संधि किसे कहते हैं? संधि की परिभाषा, संधि के भेद (प्रकार), Sandhi in hindi grammar

0

इस लेख में हम संधि (Sandhi in hindi) के बारे में जानेंगे। विभिन्न टॉपिक के बारे में यहां बताया गया है। जैसे संधि किसे कहते हैं? संधि की परिभाषा, संधि के भेद (प्रकार)
Sandhi In Hindi Grammar के बारे में जानेगे।

संधि शब्द व्युत्पत्ति एवं अर्थ (संधि किसे कहते हैं) :-

संधि किसे कहते है ? संधि की परिभाषा, संधि के भेद (प्रकार) | Sandhi In Hindi

संधि शब्द का व्युत्पत्ति सम उपसर्ग धातु एवं की प्रत्यय से मिलकर हुई है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है – “परस्पर मिलना” अर्थात जब दो या
दो से अधिक वर्णो का परस्पर मेल एंव उनमें कोई परिवर्तन भी हो तो उसे संधि कहा जाता है।

संधि का शाब्दिक अर्थ है- योग अथवा मेल। अर्थात् दो ध्वनियों या दो वर्गों के मेल से होने वाले विकार को ही संधि कहते हैं। 

नोट :- दो वर्णो का मेल तो हो लेकिन उनमे कोई परिवर्तन न हो तो उसे संधि न कहकर संयोग कहा जाता है। 
उदाहरण :- उद + योग = उदयोग

संधि किसे कहते हैं? क्या है!

जब हम संधि के बारे में पढ़ रहे होते है तब हमारे मन में एक सवाल उत्पन्न होता है कि संधि किसे कहते हैं या संधि क्या है? तो चलिए जानते है इस सवाल का जवाब

“जब दो या दो से अधिक वर्णों का मिलन समिपता के कारण होता है तब उनमें कोई न कोई परिवर्तन होता है और इसी परिवर्तन या विकार को ‘ संधि ‘ कहते हैं।”

संधि की परिभाषा (Sandhi ki Paribhasha In Hindi)

  • जब दो वर्ण पास-पास आते हैं या मिलते हैं तो उनमें विकार उत्पन्न होता है अर्थात् वर्ण में परिवर्तन हो जाता है।
    यह विकार युक्त मेल ही संधि कहलाता है।
  • कामताप्रसाद गुरु के अनुसार, ‘दो निर्दिष्ट अक्षरों के आस-पास आने के कारण उनके मेल से जो विकार होता है, उसे संधि कहते हैं।
श्री किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार, 'जब दो या अधिक वर्ण पास-पास आते हैं तो कभी-कभी उनमें रूपांतर हो जाता है।
इसी रूपांतर को संधि कहते हैं।' 

संधि-विच्छेद (Sandhi Viched in Hindi )-

  • वर्णों के मेल से उत्पन्न ध्वनि परिवर्तन को ही संधि कहते हैं। परिणामस्वरूप उच्चारण एवं लेखन दोनों ही
    स्तरों पर अपने मूल रूप से भिन्नता आ जाती है।
    अतः उन वर्णों/ध्वनियों को पुनः मूल रूप में लाना ही संधि विच्छेद कहलाता है

संधि के उदाहरण :-

महेश = महा + ईश

मनोबल = मनः + बल

गणेश = गण + ईश


संधि के प्रकार/भेद (Types of Sandhi In Hindi ) :-

परस्पर मिलने वाले वर्णो के आधार पर हिंदी भाषा में संधि के प्रकार (Sandhi ke prakar) 3 है। संधि के तीन भेद है,अर्थात संधि तीन प्रकार की होती है-

(1) स्वर संधि 

(2) व्यंजन संधि 

(3) विसर्ग संधि

(अ) स्वर संधि (Swar Sandhi in Hindi) :-

जब किसी स्वर वर्ण का मेल किसी स्वर वर्ण से होता है तो उसे स्वर संधि कहते है।

दो स्वरों के मेल से उत्पन्न विकार स्वर संधि कहलाता है। स्वर संधि के पाँच भेद हैं ।

