सिन्धु घाटी सभ्यता Indus Valley Civilization (Sindhu Ghati Sabhyata)

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सिन्धु घाटी सभ्यता (Sindhu Ghati Sabhyata)

पाषाण युग की समाप्ति के बाद धातुओं के युग का प्रारम्भ हुआ। इसी युग को आद्य ऐतिहासिक काल या धातु काल कहा जाता है।

हड़प्पा संस्कृति की गणना इस काल से की जाती है।

अब तक विश्व की 4 सभ्यताएँ प्रकाश में आई हैं जो क्रमश:  

सभ्यता नाम             –         नदी

1. मेसोपोटामिया        –    दजला व फरात

2. मिस्र                    –    नील

3. भारत                   –    सिन्धु

4. चीन                     –    ह्वांग-हो (पीली नदी)

सिन्धु घाटी सभ्यता का अतीत –

–  सर्वप्रथम 1826 ई. में चार्ल्स मैसन ने (1842 ई.) एक लेख के द्वारा भारत में एक प्राचीनतम नगर हड़प्पा के होने की बात कही।

–  1834 ई. बर्नेश ने किसी नदी के किनारे ध्वस्त किले के होने की बात कही।

–  1851-53 ई. में अलेक्जेण्डर कनिंघम ने हड़प्पा के टीले का सर्वेक्षण किया।

–  1856 ई. में पहली बार ए. कनिंघम ने हड़प्पा का मानचित्र जारी किया था।

–  1861 ई. में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना हुई जिसके प्रथम निदेशक कनिंघम बने, 1872 ई. में कनिंघम ने पुन: हड़प्पा की यात्रा की तथा यहाँ से पाषाण औजार व मोहरें प्राप्त की थी।

सिन्धु घाटी सभ्यता / हड़प्पा संस्कृति का विस्तार :-

सिन्धु घाटी सभ्यता / हड़प्पा संस्कृति का विस्तार :-

–  सैंधव सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा (जम्मू) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक तथा पश्चिम में सुत्कागेंडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर (मेरठ) तक था।

–  वह उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किमी. तक तथा पूर्व से पश्चिम लगभग 1600 किमी. तक फैली हुई थी। अभी तक उत्खनन तथा अनुसंधान द्वारा करीब 2800 स्थल ज्ञात किए गए हैं।

–  वर्तमान में नवीन स्थल प्रकाश में आने के कारण अब इसका आकार – विषमकोणीय चतुर्भुजाकार  (वास्तविक स्वरूप त्रिभुजाकार था)

–  हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत पंजाब, सिंध, ब्लूचिस्तान, अफगानिस्तान, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाग आते हैं।

–  जॉन मार्शल ’सिंधु सभ्यता’ नाम का प्रयोग करने वाले पहले पुरातत्वविद् थे।

–  अमलानन्द घोष ने ’सोथी संस्कृति‘ का हड़प्पा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान माना है।

–  1856 ईमें कराची से लाहौर रेलवे लाइन बिछाते समय जॅान बर्टन  विलियम बर्टन के आदेशों से पहली बार हड़प्पा के टीले से कुछ ईंटे निकाली गई।

–  1881 ई. में एक बार पुन: अलेक्जेंडर कनिंघम हड़प्पा के टीले पर गए तथा वहाँ से कुछ मोहरें प्राप्त की।

–  1899-1905 ई. के दौरान लॉर्ड कर्जन भारत में वायसराय बनकर आए तथा उन्होंने भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग के अधीन भारत में प्राचीन इमारतों व नगरों के संरक्षण व सर्वेक्षण का आदेश पारित किया।

–  इसी के शासनकाल में जॉन मार्शल नए निदेशक के रूप में भारत आए।

–  वर्ष 1924 में लंदन में जॉन मार्शल ने हड़प्पा सभ्यता की खोज की  घोषणा की थी।

–  जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो एण्ड इंडस सिविलाइजेशन’ नामक पुस्तक लिखी थी।

