।

• 1843 ई. में देवेन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज का संचालन किया।

• 1839 ई. में तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना देवेन्द्रनाथ टैगोर ने की। उपनिषदीय ज्ञान की तरफ अधिक झुकाव था, कालान्तर में इसका ब्रह्म समाज में विलय कर दिया गया।

• देवेन्द्रनाथ टैगोर की पुस्तक ब्रह्म धर्म थी।

• तत्त्वबोधिनी पत्रिका के सम्पादक अक्षय कुमार दत्त थे।

• केशवचन्द्र सेन को ब्रह्म समाज का आचार्य नियुक्त किया। वाक्‌पटु केशवचन्द्र सेन ने इस आंदोलन को लोकप्रिय बना दिया परन्तु उनकी अतिशय उदारता ने ब्रह्म समाज को हिन्दू धर्म सुधार आंदोलन से इतर नवीन धर्म सुधार आंदोलन बना दिया। अत: 1865 ई. में केशवचन्द्र सेन को निकाल दिया गया।

• केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्म समाज का गठन किया तथा टैगोर का ब्रह्म समाज आदि ब्रह्म समाज’ कहलाया।

• केशवचन्द्र सेन ने मैत्री संघ’ (संगत सभा) की स्थापना की तथा इण्डियन मिरर’ (समाचारपत्र) का प्रकाशन किया।

• 1872 ई. में केशवचन्द्र सेन के प्रयासों से नेटिव मैरिज एक्ट पारित हुआ जिसमें विवाह योग्य न्यूनतम आयु लड़का और लड़की की क्रमश: 18 व 14 वर्ष तय की गई।

• कालान्तर में सेन ने अपनी अल्पायु पुत्री का विवाह कूच विहार के राजा के साथ कर दिया था।

• सेन के अनुयायियों ने आनन्द मोहन बोस के नेतृत्व में साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना 1878 ई. में की थी।

• सुरेन्द्र नाथ बनर्जी व द्वारिकानाथ गांगुली भी इसके सदस्य थे।

• ब्रह्म समाज ने कर्म सिद्धान्त व पुनर्जन्म के विषय में निश्चित मत प्रकट नहीं किए थे।

वेद समाज

• केशवचन्द्र सेन के कहने पर श्री धरलू नायडू ने वेद समाज की स्थापना की थी।

• इसे दक्षिण भारत का ब्रह्म समाज कहते हैं।

• विश्वनाथ मुदालियर भी इसके प्रमुख नेता थे।

प्रार्थना समाज (1867 ई.)

• 1867 ई. को बॉम्बे में केशवचन्द्र सेन के प्रयासों से इसकी स्थापना हुई थी।

• संस्थापक – महादेव गोविन्द रानाडे, आत्माराम पाण्डुरंग, आर. जी. भण्डारकर, एन. जी. चन्द्रावरकर

• उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह तथा जातिवाद का समर्थन किया।

महादेव गोविन्द रानाडे

• इन्हें महाराष्ट्र का सुकरात’ कहते हैं।

• ये बॉम्बे हाइकोर्ट में जज थे।

• 1867 ई. में उन्होंने विधवा विवाह संघ की स्थापना की थी।

• 1870 ई. में पूना सार्वजनिक सभा तथा 1884 ई. में दक्कन एजुकेशनल सोसायटी की स्थापना की थी।

• महादेव गोविन्द रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक गुरु थे, जो महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु थे।

• 1887 ई. में इण्डियन नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी।

2. आर्य समाज (1875 ई.)

• आर्य समाज की स्थापना 1875 ई. को बॉम्बे में दयानन्द सरस्वती द्वारा की गई।

• दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 ई. में गुजरात के मौरवी जिले में हुआ। इनका वास्तविक नाम मूलशंकर था।

• मूलशंकर के प्रथम गुरु पूर्णानन्द थे, जिन्होंने इनको दयानन्द सरस्वती नाम दिया। जबकि इनके द्वितीय गुरु विरजानन्द जी थे, जिन्होंने इनको वेदों का ज्ञान दिया।

• ये ऋग्वेद को प्रामाणिक ग्रन्थ मानते थे।

• वेदों की ओर लौटो का नारा दिया था।

• दयानन्द सरस्वती प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने ‘स्वदेशी’ का नारा दिया।

• दयानन्द सरस्वती ने शुद्धि आंदोलन चलाया, जिसके तहत् धर्मान्तरित मुसलमानों को पुन: हिन्दू बनाया गया। इससे साम्प्रदायिकता को बल मिला।

• 1877 ई. में लाहौर में तथा 1878 ई. में दिल्ली में आर्य समाज की स्थापना की गई।

• दयानन्द सरस्वती की पुस्तकें –

            1.    सत्यार्थ प्रकाश (1874 ई.) – इस पुस्तक का लेखन हिन्दी में हुआ,  इसकी रचना उदयपुर में तथा प्रकाशन अजमेर में हुआ।

            2.    अद्वैतमत का खण्डन (1877 ई.)

            3.    वेदभाष्य भूमिका (1876 ई.)

            4.    ऋग्वेद भाष्य (1877 ई.)

            5.    पंच मद्य यज्ञ विधि (1875 ई.)

            6.    वल्लभाचार्य मत खण्डन (1875 ई.)