स्वर संधि के भेद/प्रकार (Swar Sandhi ke Prakar) :-

(i) दीर्घ स्वर संधि :-

जब अ इ उ ऋ + समान स्वर कोई समान स्वर आये तो इनका दीर्घ कर दिया जाता है।

यंहा निम्न चार स्थितियाँ हो सकती है।
अ + आ = आ , आ + अ = आ
अ + आ = आ , आ + आ = आ

दो समान स्वर मिलकर  दीर्घ हो जाते हैं। यदि 'अ' 'आ', 'इ', 'ई', 'उ', 'ऊ' के बाद वे ही लघु या दीर्घ स्वर आएँ
तो दोनों मिलकर क्रमशः 'आ' 'ई' 'ऊ' हो जाते हैं।

उदाहरण :-
अन्न + अभाव = अन्नाभाव 
स्व + अर्थ = स्वार्थ
राम + अनुज = रामानुज
विधा + अर्थी = विधार्थी
रवि + इंद्र = रविंद्र
लघु +उतर = लघुतर
मातृ + ऋण = मातृत्र

दीर्घ संधि के शब्दो का संधि विच्छेद :-

शर्त :- दीर्घ संधि के शब्दों में तीन स्वरो की मात्राये पायी जाती है। (आ ई ऊ ) ऐसे पदों का संधि विच्छेद करते समय शब्दो की शुद्धता का ध्यान रखा जाता है।

दीपावली = दिप + अवलि
रजनीश = रजनी + ईश
गुरुत्तर = गुरु + उतर
मुक्तावली = मुक्ता + अवलि
स्थानावली = स्थना + अवलि

(ii) गुण संधि:-

अ ए ओ इन तीन स्वरो को ही गुण कहा जाता है। अर्थात
(i) जब अ / आ के बाद इ / ई स्वर आये तो दोनो के स्थान पर ए एकादेश कर दिया जाता है।
(ii) अ अथवा आ के बाद उ / ऊ स्वर आये तो दोनों के स्थान पर ओ एकादेश कर दिया जाता है।
(iii) अ / आ के बाद यदि ऋ स्वर आये तो दोनों के स्थान पर “अर” कर दिया जाता है।

यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'इ' या 'ई' 'उ' या 'ऊ', 'ऋ' आएँ तो दोनों मिलकर क्रमशः 'ए' 'ओ' और 'अर्' हो जाते हैं,

उदाहरण:-
देव + इंद्र = देवेंद्र
नर + इंद्र = नरेन्द्र
महा + इंद्र = महेंद्र
महा + उत्सव = महोत्सव

(iii) वृद्धि संधि :-

आ ऐ ओ इन तीन स्वरों को ही वृद्धि कहा जाता है। अर्थात

नियम - 1 :- अ / आ के बाद ए / ऐ आए तो दोनों के स्थान पर "ऐ" एकादेश हो जाता है। 
नियम -2 :- अ / आ के बाद ओ / औ स्वर आये तो दोनों दोनो के स्थान पर "औ" हो जाता है।
नियम -3 :- अ / आ के बाद ऋ स्वर आये तो दोनों के स्थान पर "आर" एकादेश हो जाता है।
 वृद्धि संधि जब अ या आ के बाद ए या ऐ हो तो दोनों के मेल से 'ऐ' तथा यदि 'ओ' या 'औ' हो तो दोनों के स्थान पर 'औ' हो जाता है। 

उदाहरण :-
एक + एक :- एकैक
जल + ओध :- जलोद्य
प्र + ऋण :- प्राण
महा + ऐश्वर्य :- महेश्वर्य

(iv) यण संधि :-

जब इ उ ऋ इन तीन स्वरों के बाद कोई भी असमान स्वर आये तो वह यण संधि मानी जाती है।

(i) इ / ई के स्थान पर – य
(II) उ / ऊ के स्थान पर – व्
(III) ऋ के स्थान पर – र वर्ण कर दीया जाता है।

यदि 'इ' या 'ई', 'उ' या 'ऊ' तथा ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए, तो 'इ' 'ई' का 'य्' 'उ' - 'ऊ' का 'व्' और 'ऋ' का 'र' हो जाता है, 
साथ ही बाद वाले शब्द के पहले स्वर की मात्रा य, व, र् में लग जाती है