–  हड़प्पा सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता है।

–  मोहनजोदड़ो की बहुसंख्यक जनता भूमध्यसागरीय प्रजाति की थी।

–  वर्तमान में हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश स्थल सरस्वती  दृषदती नदियों के क्षेत्र से प्राप्त हो रहे हैं।

–  सिन्धु सभ्यता के नवीनतम स्थलथार का मरुस्थलवैंगीकोट  गुजरात में करीमशाही खोजे गए हैं।

नोट – हाल ही में कोटड़ा आदली (गुजरात) की भी खोज हुई हैजहाँ से डेयरी उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता की नगर योजना :

–  सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता अद्भुत नगर नियोजन व्यवस्था तथा जल निकासी प्रणाली थी।

–  बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थी जिन्हें क्रमश: दुर्ग और निचला शहर नाम दिया गया है।

–  दुर्ग में शासक वर्ग निवास करता था तथा दुर्ग चारों ओर से दीवार से घिरा था। इसे निचले शहर से अलग किया गया था।

–  दूसरा भाग जिसमें नगर के साक्ष्य मिले हैं यहाँ सामान्य नागरिक, व्यापारी, शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक वर्ग निवास करते थे। निचला शहर भी दीवार से घिरा था।

–  सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थी। सड़कों के किनारे सुव्यवस्थित नालियाँ बनी थी। यह नालियाँ ऊपर से ढकी हुई होती थी। इनमें घरों से निकलने वाला गंदा पानी छोटी नालियों से होते हुए मुख्य सड़क पर बड़े नाले में मिल जाता था। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की नगर योजना लगभग समान थी। यहाँ पकी हुई ईंटों का प्रयोग होता था।   

–  भवन निर्माण में पक्की एवं कच्ची दोनों तरह की ईंटों का प्रयोग होता था। भवन में सजावट आदि का अभाव था। प्रत्येक मकान में स्नानागार, कुएँ एवं गंदे जल की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध था। मकानों के दरवाजे मध्य में न होकर एक किनारे पर होते थे।

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सिन्धु घाटी सभ्यता / हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल:-

स्थलनदी/सागर तटउत्खननकर्ता
हड़प्पारावी नदीदयाराम साहनी
मोहनजोदड़ोसिंधु नदीराखालदास बनर्जी
लोथलभोगवा नदीएस. आर. राव
कालीबंगाघग्घर नदीअमलानन्द घोष
रोपड़सतलज नदीयज्ञदत्त शर्मा
कोटदीजीसिंधु नदीफजल अहमद खाँ
चन्हुदड़ोसिंधु नदीएन. जी. मजूमदार
रंगपुरमादर नदीएम.एस. वत्स
आलमगीरपुरहिन्डन नदीयज्ञदत्त शर्मा
सुत्कागेंडोरदाश्क नदीऑरेल स्टाइन
बनवालीसरस्वती नदीरवीन्द्र सिंह बिस्ट

रेडियो कार्बन पद्धति:-

–  इसी आधार पर किसी भी वस्तु की आयु ज्ञात कर ली जाती है।

–  रेडियो कार्बन (C-14) तिथि के अनुसार डॉडीपीअग्रवाल ने हड़प्पा सभ्यता का काल 2300 ई. पू. से 1750 पूको माना है।

प्रमुख स्थल तथा विशेषताएँ :-

हड़प्पा :-

–  स्टुअर्ट पिग्गट के अनुसार यह अर्द्ध-औद्योगिक नगर था। यहाँ के निवासियों का एक बड़ा भाग व्यापार, तकनीकी उत्पाद और धर्म के कार्यों में संलग्न था। 

–  इसकी खोज दयाराम साहनी ने वर्ष 1921 में की थी। तब ASI के निदेशक जॉन मार्शल थे यह मोंटगोमरी (पाक, पंजाब) वर्तमान में शाहीवाल में स्थित है।

–  नदी- रावी नदी

–  तट – बायाँ तट

–  उत्खनन – 2 बार                                    

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हड़प्पा से प्राप्त अन्य अवशेष :-