• जोधपुर में नन्ही जान नामक महिला द्वारा दयानन्द सरस्वती को जहर दे दिया गया, इस कारण 1883 ई. में अजमेर में इनकी मृत्यु हो गई।

• वेलेन्टाइन शिरोल ने ‘आर्य समाज’ को भारतीय अशान्ति का जनक कहा था।

• दयानन्द सरस्वती की मृत्यु के बाद आर्य समाज दो भागों में विभक्त हो गया।

            1.    लाला लाजपतराय व हंसराज अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे। अत: दयानन्द एंग्लो वैदिक स्कूल व कॉलेज खोले गए।

            2.    स्वामी श्रद्धानन्द, लेखराम व मुंशीराम संस्कृत शिक्षा के समर्थक थे तथा उन्होंने वर्ष 1902 में हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की।

• आर्य समाज मूर्तिपूजा, अवतारवाद, तीर्थयात्रा, पशुबलि, सामाजिक असमानता, जातिवाद, अस्पृश्यता, सतीप्रथा, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा आदि का विरोध करता है, जबकि यज्ञानुष्ठान, पुनर्विवाह, महिला व दलितों का उपनयन संस्कार आदि का समर्थन करता है।

3. रामकृष्ण मिशन

• रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 ई. में कलकत्ता के समीप वैल्लुर में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानन्द द्वारा की गई थी।

• स्वामी विवेकानन्द का बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था।

• ‘विवेकानन्द’ नाम खेतड़ी महाराजा अजीतसिंह ने दिया तथा वित्तीय सहायता देकर शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन (1893 ई.) में भेजा था।

• उन्होंने 1894 ई. में न्यूयॉर्क में ‘वेदान्त सोसायटी’ की स्थापना की थी।

• स्वामी विवेकानन्द की पत्रिकाएँ –

            1. प्रबुद्ध भारत (अंग्रेजी)

            2. उद्‌बोधन (बांग्ला)

• आयरलैण्ड की मार्गरेट एलिजाबेथ इनकी प्रमुख शिष्या थी, जिन्हें ‘भगिनी निवेदिता’ के नाम से भी जाना जाता है।

• सुभाषचन्द्र बोस ने विवेकानंद को आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता कहा है।

• रामकृष्ण मिशन की शिक्षाओं, उपनिषदों एवं गीता के दर्शन, बुद्ध एवं यीशु के उपदेशों को आधार बनाकर विवेकानन्द ने विश्व को मानव मूल्यों की शिक्षा दी।

4. थियोसोफिकल सोसायटी (BHU)

• इसकी स्थापना 1875 ई. को न्यूयॉर्क में मैडम ब्लावत्सकी व कर्नल अल्कॉट ने की थी।

• 1882 ई. में भारत में मद्रास के समीप अड्यार में इसका मुख्यालय स्थापित किया गया।

• एनी बेसेन्ट इसकी सदस्य के रूप में 1893 ई. में भारत आई तथा वर्ष 1907 में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्ष बनी थी।

• 1898 ई. में बनारस में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की, जो वर्ष 1916 में मदन मोहन मालवीय जी के प्रयासों से बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में तब्दील हो गया।

• एनी बेसेन्ट आयरिश महिला थीं परन्तु उनका मानना था कि उनका पिछला जन्म भारत में हुआ था इसलिए भारतीय वेशभूषा व खान-पान का अनुसरण किया करती थीं।

• एनी बेसेन्ट ने अपने दत्तक पुत्र जनाकृष्ण मूर्ति को ‘कृष्ण का अवतार’ घोषित कर दिया था।

• एनी बेसेन्ट के समाचार पत्र

            1. कॉमन वील

            2. न्यू इण्डिया

• वह अखिल भारतीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई।

• थियोसोफिकल सोसायटी हिन्दू, पारसी, बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों में विश्वास करती थीं तथा उपनिषदीय ज्ञान, आत्मा की अमरता व पुनर्जन्म में विश्वास करती थी।

5. यंग बंगाल आंदोलन

• यंग बंगाल आंदोलन के प्रवर्तक हेनरी विवियन डेरोजिओ थे।

• हेनरी विवियन डेरोजिओ की संस्थाएँ–

            1. एकेडेमिक एसोसिएशन

            2. सोसायटी फॉर द एक्वीजिशन ऑफ जनरल नॉलेज

            3. एंग्लो-इण्डियन हिन्दू एसोसिएशन

            4. बंगहित सभा

            5. डिबेटिंग क्लब

• हेनरी विवियन डेरोजिओ के समाचार पत्र ̵

            1. ईस्ट इण्डिया

            2. इण्डिया गजट

            3. कलकत्ता साहित्य गजट

• डेरोजिओ को आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रवादी कवि कहा जाता है।

• ये फ्रांसीसी क्रान्ति से प्रभावित थे तथा स्वतंत्र चिन्तन व वैज्ञानिक तर्कशक्ति को बल देते थे।

• परम्पराओं पर आधारित अन्धविश्वासों, आडम्बरों का विरोध करते थे, जबकि नारी शिक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता, कम्पनी चार्टर में संशोधन, उच्चतर सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति का समर्थन करते थे।

• अत्याचारी जमींदारों से रैय्यत की सुरक्षा, ज्युरी द्वारा मुकदमों की सुनवाई, विदेशी ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीय मजदूरों के साथ बेहतर व्यवहार के लिए आंदोलन चलाए।

• उन्होंने राजा राममोहन राय की परम्परा को आगे बढ़ाया।

• 1831 ई. में मात्र 22 वर्ष की आयु में डेरोजिओ की हैजे से मृत्यु हो गई थी।

• सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने डेरोजिओ के अनुयायियों को बंगाल में ‘आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत’ एवं ‘हमारी जाति के पिता’ कहा है।

6. अलीगढ़ आंदोलन

• अलीगढ़ आंदोलन के प्रवर्तक सर सैय्यद अहमद खाँ थे।

• ये 1857 ई. के विद्रोह के समय कम्पनी की न्यायिक सेवा में थे।

• इन्होंने 1857 ई. के बाद अंग्रेजों के मन में मुसलमानों के प्रति उत्पन्न अविश्वास को कम करने का प्रयास किया था।

• ये मुस्लिम समाज के आधुनिकीकरण पर बल देते थे और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा को अनिवार्य मानते थे।

• उन्होंने कुरान की वैज्ञानिक दृष्टि से व्याख्या की तथा बाइबिल पर टीका लिखी थी।

• पीर- मुरीदी प्रथा को समाप्त करने का प्रयत्न किया था।

• सर सैय्यद अहमद खाँ की संस्थाएँ –

            1. मुहम्मडन लिटरेरी सोसायटी (कलकत्ता) (1863 ई.)