उदाहरण:-
अति + अधिक = अत्यधिक
प्रति + एक = प्रत्येक
सु + आगत = स्वागत
मात + आज्ञा = मात्रज्ञा
प्रति + अक्षर = प्रत्यक्षर

(v) अयादि संधि :-

ए ऐ ओ औ के बाद कोई भी स्वर आये तो क्रमश: अय, आय, अव, आव हो जाता है।

यदि 'ए' या 'ऐ' 'ओ' या 'औ' के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो 'ए' का 'अय्', ऐ का 'आय' हो जाता है तथा 'ओ' का 'अ' और 'औ' का 'आव्' हो जाता है,

उदाहरण:-
ने + अन = नयन
नै + इका = नायिका
भी + अन = भवन
भो + उक = भावुक

(ब) व्यंजन संधि (Vyanjan Sandhi In Hindi)

  • व्यंजन संधि में एक व्यंजन का किसी दूसरे व्यंजन से अथवा स्वर से मेल होने पर दोनों मिलनेवाली ध्वनियों में विकार उत्पन्न होता है।
    इस विकार से होने वाली संधि को ‘व्यंजन संधि’ कहते हैं।

(I) स्वर + व्यंजन
(II) व्यंजन + स्वर
(III) व्यंजन + व्यंजन

नियम -1 :- तीसरे वर्ग की संधि का नियम – किसी वर्ग प्रधान वर्ण ( क , च , ट , प , त ) के बाद किसी वर्ग का तीसरा , चौथा ,पांचवा वर्ण य ,प ,र ,ल , अथवा कोई भी स्वर आये तो प्रथम वर्ण अपने ही वर्ग के तीसरे वर्णो (ग ,ज , ड , द , ब ) में बदल जाता है।

उदाहरण :-

वाक् + जाल = वाग्जाल
वाक् + ईश = वागीश
उत् + अय = उदय
जगत् + ईश = जगदीश
अच् + अन्त = अजन्त
दिक् + विजय = दिग्विजय
सत् + आचार = सदाचार

नियम -2 :- चौथे वर्ण की संधि का नियम – किसी वर्ग के प्रथम वर्ण (क ,च ,ट ,प , द ) के बाद यदि “ह” व्यंजन से शुरू होने वाला कोई शब्द आये तो प्रथम वर्ण तो अपने ही वर्ग के के तीसरे वर्णो में बदल जाता है। जबकि आगे आने वाले “ह” व्यंजन को उसी के वर्ग के चौथे वर्ण में बदल दिया जाता है।


नियम -3 :- पांचवे वर्ण की संधि का नियम :- किसी वर्ग के प्रथम वर्ण (क च ट त प र ) के बाद किसी वर्ग का पाँचवा वर्ण (म/ न) आये तो प्रथम वर्ण अपने ही वर्ग के पाँचवे वर्णो में बदल जाता है।

(स) विसर्ग संधि (Visarg Sandhi In Hindi)

जब किसी विसर्ग वर्ण का मेल किसी स्वर अथवा व्यंजन से होता है तो उसे विसर्ग संधि कहते है।

विसर्ग संधि के प्रकार :-

  1. सत्व विसर्ग संधि
  2. उत्व विसर्ग संधि
  3. रुत्प विसर्ग संधि
  4. विसर्ग लोप संधि
  5. विसर्ग लोप दीर्घ संधि

1:- सत्व विसर्ग संधि :- किसी विसर्ग वर्ण का परिवर्तन श च स में हो जाना ही सत्व विसर्ग संधि कहा जाता है।

२:- उत्व विसर्ग संधि :- जब किसी विसर्ग का परिवर्तन “उ” स्वर में कर दिया जाता है। तो उसे उत्व विसर्ग संधि कहते है।

३:- रुत्प विसर्ग संधि :- किसी विसर्ग वर्ण का परिवर्तन “र” में हो जाना ही रूप विसर्ग कहलाता है।

4 :- विसर्ग लोप संधि :- जब किसी विसर्ग से पूर्व ‘अ’ स्वर हो एवं विसर्ग के बाद ‘अ’ के अलावा अन्य कोई स्वर हो तब केवल विसर्ग का लोप किया जाता है। अन्य कोई परिवर्तन नहीं होता है।