            2. साइन्टिफिक सोसायटी (1864 ई.)

            3. मुस्लिम ऐंग्लो ओरिएण्टल स्कूल (1875 ई.)

            (वर्ष 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में तब्दील हो गया।)

            4. यूनाइटेड इण्डियन पैट्रियाटिक एसोसिएशन (1888 ई.)

            (बनारस के राजा शिवप्रसाद के साथ मिलकर बनाया, यह कांग्रेस की विरोधी संस्था थी।)

• सर सैय्यद अहमद खाँ की पत्रिकाएँ –

            1. तहजीब उल अखलाक (सभ्यता और नैतिकता)

            2. राजभक्त मुसलमान

• सैय्यद अहमद खान प्रारम्भ में हिन्दू-मुस्लिम एकता के कट्‌टर समर्थक थे (हिन्दू व मुस्लिम एक सुन्दर वधू (भारत) की दो आँखें हैं) लेकिन कालान्तर में मुस्लिम हितों के अधिक पक्षपाती हो गए।(हिन्दू व मुस्लिम न केवल दो राष्ट्र हैं अपितु विरोधी राष्ट्र हैं।)

• अलीगढ़ कॉलेज के पहले तीन प्रिंसीपल थियोडोर बैक, मॉरिसन व आर्चबोल्ड तीनों ने अलीगढ़ आंदोलन को अंग्रेजों के पक्ष में तथा हिन्दू विरोध का रूप दिया था।

• चिराग अली, अल्ताफ हुसैन हाली (उर्दू शायर) व नज़ीर अहमद भी अलीगढ़ आंदोलन से जुड़े हुए थे।

7. देवबन्द आंदोलन (1867 ई.)

• 1867 ई. में देवबन्द, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में इसकी स्थापना की गई थी।

• संस्थापक –

            1. रशीद अहमद गंगोही

            2. मुहम्मद कासिम ननौतवी

• 1857 ई. की क्रान्ति के विद्रोही सैनिक इसमें शामिल हुए थे।

• इसे दारउलउलूम आंदोलन भी कहा जाता है।

• इसका प्रमुख उद्देश्य धार्मिक शिक्षक तैयार करना, विद्यालयों से अंग्रेजी शिक्षा पर प्रतिबंध, अंग्रेजी सरकार के साथ असहयोग, इस्लाम का नैतिक व धार्मिक पुनरुद्धार कर मूल स्वरूप में स्थापित करना था।

• महमूद उल हसन ने इस आंदोलन को राजनीतिक स्वरूप दिया था।

• शिबली नुमानी पहले अलीगढ़ आंदोलन से जुड़े हुए थे परन्तु सैय्यद अहमद खाँ का पाश्चात्य संस्कृति से अधिक झुकाव देखकर देवबन्द आंदोलन में शामिल हो गए थे।

• यह आंदोलन अलीगढ़ आंदोलन का विरोधी व कांग्रेस का समर्थक था।

8. वहाबी आंदोलन / वली उल्लाह आंदोलन

• यह आंदोलन ईरान में अब्दुल वहाब ने शुरू किया था।

• इसे सैय्यद अहमद बरेलवी ने भारत में लोकप्रिय किया था। इसका मुख्यालय पटना में था।

• यह एक हिंसक आंदोलन था तथा दार उल हर्ब’ को दार उल इस्लाम में बदलने का नारा दिया था।

• प्रारम्भ में यह पंजाब के सिखों के विरुद्ध था, बाद में अंग्रेजों के विरुद्ध हो गया।

• पूर्वी भारत में इसके नेता करामात अली व हाजी शरीयत उल्ला थे।

• 1870 ई. के बाद इस आंदोलन का दमन कर दिया गया।

9. अहमदिया आंदोलन (1889 ई.)

• 1889 ई. को गुरुदासपुर (पंजाब) के कादिया नामक स्थान पर मिर्जा गुलाम अहमद द्वारा इसकी शुरुआत की गई थी।

• मिर्जा गुलाम अहमद ने स्वयं को मुहम्मद साहब एवं कृष्ण का अवतार घोषित कर दिया।

• इनकी पुस्तक बहरीनअहमदिया थी।

10.    रहनुमामाज्दा-सभा

• ये पारसी धर्म सुधार आंदोलन से संबंधित है।

• इसकी स्थापना 1851 ई. में की गई थी।

• संस्थापक –

            1. नौरोजी फरदोन जी

            2. दादा भाई नौरोजी

            3. एस. एस. बंगाली

• उन्होंने महिला सशक्तीकरण के प्रयास किए थे।

11.    परमहंस मण्डली

• इसकी स्थापना 1849 ई. में गोपाल हरि देशमुख ने की थी।

• ये लोकहितवादी नामक मराठी पत्रिका निकालते थे अत: इनका उपनाम लोकहितवादी पड़ गया।

12.    सत्य शोधक समाज

• इसकी स्थापना निम्न जातियों के कल्याण के लिए 1873 ई. में ज्योतिराव गोविंदराव फुले (ज्योतिबा फुले) ने की थी।

• इनकी पुस्तक गुलाम गिरी, शिवाजी की जीवनी, सार्वजनिक सत्य धर्म थी।

• उन्होंने दलित जाति के लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल खोले थे।