5 :- विसर्ग लोप दीर्घ संधि :- जब किसी विसर्ग से पूर्व कोई हस्व स्वर इ / उ आये एंव विसर्ग के बाद ‘र’ व्यंजन से शुरू होने वाला कोई भी शब्द आये तो विसर्ग का लोप कर दिया जाता है। एवं पूर्व में आने वाले हस्व स्वर (इ / उ) के स्थान पर (ई /ऊ ) कर दिया जाता है।

विसर्ग (:) के साथ स्वर या व्यंजन के मेल में जो विकार होता है, उसे 'विसर्ग संधि' कहते हैं

उदाहरण :-

यशः + अभिलाषा = यशोभिलाषा
मनः + ज = मनोज
सरः + वर = सरोवर
अधः + गामी = अधोगामी
परः + अक्ष = परोक्ष
वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध
अन्तः + आत्मा = अन्तरात्मा
आयुः + वेद = आयुर्वेद
चतुः + आनन = चतुरानन
चतुः + मुख = चतुर्मुख
धनुः + धर = धनुर्धर
निः + रोग = नीरोग
यजुः + वेद = यजुर्वेद

Sandhi Viched In Hindi (महत्वपूर्ण शब्द एवं उनके सन्धि-विच्छेद)

  1. उद्धत – उत् + हत ( व्यंजन सन्धि )
  2. कंठोष्ठ्य – कंठ + ओष्ठ्य ( गुण सन्धि )
  3. अन्वय – अनु + अय ( यण् सन्धि )
  4. किंचित् – किम् + चित् ( व्यंजन सन्धि )
  5. घनानंद – घन + आनन्द ( दीर्घ सन्धि )
  6. एकैक – एक + एक ( वृद्धि सन्धि )
  7. अधीश्वर – अधि + ईश्वर ( दीर्घ सन्धि )
  8. अभ्यागत – अभि + आगत ( यण् सन्धि )
  9. उच्छ्वास – उत् + श्वास ( व्यंजन सन्धि )
  10. जगद्बन्धु – जगत् + बन्धु ( व्यंजन सन्धि )
  11. तपोवन – तपः + वन (विसर्ग सन्धि)
  12. अब्ज – अप् + ज ( व्यंजन सन्धि )
  13. दृष्टान्त – दृष्ट + अंत ( दीर्घ सन्धि )
  14. दुर्बल – दुः + बल (विसर्ग सन्धि)
  15. तल्लय – तत् + लय ( व्यंजन सन्धि )
  16. नद्यूर्मि – नदी + ऊर्मि ( यण् सन्धि )
  17. अन्तर्राष्ट्रीय – अन्तः + राष्ट्रीय (विसर्ग सन्धि)
  18. अध्याय – अधि + आय ( यण् सन्धि )
  19. अभ्यस्त – अभि + अस्त ( यण् सन्धि )
  20. आध्यात्मिक – आधि + आत्मिक ( यण् सन्धि )
  21. नयन – ने + अन ( अयादि सन्धि )
  22. नवोढ़ा – नव + ऊढ़ा ( गुण सन्धि )
  23. इत्यादि – इति + आदि ( यण् सन्धि )
  24. उद्धरण – उत् + हरण ( व्यंजन सन्धि )
  25. उल्लंघन – उत् + लंघन ( व्यंजन सन्धि )
  26. निष्फल – निः + फल (विसर्ग सन्धि)
  27. दृष्टि – दृष् + ति ( व्यंजन सन्धि )
  28. दुश्शासन – दुः + शासन (विसर्ग सन्धि)
  29. निर्दोष – निः + दोष (विसर्ग सन्धि)
  30. चतुरंग – चतुः + अंग (विसर्ग सन्धि)
  31. जलौघ – जल + ओघ ( वृद्धि सन्धि )
  32. उद्देश्य – उत् + देश्य ( व्यंजन सन्धि )
  33. निर्झर – निः + झर (विसर्ग सन्धि)
  34. पऱीक्षा – परि + ईक्षा ( दीर्घ सन्धि )
  35. भाविनी – भौ + ईनी ( अयादि सन्धि )
  36. भूदार – भू + उदार ( दीर्घ सन्धि )
  37. पित्राादि – पितृ + आदि ( यण् सन्धि )
  38. रजःकण – रजः + कण (विसर्ग सन्धि)
  39. विन्यास – वि + नि + आस ( यण् सन्धि )
  40. शरच्चंद्र – शरत् + चन्द्र ( व्यंजन सन्धि )
  41. संभव – सम् + भव ( व्यंजन सन्धि )
  42. यथेष्ट – यथा + इष्ट ( गुण सन्धि )
  43. सरोवर – सरः + वर (विसर्ग सन्धि)
  44. संगठन – सम् + गठन ( व्यंजन सन्धि )
  45. हरेक – हर + एक ( गुण सन्धि )
  46. समुद्रोर्मि – समुद्र + ऊर्मि ( गुण सन्धि )
  47. हरिश्चन्द्र – हरिः + चन्द्र (विसर्ग सन्धि)