13.    शारदा सदन

• संस्थापिका – पण्डिता रमाबाई

14.    आत्मसम्मान आंदोलन

• वर्ष 1920 के दशक में वी. रामास्वामी नायंकर उर्फ पेरियार ने इस आंदोलन को प्रारंभ किया।

• आत्मसम्मान आंदोलन में ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी गई तथा लोगों से ब्राह्मणवाद का विरोध करने के लिए आगे आने को कहा गया।

• ब्राह्मणों की सहायता के बिना विवाह, मंदिरों में जबरन प्रवेश तथा मनुस्मृति को जलाने आदि के लिए आंदोलन किए गए।

• पेरियार द्वारा तमिल भाषा में रामायण की रचना की गई जिसे ‘सच्ची रामायण’ कहा गया।

15.    सिख धर्म सुधार आंदोलन

• पश्चिमी तर्कसंगत विचारों का प्रभाव सिख अनुयायियों पर भी पड़ा।

• इससे पूर्व में सिख धर्म में सुधार हेतु बाबा दयाल दास द्वारा निरंकारी आंदोलन चलाया गया।

• बाबा राम सिंह द्वारा नामधारी आंदोलन चलाया गया।

• 1870 ई. में अमृतसर में सिंह सभा आंदोलन प्रारंभ हुआ।

• सिंह सभा द्वारा अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना में सहायता की गई और बहुत से गुरुद्वारे व विद्यालय स्थापित किए गए।

• गुरुमुखी और पंजाबी साहित्य को विशेष प्रोत्साहन दिया गया लेकिन इस दिशा में वास्तविक और अधिक प्रतिक्रियावादी गतिविधियाँ वर्ष 1920 में अकाली आंदोलन के साथ प्रारंभ हुई।

• अकालियों का मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों का प्रबंधन सुधारना था।

• अकालियों के नेतृत्व में वर्ष 1921 में सिख जनता ने इसका विरोध किया और महंतों के विरुद्ध अहिंसात्मक असहयोग सत्याग्रह आंदोलन प्रारंभ किया।

• बाध्य होकर सरकार को वर्ष 1922 में सिख गुरुद्वारा अधिनियम पास करना पड़ा।

16.    वायकोम सत्याग्रह

• वायकोम सत्याग्रह एक प्रकार का गाँधीवादी आंदोलन था।

• यह आंदोलन ब्राह्मणवाद के विरुद्ध तथा मंदिर प्रवेश को लेकर चलाया गया था।

• यह एझवा वर्ग के उत्थान की बात करता था।

• 19वीं सदी के अंत तक केरल में नारायण गुरु, एन. कुमारन, टी. के. माधवन जैसे बुद्धिजीवियों ने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई।

• श्री नारायण धर्म परिपालन योगम संगठन ने श्री नारायण गुरु के नेतृत्व में मंदिर में निम्न वर्ग के प्रवेश का समर्थन किया। निम्न वर्ग के मंदिर प्रवेश को लेकर सवर्णों के संगठन नायर सर्विस सोसायटी, नायर समाज व केरल हिन्दू सभा ने आंदोलन का समर्थन किया।

• नंबूदरियों (उच्च ब्राह्मण) के संगठन ‘योगक्षेम सभा’ ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया।

• मार्च, 1925 में गाँधीजी की मध्यस्थता में त्रावणकोर की महारानी से मंदिर में प्रवेश के बारे में आंदोलनकारियों से समझौता हुआ।

विधवा पुनर्विवाह

• ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड कैनिंग के समय पारित हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 की धारा-15 के तहत् विधवा विवाह को कानूनी मान्यता मिली थी।

• 7 दिसम्बर, 1856 को कलकत्ता में पहला कानूनी हिन्दू पुनर्विवाह सम्पन्न हुआ था।

• डी. के. कर्वे ने 1899 ई. में पूना में विधवा आश्रम की स्थापना की थी। कर्वे विधवा पुनर्विवाह संघ के सचिव थे।

• 1850 ई. में विष्णु शास्त्री पंडित ने ‘विधवा विवाह समाज’ की स्थापना की।

• 1852 ई. में करसोनदास मलजी ने विधवा विवाह के समर्थन के लिए गुजराती भाषा में ‘सत्यप्रकाश’ नाम से एक पत्रिका निकाली।

• वीरशैलिंगम ने 1878 ई. में ‘राजा मुन्द्री सोशल रिफॉर्म’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य भी विधवा विवाह को बढ़ावा देना था।

महिला शिक्षा

• ईसाई मिशनरीज ने 1819 ई. में कलकत्ता में तरुण स्त्री सभा की स्थापना की थी।

• जे. डी. बेटन ने 1849 ई. में कलकत्ता में बालिका विद्यालय की स्थापना की।

• ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी 35 से अधिक बालिका विद्यालयों की स्थापना से जुड़े थे।

• वर्ष 1906 में डी. के. कर्वे ने बम्बई में भारतीय महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की।

बाल विवाह

• 1872 ई. में केशवचन्द्र सेन के प्रयासों से सिविल मैरिज एक्ट पारित किया गया, जिसके तहत् लड़के एवं लड़की के विवाह की आयु क्रमश: 18 एवं 14 वर्ष तय की गई। इस अधिनियम द्वारा बहुपत्नी प्रथा को समाप्त किया गया।

• बहराम जी मालाबारी व एस. एस. बंगाली के प्रयासों से 1891 ई. में एज ऑफ कंसेट एक्ट (सम्मति आयु अधिनियम) पारित किया गया जिसके तहत् लड़की के लिए विवाह योग्य आयु 12 वर्ष तय की गई।