  48. सहोदर – सह + उदर ( गुण सन्धि )
  49. सप्तर्षि – सप्त + ऋषि ( गुण सन्धि )
  50. मतैक्य – मत + ऐक्य ( वृद्धि सन्धि )
  51. भू + ऊर्ध्व – भूर्ध्व ( दीर्घ सन्धि )
  52. शुभ + इच्छु – शुभेच्छु ( गुण सन्धि )
  53. काम + अयनी – कामायनी ( दीर्घ सन्धि )
  54. सत्य + आग्रह – सत्याग्रह ( दीर्घ सन्धि )
  55. रमा + ईश – रमेश ( गुण सन्धि )
  56. यज्ञ + उपवीत – यज्ञोपवीत ( गुण सन्धि )
  57. लोक + एषणा – लोकैषणा ( वृद्धि सन्धि )
  58. स्व + ऐच्छिक – स्वैच्छिक ( वृद्धि सन्धि )
  59. रक्षा + उपाय – रक्षोपाय ( गुण सन्धि )
  60. अत्रा + एव – अत्रौव ( वृद्धि सन्धि )
  61. मधु + अरि – मध्वरि ( यण् सन्धि )
  62. मातृ + आनन्द – मात्राानन्द ( यण् सन्धि )
  63. नै + अक – नायक ( अयादि सन्धि )
  64. भौ + अना – भावना ( अयादि सन्धि )
  65. सत् + इच्छा – सदिच्छा ( व्यंजन सन्धि )
  66. जगत् + नाथ – जगन्नाथ ( व्यंजन सन्धि )
  67. ऋक् + वेद – ऋग्वेद ( व्यंजन सन्धि )
  68. उत् + अय – उदय ( व्यंजन सन्धि )
  69. तद् + पुरुष – तत्पुरूष ( व्यंजन सन्धि )
  70. उद् + मुख – उन्मुख ( व्यंजन सन्धि )
  71. सम् + क्रान्ति – सड्.क्रान्ति ( व्यंजन सन्धि )
  72. उत् + नयन – उन्नयन ( व्यंजन सन्धि )
  73. उत् + चारण – उच्चारण ( व्यंजन सन्धि )
  74. सम् + गठन – सड्.गठन ( व्यंजन सन्धि )
  75. धनम् + जय – धनंजय ( व्यंजन सन्धि )
  76. जगत् + जननी – जगज्जननी ( व्यंजन सन्धि )
  77. उत् + लिखित – उल्लिखित ( व्यंजन सन्धि )
  78. सम् + यम – संयम ( व्यंजन सन्धि )
  79. सम् + सर्ग – संसर्ग ( व्यंजन सन्धि )
  80. उत् + शृंखल – उच्छृंखल ( व्यंजन सन्धि )
  81. उद् + लेख – उल्लेख ( व्यंजन सन्धि )
  82. पद् + हति – पद्धति ( व्यंजन सन्धि )
  83. प्रति + स्था – प्रतिष्ठा ( व्यंजन सन्धि )
  84. पुष् + त – पुष्ट ( व्यंजन सन्धि )
  85. परि + नय – परिणय ( व्यंजन सन्धि )
  86. नि + सिद्ध – निषिद्ध ( व्यंजन सन्धि )
  87. अभि + सेक – अभिषेक ( व्यंजन सन्धि )
  88. निकृष् + त – निकृष्ट ( व्यंजन सन्धि )
  89. अनु + छेद – अनुच्छेद ( व्यंजन सन्धि )
  90. विद्या + आलय – विद्यालय ( दीर्घ सन्धि )
  91. प्रति + छाया – प्रतिच्छाया ( व्यंजन सन्धि )
  92. सम् + कर्ता – संस्कर्ता ( व्यंजन सन्धि )
  93. परि + कृत – परिष्कृत ( व्यंजन सन्धि )
  94. परः + अक्ष – परोक्ष (विसर्ग सन्धि)
  95. आविः + भाव – आविर्भाव (विसर्ग सन्धि)
  96. परः + पर – परस्पर (विसर्ग सन्धि)
  97. नभः + मंडल – नभोमंडल (विसर्ग सन्धि)
  98. शिरः + धार्य – शिरोधार्य (विसर्ग सन्धि)
  99. मनः + अनुकूल – मनोनुकूल (विसर्ग सन्धि)
  100. अधः + वस्त्रा – अधोवस्त्रा (विसर्ग सन्धि)
  101. सोद्देश्य – स + उद्देश्य
  102. जनोपयोगी – जन + उपयोगी
  103. वधूल्लास – वधू + उल्लास
  104. भ्रूज़ – भ्रू + ऊर्ध्व
  105. पितॄण – पितृ + ऋण
  106. मातृण – मातृ + ऋण
  107. योगेन्द्र – योग + इन्द्र
  108. शुभेच्छा – शुभ + इच्छा
  109. मानवेन्द्र – मानव + इन्द्र
  110. गजेन्द्र – गज + इन्द्र
  111. मृगेन्द्र – मृग + इन्द्र
  112. जितेन्द्रिय – जित + इन्द्रिय
  113. पूर्णेन्द्र – पूर्ण + इन्द्र
  114. सुरेन्द्र – सुर + इन्द्र
  115. यथेष्ट – यथा + इष्ट
  116. विवाहेतर – विवाह + इतर
  117. हितेच्छा – हित + इच्छा
  118. साहित्येतर – साहित्य + इतर
  119. शब्देतर – शब्द + इतर
  120. भारतेन्द्र – भारत + इन्द्र
  121. उपदेष्टा – उप + दिष्टा
  122. स्वेच्छा – स्व + इच्छा
  123. अन्त्येष्टि – अन्त्य + इष्टि
  124. बालेन्दु – बाल + इन्दु
  125. राजर्षि – राज + ऋषि
  126. ब्रह्मर्षि – ब्रह्म + ऋषि
  127. प्रियैषी – प्रिय + एषी
  128. पुत्रैषणा – पुत्र + एषणा
  129. लोकैषणा – लोक + एषणा
  130. देवौदार्य – देव + औदार्य
  131. परमौषध – परम + औषध
  132. हितैषी – हित + एषी
  133. जलौध – जल + ओध
  134. वनौषधि – वन + ओषधि
  135. धनैषी – धन + एषी
  136. महौदार्य – महा + औदार्य
  137. विश्वैक्य – विश्व + एक्य
  138. स्वैच्छिक – स्व + ऐच्छिक
  139. महैश्वर्य – महा + ऐश्वर्य
  140. अधरोष्ठ – अधर + ओष्ठ
  141. शुद्धोधन – शुद्ध + ओधन
  142. स्वागत – सु + आगत
  143. अन्वेषण – अनु + एषण
  144. सोल्लास – स + उल्लास
  145. भावोद्रेक – भाव + उद्रेक
  146. धीरोद्धत – धीर + उद्धत
  147. सर्वोत्तम – सर्व + उत्तम
  148. मानवोचित – मानव + उचित
  149. कथोपकथन – कथ + उपकथन
  150. रहस्योद्घाटन – रहस्य + उद्घाटन
  151. मित्रोचित – मित्र + उचित
  152. नवोन्मेष – नव + उन्मेष
  153. नवोदय – नव + उ
  154. महोर्मि – महा + ऊर्मि
  155. महोर्जा – महा + ऊर्जा
  156. सूर्योष्मा – सूर्य + उष्मा
  157. महोत्सव – महा + उत्सव
  158. नवोढ़ा – नव + ऊढ़ा
  159. क्षुधोत्तेजन – क्षुधा + उत्तेजन
  160. देवर्षि – देव + ऋषि
  161. महर्षि – महा + ऋषि
  162. सप्तर्षि – सप्त + ऋषि
  163. व्याकरण – वि + आकरण
  164. प्रत्युत्तर – प्रति + उत्तर
  165. उपर्युक्त – उपरि + उक्त
  166. उभ्युत्थान – अभि + उत्थान
  167. अध्यात्म – अधि + आत्म
  168. अत्युक्ति – अति + उक्ति
  169. अत्युत्तम – अति + उत्तम
  170. सख्यागमन – सखी + आगमन
  171. स्वच्छ – सु + अच्छ
  172. तन्वंगी – तनु + अंगी
  173. समन्वय – सम् + अनु + अय
  174. मन्वंतर – मनु + अन्तर
  175. गुर्वादेश – गुरु + आदेश
  176. साध्वाचार – साधु + आचार
  177. धात्विक – धातु + इक
  178. नायक – नै + अक
  179. गायक – गै + अक
  180. गायन – गै + अन
  181. विधायक – विधै + अक
  182. पवन – पो + अन
  183. हवन – हो + अन
  184. शाचक – शौ + अक
  185. अभ्यास – अभि + आस
  186. पर्यवसान – परि + अवसान
  187. रीत्यनुसार – रीति + अनुसार
  188. अभ्यर्थना – अभि + अर्थना
  189. प्रत्यभिज्ञ – प्रति + अभिज्ञ
  190. प्रत्युपकार – प्रति + उपकार
  191. त्र्यम्बक – त्रि + अम्बक
  192. अत्यल्प – अति + अल्प
  193. जात्यभिमान – जाति + अभिमान
  194. गत्यानुसार – गति + अनुसार
  195. देव्यागमन – देवी + आगमन
  196. गुर्वौदार्य – गुरु + औदार्य
  197. लघ्वोष्ठ – लघु + औष्ठ
  198. मात्रुपदेश – मातृ + उपदेश
  199. पर्यावरण – परि + आवरण
  200. ध्वन्यात्मक – ध्वनि + आत्मक
  201. अभ्यागत – अभि + आगत
  202. अत्याचार – अति + आचार
  203. व्याख्यान – वि + आख्यान
  204. ऋग्वेद – ऋक् + वेद