• वर्ष 1930 में हरविलास शारदा के प्रयासों से शारदा एक्ट लागू किया गया, जिसके तहत् लड़के एवं लड़की के विवाह की आयु क्रमश: 18 एवं 14 वर्ष तय की गई।

सती प्रथा

• लॉर्ड विलियम बैंटिक के समय में 1829 ई. में सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया।

• प्रारंभ में इसे बंगाल में लागू किया गया। इस अधिनियम को पारित कराने में राजा राममोहन राय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

ठगी प्रथा

• लॉर्ड विलियम बेंटिक ने ठगी प्रथा का उन्मूलन किया। इसके लिए उन्होंने एक अधिकारी ‘कर्नल स्लीमैन’ की नियुक्ति की।

• 1837 ई. तक ठगों का दमन कर दिया गया।

शिशु वध

• शिशु वध सामान्यत: राजपूतों में प्रचलित था, जो कन्याओं के जन्म लेते ही उन्हें मार देते थे।

• गवर्नर जनरल जॉनशोर के समय में 1795 ई. में तथा वेलेजली के समय 1804 के नियम 3 से शिशु वध को साधारण हत्या के रूप में माना जाने लगा। इस प्रकार शिशु वध धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

नरबलि प्रथा

• इस प्रथा को समाप्त करने का श्रेय हॉर्डिंग प्रथम को जाता है, इसके लिए उसने कैंपबेल की नियुक्ति की।

• 1844-45 ई. तक यह प्रथा समाप्त हो गई।

• नरबलि प्रथा मुख्यत: खोंड जनजाति में प्रचलित थी।

दास प्रथा

• गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो ने 1843 ई. में भारत में दास प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया।

• वर्ष 1833 के अधिनियम में निर्देश था कि दास प्रथा को समाप्त कर दिया जाएगा।

प्रमुख सामाजिक व धार्मिक संगठन

संगठनस्थापनावर्षस्थानसंस्थापक
इंडियन रिफॉर्मएसोसिएशन1870 ई.कलकत्ताकेशवचन्द्र सेन
इंडियन नेशनलसोशल काँफ्रेंस1887 ई.महाराष्ट्रमहादेव गोविन्द रानाडे
पूना सेवा सदन1908 ई.बेहीरमजी मालाबारी,दयाराम गिडुमल
आर्य समाज1875 ई.बम्बईस्वामी दयानन्दसरस्वती
ब्रह्म समाज1828 ई.बंगालराजा राममोहन राय
आदि ब्रह्मसमाज1866 ई.कलकत्तादेवेन्द्रनाथ टैगोर
ब्रह्म समाजऑफ इंडिया1866 ई.कलकत्ताकेशवचन्द्र सेन
आत्मीय सभा1815 ई.बंगालराजा राममोहन राय
साधारण ब्रह्मसमाज1878 ई.कलकत्ताशिवनाथ शास्त्री,आनन्द मोहन बोस
परमहंस सभा(मंडली)1849 ई.महाराष्ट्रदादोबा पांडुरंग,जाम्बेकर शास्त्री
प्रार्थना समाज1867 ई.महाराष्ट्रआत्माराम पांडुरंग,मेहताजी दुर्गाराम
वेदान्त सोसायटी1896 ई.न्यूयॉर्कस्वामी विवेकानन्द
रामकृष्ण मिशन1897 ई.कलकत्तास्वामी विवेकानन्द
तत्त्व बोधिनीसभा1839 ई.बंगालदेवेन्द्रनाथ टैगोर
थियोसोफिकलसोसायटी1875 ई.न्यूयॉर्ककर्नल आल्काट, मेडमब्लावत्सकी
शारदा सदन1889 ई.महाराष्ट्ररमाबाई
यूनिटेरियनमिशन1821 ई.बंगालराजा राम मोहन राय
डेक्कनएजुकेशनसोसायटी1884 ई.पूनारानाडे, आगरकर
राजमुन्द्री सोशलरिफॉर्मएसोसिएशन1878 ई.आन्ध्र प्रदेशवीरसालिंगम पाँतलु
सत्यशोधकसमाज1873 ई.महाराष्ट्रज्योतिबा फुले
स्टूडेण्ट लिटेरीएंडसाइन्टिफिक सोसायटी1848 ई.महाराष्ट्र
वेद समाज1864 ई.मद्रासके.श्री धरलू नायडू
अहरार आन्दोलन1910 ई.अली बन्धु, हकीमअजमल खाँ
मद्रास हिन्दूसमिति1904 ई.मद्रासएनी बेसेन्ट
एकेडमिकएसोसिएशन1831 ई.बंगालहेनरी विवियन डेरोजियो
अहमदिया आन्दोलन1889 ई.कादियान(पंजाब)गुलाम अहमद
सर्वेण्ट्स ऑफइंडिया सोसायटी1905 ई.महाराष्ट्रगोपाल कृष्ण गोखले
सोशल सर्विसलीग1911 ई.बम्बईएम.एम.जोशी
संगत सभा1860 ई.बंगालदेवेन्द्रनाथ टैगोर
साइंटिफिकसोसायटी1864 ई.अलीगढ़सैयद अहमद खाँ
युनिवर्सलरिलिजियससोसायटीगुजरातमेहताजी दुर्गाराम
अलीगढ़ एंग्लो-ओरिएंटलकॉलेज (AMU)1875 ई.अलीगढ़सर सैय्यद अहमद खाँ
विधवा विवाहसंघ1861 ई.महाराष्ट्ररानाडे
विधवा आश्रमसंघ1867 ई.पूनारानाडे, कर्वे
मुहम्मडन लिटेरीसोसायटी1863 ई.कलकत्ताअब्दुल लतीफ
यंग बंगालआन्दोलन1831 ई.बंगालहेनरी विवियनडेरोजियो
विडो रीमैरिजएसोसिएशन(विधवापुनर्विवाहसमाज)1850 ई.महाराष्ट्रविष्णु शास्त्री पंडित
धर्म सभा1830 ई.बंगालराधाकान्त देव
भारत धर्ममहामण्डल1887 ई.हरिद्वारपं. दीनदयाल शर्मा
देवबन्दआन्दोलन1867ई.देवबन्द सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)मुहम्मद कासिमननौत्वी, रसीद अहमद गंगोही
मद्रास हिन्दूसामाजिकसुधार समिति1892 ई.मद्रासवीरेसलिंगम पांतलु
रहनुमाईमजदयासन्सभा1851 ई.बम्बईनौरोजी फरदोनजी,दादा भाई नौरोजी,एस.एस.बंगाली
सत्य महिमा धर्म1860 ई.मुकुन्द दास
राधा स्वामीसम्प्रदाय1861 ई.आगराशिवदयाल खत्री(तुलसी राम)
स्वामी नारायण सम्प्रदायगुजरातस्वामी सहजानन्द
देव समाज1887 ई.लाहौरशिव नारायणअग्निहोत्री
सेवा समिति1914 ई.इलाहाबादहृदयनाथ कुंजरू
भील सेवामण्डल1922 ई.अमृतलाल विट्टलदासठक्कर
मानव धर्म सभा1844 ई.पश्चिमीभारतमंचाराम
नामधारीआन्दोलन1875 ई.पंजाबरामसिंह
पूना सार्वजनिकसभा1867 ई.पूनारानाडे
दीनबन्धुसार्वजनिक सभा1884 ई.महाराष्ट्रज्योतिबा फुले