  205. सद्धर्म – सत् + धर्म
  206. जगदाधार – जगत् + आधार
  207. उद्वेग – उत् + वेग
  208. अजंत – अच् + अन्त
  209. षडंग – षट् + अंग
  210. जगदम्बा – जगत् + अम्बा
  211. जगद्गुरु – जगत् + गुरु
  212. जगज्जनी – जगत् + जननी
  213. उज्ज्वल – उत् + ज्वल
  214. सज्जन – सत् + जन
  215. सदात्मा – सत् + आत्मा
  216. सदानन्द – सत् + आनन्द
  217. स्यादवाद – स्यात् + वाद
  218. सदवेग – सत् + वेग
  219. छत्रच्छाया – छत्र + छाया
  220. परिच्छेद – परि + छेद
  221. सन्तोष – सम् + तोष
  222. आच्छादन – आ + छादन
  223. उच्चारण – उत् + चारण
  224. जगन्नाथ – जगत् + नाथ
  225. जगन्मोहिनी – जगत् + मोहिनी
  226. श्रावण – श्री + अन
  227. नाविक – नौ + इक
  228. विश्वामित्र – विश्व + अमित्र
  229. प्रतिकार – प्रति + कार
  230. दिवारात्र – दिवा + रात्रि
  231. षड्दर्शन – षट् + दर्शन
  232. वागीश – वाक् + ईश
  233. उन्मत् – उत् + मत
  234. दिग्ज्ञान – दिक + ज्ञान
  235. वाग्दान – वाक् + दान
  236. वाग्व्यापार – वाक् + व्यापार
  237. दिग्दिगन्त – दिक् + दिगन्त
  238. सम्यक् + दर्शन – सम्यग्दर्शन
  239. ‘दिक् + विजय – दिग्विजय
  240. निस्सहाय – निः + सहाय
  241. निस्सार – निः + सार
  242. निश्चल – निः + चल
  243. निष्कलुष – निः + कलुष
  244. निष्काम – निः + काम
  245. निष्कासन – निः + कासन
  246. निश्चय – नि: + चय
  247. दुश्चरित्र – दु: + चरित्र
  248. निष्प्रयोजन – निः + प्रयोजन
  249. निष्प्राण – निः + प्राण
  250. निष्प्रभ – निः + प्रभ
  251. निष्पालक – निः + पालक
  252. निष्पाप – निः + पाप
  253. प्राणिविज्ञान – प्राणि + विज्ञान
  254. योगीश्वर – योगी + ईश्वर
  255. स्वामिभक्त – स्वामी + भक्त
  256. युववाणी – युव + वाणी
  257. मनीष – मन + ईष
  258. दुर्दशा – दु: + दशा
  259. दुर्लभ – दु: + लभ
  260. निर्भय – निः + भय
  261. यशोगान – यशः + भूमि
  262. उन्नयन – उत् + नयन
  263. सन्मान – सत् + मान
  264. सन्निकट – सम् + निकट
  265. दण्ड – दम् + ड
  266. सन्त्रास – सम् + त्रास
  267. सच्चिदानन्द – सत् + चित + आनन्द
  268. यावज्जीवन – यावत् + जीवन
  269. तज्जन्य – तद् + जन्य
  270. परोक्ष – पर + उक्ष
  271. सारंग – सार + अंग
  272. अनुषंगी – अनु + संगी
  273. सुषुप्त – सु + सुप्त
  274. प्रतिषेध – प्रति + सेध
  275. दुस्साहस – दु: + साहस
  276. तपोभूमि – तपः + भूमि
  277. नभोमण्डल – नभः + मण्डल
  278. तमोगुण – तमः + गुण
  279. तिरोहित – तिरः + हित
  280. दिवोज्योति – दिवः + ज्योति
  281. यशोदा – यशः + दा
  282. शिरोभूषण – शिरः + भूषण
  283. मनोवांछा – मनः + वांछा
  284. पुरोगामी – पुरः + गामी
  285. मनोग्राह्य – मनः+ ग्राह्य
  286. निर्मम – निः + मम
  287. दुर्जन – दु: + जन
  288. निराशा – नि: + आशा
  289. निष्ठुर – निः + तुर
  290. धनुष्टंकार– – धनुः + टंकार
  291. दुश्शासन – दु: + शासन
  292. शिरोरेखा – शिरः + रेखा
  293. यजुर्वेद – यजुः + वेद
  294. नमस्कार – नमः + कार
  295. शिरस्त्राण – शिरः + त्राण
  296. चतुस्सीमा – चतुः + सीमा
  297. आविष्कार – आविः + कार