समाज सुधार कानून

कानूनवर्षगवर्नर जनरल/ वायसराय
1.सम्मति आयु अधिनियम1891 ई.लॉर्ड लेंसडाउन
2.हिन्दू विधवा पुनर्विवाहअधिनियम1856 ई.लॉर्ड कैनिंग
3.सती प्रथा निषेध कानून1829 ई.विलियम बैंटिक
4.शारदा कानून1930 ई.लॉर्ड इरविन
5.बाल हत्या निरोधककानून-41802 ई.लॉर्ड वैलेजली
6.कन्या वध निषेध कानून1795 ई.सर जॉन शोर
7.धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम-211850 ई.लॉर्ड डलहौजी

अधिनियम से संबंधित महत्त्वपूर्ण धाराएँ

1.एज ऑफ कन्सेंट एक्ट1891ई./ आयु- 12 वर्ष से कम नहीं (कन्या)
2.नेटिव मैरिज एक्ट1872 ई./ लड़का- 18 वर्ष, लड़की – 14 वर्ष
3.विधवा पुनर्विवाहधारा – 15
4.सती प्रथानियम – 17
5.शिशु वधएक्ट IV
6.दास प्रथानियम – 5

शिक्षा से संबंधित आयोग

आयोग/समिति का नामगठन का वर्षगवर्नर जनरल
सार्जेन्ट योजना1944 ई.लॉर्ड वेवेल
रैले आयोग1902 ई.लॉर्ड कर्जन
मैकाले स्मरण पत्र1835 ई.लॉर्ड विलियम बैंटिक
वर्धा योजना1937 ई.लॉर्ड लिनलिथगो
जेम्स टॉमसन प्लान1843 ई.लॉर्ड एलनबरो
राधाकृष्णन आयोग1948 ई.सी. राजगोपालाचारी
हार्टोंग समिति1929 ई.लॉर्ड इरविन
हन्टर आयोग1882 ई.लॉर्ड रिपन
वुड डिस्पैच1854 ई.लॉर्ड डलहौजी
सैडलर आयोग1917 ई.लॉर्ड चेम्सफोर्ड

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

कांग्रेस की स्थापना से पूर्व स्थापित राजनीतिक संगठन

1. बंगाल जमींदार सभा

• 1838 ई. में स्थापित

• द्वारिकानाथ टैगोर, राधाकान्त देव इसके संस्थापक सदस्य थे।

• यह आधुनिक भारत की पहली सार्वजनिक एवं राजनीतिक संस्था थी।

• यह इंग्लैण्ड में एडम्स द्वारा स्थापित ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी की सहयोगी संस्था थी।

2. बंगाल ब्रिटिश एसोसिएशन

• 1843 ई. द्वारिकानाथ टैगोर द्वारा स्थापित की गई थी।

• जॉर्ज थॉमसन ने इसकी अध्यक्षता की थी।

3 ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन

• बंगाल जमींदार सभा तथा बंगाल ब्रिटिश एसोसिएशन का विलय कर 1851 ई. में इसकी स्थापना की गई।

• संस्थापक

            1. राधाकान्त देव – अध्यक्ष

            2. देवेन्द्रनाथ टैगोर – महासचिव

            3. राजेन्द्रलाल मित्र

            4. हरिश्चन्द्र मुखर्जी

4. ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन

• 1866 ई. लंदन में दादाभाई नौरोजी द्वारा स्थापित की गई थी।

5. पूना सार्वजनिक सभा

• 2 अप्रैल, 1870 में जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे द्वारा स्थापित की गई थी।

6   इण्डिया लीग

• 1875 ई. में शिविर कुमार घोष द्वारा स्थापना की गई थी।

7. इण्डिया एसोसिएशन

• 1876 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा आनंद मोहन बोस द्वारा इसकी स्थापना की गई थी।

• यह सर्वसाधारण की संस्था थी तथा इसका वार्षिक चन्दा 5 रुपये था।

• इसने सिविल सेवा आंदोलन चलाया। जिसके तहत् आयु सीमा बढ़ाने तथा परीक्षा भारत में आयोजित करवाने की माँग की गई थी।

• कालान्तर में 1883 ई. में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी। इसकी स्थापना इल्बर्ट बिल आंदोलन के परिणामस्वरूप हुई थी।

8. मद्रास नेटिव एसोसिएशन

• इसकी स्थापना 1852 ई. में की गई थी।

• इस संस्था ने 1857 के विद्रोह की आलोचना की, अत: इसे जनसमर्थन प्राप्त नहीं हुआ जिससे इसका अस्तित्व समाप्त हो गया।

9. मद्रास महाजन सभा

• इसकी स्थापना 1884 ई. में की गई थी।

• संस्थापक – एम.वी. राघवाचारी, जी. सुब्रह्मण्यम अय्यर, आनन्द चारलू

10.    बॉम्बे एसोसिएशन

• 1852 ई. में स्थापित

11.    बॉम्बे प्रेसीडेन्सी एसोसिएशन

• 1885 ई. में इसकी स्थापना की गई थी।

• संस्थापक – फिरोजशाह मेहता, के.टी. तेलंग, बदरुद्दीन तैय्यबजी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

• सितम्बर, 1884 के थियोसोफिकल सोसायटी के अड्यार सम्मेलन में एक देशव्यापी संगठन की बात की गई थी। इसके तहत् इण्डियन नेशनल यूनियन नामक संगठन अस्तित्व में आया।

• दादाभाई नौरोजी के कहने पर इसका नाम इण्डियन नेशनल कांग्रेस रखा गया।

• ‘कांग्रेस’ शब्द उत्तरी अमेरिका से लिया गया था।

– कांग्रेस की स्थापना – दिसम्बर, 1885 को सेवानिवृत्त अंग्रेज अधिकारी .ह्यूम ने की थी।

• विलियम वेडरबर्न ने ए.ओ.ह्यूम की जीवनी लिखी। ह्यूम एक पक्षी विशेषज्ञ थे तथा उन्होंने जनता के मित्र नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ करवाया।

• इसका पहला अधिवेशन पूना में होना था परन्तु वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण बॉम्बे में हुआ।

कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन

• 28 दिसंबर, 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने की थी।

• प्रथम अधिवेशन में 72 सदस्यों ने भाग लिया था।

• निम्नलिखित 9 प्रस्ताव पारित किए गए –

1.    भारतीय शासन विधान की जाँच के लिए रॉयल कमीशन का गठन किया जाए।

2.    भारत परिषद् को समाप्त किया जाए।

3.    प्रान्तीय व केन्द्रीय व्यवस्थापिका का विस्तार व जन-प्रतिनिधियों की संख्या में बढ़़ोतरी की जाए।

4.    ICS परीक्षा का आयोजन भारत व इंग्लैंड दोनों जगह किया जाए तथा आयु सीमा 19 वर्ष से 23 वर्ष की जाए।  

5.    सैन्य व्यय में कटौती की जाए।

6.    इंग्लैंड से आयातित कपड़ों पर पुन: आयात कर लगाया जाए।

7.    बर्मा को भारत से अलग किया जाए।

8.    समस्त प्रस्तावों को सभी प्रदेशों की सभी राजनीतिक संस्थाओं को भेजा जाए, जिससे वे इनके क्रियान्वयन की माँग कर सके।

9.    कांग्रेस का अगला अधिवेशन कलकत्ता में बुलाया जाए।

• इन प्रस्तावों में से एक भी प्रस्ताव किसानों व मजदूरों से संबंधित नहीं था।

• कांग्रेस की स्थापना के समय गवर्नर जनरल लॉर्ड डफरिन तथा भारत सचिव लॉर्ड क्रॉस थे।

सेफ्टी वाल्व सिद्धांत –

• लाला लाजपत राय ने अपने समाचार पत्र यंग इण्डिया में कांग्रेस की स्थापना में सुरक्षा कपाट की परिकल्पना दी तथा कांग्रेस को डफरिन के दिमाग की उपज बताया।

• रजनी पाम दत्त (इण्डिया टुडे) ने तो सुरक्षा वॉल्व के मिथक को वामपंथी विचारधारा के कच्चे माल के रूप में ही स्थापित कर दिया था।

• इसी परम्परा के अन्य लेखकों के अनुसार भी उस समय भारतीय जनमानस में एक क्रांति दस्तक दे रही थी, जिसे विफल करने के लिए लॉर्ड डफरिन के इशारों पर अंग्रेज अधिकारी ए.ओ.ह्यूम द्वारा कांग्रेस की स्थापना की गई।  

कांग्रेस के बारे में मत

• बंकिम चंद्र चटर्जी – “कांग्रेस के लोग पदों के भूखे हैं।”

• सर सैय्यद अहमद खाँ – “कांग्रेस आंदोलन न तो लोगों द्वारा प्रेरित था और न ही उनके द्वारा सोचा या योजनाबद्ध किया गया था।”

• अश्विनी कुमार दत्त – “कांग्रेस सम्मेलन तीन दिन का तमाशा है।”

• डफरिन – “वह जनता के उस अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी संख्या सूक्ष्म है।”

• कर्ज़न – “कांग्रेस अपनी मौत की घड़ियाँ गिन रही है, भारत में रहते हुए मेरी एक सबसे बड़ी इच्छा है कि मैं उसे शांतिपूर्वक मरने में मदद कर सकूँ।”

• बाल गंगाधर तिलक – “यदि वर्ष में हम एक बार मेंढक की तरह टर्राए तो हमें कुछ नहीं मिलेगा।”