-: संधि से सम्बंधित महत्वपूर्ण प्रश्न :-

Q.1. संधि किसे कहते हैं ?

Ans :- दो ध्वनियों या दो वर्गों के मेल से होने वाले विकार को ही संधि कहते हैं। 

Q.2. संधि की परिभाषा क्या हैं (SANDHI KI PARIBHASHA IN HINDI) ?

Ans :- जब दो वर्ण पास-पास आते हैं या मिलते हैं तो उनमें विकार उत्पन्न होता है अर्थात् वर्ण में परिवर्तन हो जाता है।
यह विकार युक्त मेल ही संधि कहलाता है।

Q.3. संधि के कितने भेद होते हैं ?

Ans :- तीन भेद होते है।

Q.4. स्वर संधि किसे कहते हैं ?

Ans :- जब किसी स्वर वर्ण का मेल किसी स्वर वर्ण से होता है तो उसे स्वर संधि कहते है।

Q.5. व्यंजन संधि किसे कहते हैं ?

Ans :- व्यंजन संधि में एक व्यंजन का किसी दूसरे व्यंजन से अथवा स्वर से मेल होने पर दोनों मिलनेवाली ध्वनियों में विकार उत्पन्न होता है।
इस विकार से होने वाली संधि को ‘व्यंजन संधि’ कहते हैं।

Q.6. विसर्ग संधि किसे कहते हैं ?

Ans :- जब किसी विसर्ग वर्ण का मेल किसी स्वर अथवा व्यंजन से होता है तो उसे विसर्ग संधि कहते है।

संधि किसे कहते हैं ? परिभाषा, संधि के भेद (प्रकार) | sandhi in hindi