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्त्वपूर्ण वार्षिक अधिवेशन 
वर्षस्थलअध्यक्षप्रमुख घटनाएँ
1886कलकत्तादादाभाई नौरोजी· नेशनल एसोसिएशन कॉन्फ्रेंस का राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया।· वायसराय लॉर्ड डफरिन ने सभी सदस्यों को ‘गार्डन पार्टी’ पर आमंत्रित किया।
1887मद्रासबदरूद्दीन तैय्यबजी· भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष।· इस सम्मेलन में कार्य संचालन भारत प्रतिनिधियों की एक समिति को सौंपा गया।
1888इलाहाबादजॉर्ज यूले(प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष)· जॉर्ज यूले प्रथम यूरोपीय निर्वाचित अध्यक्ष बने।· इलाहाबाद के गवर्नर ऑकलैंड कालविन के विरोध के बावजूद सम्मेलन संपन्न हुआ।· इस अधिवेशन में पहली बार लाला लाजपत राय ने हिंदी में भाषण दिया।
1889बंबईविलियम वेडरबर्न· इंग्लैंड में कांग्रेस के दृष्टिकोण का प्रचार करने के लिए एक प्रतिनिधि मंडल भेजने का फैसला किया गया।
1890कलकत्ताफिरोज़शाह मेहता· कलकत्ता विश्वविद्यालय की पहली महिला स्नातक कादंबिनी गांगुली ने कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित किया।
1896कलकत्तारहमतुल्ला एम. सयानी· पहली बार वन्देमातरम् गाया गया।
1905बनारसगोपाल कृष्ण गोखले· बंग-भंग की आलोचना।
1906कलकत्तादादाभाई नौरोजी· दादाभाई नौरोजी ने स्वराज (स्वशासन) शब्द का कांग्रेस के मंच से प्रथम बार प्रयोग किया।
1907सूरतरासबिहारी घोष· कांग्रेस का प्रथम विभाजन (नरम दल एवं गरम दल के बीच)
1911कलकत्ताप. विशन नारायणधर· पहली बार ‘जन गण मन गाया गया।
1915बंबईसत्येंद्र प्रसाद सिन्हा· लॉर्ड विलिंगटन ने भाग लिया (इस समय यह बंबई का गवर्नर था)
1916लखनऊअंबिकाचरण मजूमदार· नरम दल एवं गरम दल का समझौता।· कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता (सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार कर लिया गया)।· तिलक ने – स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैमैं इसे लेकर रहूँगा नारा दिया।
1917कलकत्ताएनी बेसेंट· प्रथम महिला अध्यक्ष
1920नागपुरसी.विजयाराघवाचारी· कांग्रेस ने पहली बार देशी रियासतों के प्रति नीति घोषित की।
1924बेलगाँवमहात्मा गाँधी· एकमात्र कांग्रेस अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता महात्मा गाँधी ने की।
1925कानपुरसरोजिनी नायडू· प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष
1927मद्रासएम.ए.अंसारी· पूर्ण स्वाधीनता की माँग की गई।· साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित
1929लाहौरजवाहरलाल नेहरू· पूर्ण स्वराज की माँग
1931करांचीवल्लभभाई पटेल· मूल अधिकार का प्रस्ताव· गाँधी-इरविन समझौते का अनुमोदन
1934बॉम्बेराजेन्द्र प्रसाद· कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना
1936लखनऊजवाहरलाल नेहरू· जवाहरलाल नेहरू ने समाजवाद को भारत की समस्याओं को हल करने की कुंजी बताया।
1936-37फैज़पुरजवाहरलाल नेहरू· प्रथम अधिवेशन जो गाँव में हुआ।
1938हरिपुरासुभाष चंद्र बोस· राष्ट्रीय नियोजन समिति का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बने।· सुभाष चंद्र बोस द्वारा हिंदी भाषा के लिए रोमन लिपि लागू करने की वकालत की गई।
1939त्रिपुरीसुभाष चंद्रबोस· कार्यकारिणी के गठन के प्रश्न पर गाँधीजी से विवाद हो जाने के कारण सुभाष चंद्र बोस ने अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दे दिया। तत्पश्चात् डॉराजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया।
1940रामगढ़मौलाना अबुलकलाम आज़ाद· लगातार 6 वर्ष तक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे। (1940-45)
1946मेरठआचार्य जे.बी.कृपलानी· आज़ादी के समय अध्यक्ष थे।
1948जयपुर (राज.)डॉ. पट्टाभि्सीतारमैया· स्वतंत्रता के बाद प्रथम अधिवेशन हुआ।
     

भारत में राष्ट्रवाद question answer

भारत में राष्ट्रवाद से आप क्या समझते हैं?

यह विश्वास है कि लोगों का एक समूह इतिहास, परंपरा, भाषा, जातीयता या जातिवाद और संस्कृति के आधार पर स्वयं को एकीकृत करता है

भारत में राष्ट्रवाद कब लागू हुआ?

भारत में राष्ट्रवाद की भावना का उदय 19वीं सदी के उत्तरार्ध के दौरान हुआ। एकता । ब्रिटिश शासन का प्रभाव सर्वप्रथम संस्कृति के क्षेत्र में अनुभव किया गया।

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नमस्ते- मेरा नाम कुलदीप सिंह चारण है। मैं ऑटोमोबाइल जगत का शौकीन लेखक हूं। ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में काम करने का शौक रखते हुए, मैंने अपना करियर उन खबरों को कवर करने और लेखों के माध्यम से दुनिया भर के दर्शकों तक अपनी राय पहुंचाने के लिए समर्पित किया है। मैं अपने दर्शकों तक ऑटोमोबाइल की दुनिया से नवीनतम समाचार और विशेष जानकारी लाने के लिए अथक प्रयास करता हूं। और अब से मैं AarambhTV.com में काम कर रहा हूं।

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