–  हड़प्पा से स्त्री के गर्भ से निकलते हुए एक पौधे की मृण्मूर्ति प्राप्त हुई है, जिसे हड़प्पा वासियों ने उर्वरा देवी या पृथ्वी देवी माना है। 

–  यहाँ से बिना धड़ की एक पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई।

–  यह नगर लगभग 5 किमी. की परिधि में फैला हुआ था

–  हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक कब्रिस्तान स्थित है जिसे “समाधि आर – 37” नाम दिया गया है। अन्य कब्र – H भी प्राप्त हुई है।

–  हड़प्पा का दुर्ग जिस टीले पर स्थित था उसे व्हीलर ने माउण्ड – ए-बी की संज्ञा दी।

–  काँसे का दर्पण

–  हड़प्पा से अन्नागारों की दो पंक्तियों के अवशेष मिले, प्रत्येक में 6-6 अन्नागर हैं।

–  प्रसाधन मंजूषा (शृंगार पेटी)

–  सर्वाधिक अलंकृत मुहरें- हड़प्पा से, जबकि सर्वाधिक मुहरें- मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं।

–  सैंधव सभ्यता की मुहरें सेलखड़ी (स्टेटाइड) से निर्मित होती थी।

–  श्रमिक आवास के प्रमाण मिले हैं।

मुहरें तीन प्रकार की होती थी ̵

1. आयताकार       2. वृत्ताकार          3. वर्गाकार (सर्वाधिक)

–  इन मोहरों पर एक शृंगी बैल या हरिण, कूबड़दार बैल, मातृदेवी, व्याघ्र, पशुपतिनाथ व भैंसा आदि का अंकन मिलता है।

मोहनजोदड़ो :-

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–  मोहनजोदड़ो सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में स्थित है। इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में की थी। इसे सिंध का नखलिस्तान भी कहा जाता है।

–  इसका उत्खनन 1922 – 30 के मध्य जॉन मार्शल के निर्देशन में करवाया गया

–  यह नगर 8 बार उजड़कर 9 बार बसा था जिसके 7 क्रमिक स्तर मिले हैं।

–  मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत अन्नागार थी व्हीलर ने इसे अन्नागार (Grannary) की संज्ञा दी तथा सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल ’विशाल स्नानागार’ था, इस स्नानागार का धार्मिक महत्त्व था। इसके चारों ओर जल भण्डारण हेतु बड़े-बड़े टैंक मिले हैं। इसे जॉन मार्शल ने तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण कहा, साथ ही इसे विराट वस्तु की संज्ञा दी है।

–  यह मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक है।

–  वृहत स्नानागार की तुलना डी.डी. कौशाम्बी कालान्तर के संस्कृत ग्रन्थों में वर्णित पुष्कर तथा कमलताल से करते हैं।

–  मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर पर तीन मुख वाले एक देवता का अंकन किया गया है। जिसके चारों तरफ भैंसा, हाथी, गेंडा, व्याघ्र व निचले भाग पर 2 हरिण व ऊपरी भाग पर मछली व 10 अक्षरों का अंकन मिलता है।

–  जॉन मार्शल ने इसे पशुपतिनाथ की उपाधि प्रदान की, साथ ही इसे ‘आद्यतम शिव’ की उपमा दी है। 

–  इस स्थल से मानव कंकाल (शायद नरसंहार) के साक्ष्य मिले हैं।

–  यहाँ से पुरोहित आवास के साक्ष्य भी मिले हैं।

–  यहाँ से काँसे की नर्तकी की मूर्ति प्राप्त हुई है। इसका निर्माण द्रवी-मोम विधि से हुआ है। हड़प्पावासी ताँबे और टिन को मिलाकर काँसे का निर्माण करते थे।

–  मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर पर एक योगी को ध्यान मुद्रा में एक टांग पर दूसरी टांग डाले बैठा दिखाया गया है।

लोथल :-

–  यह गुजरात स्थित स्थल है। इसकी खोज 1954-55 ई. में की गई तथा इसका उत्खनन एस.आर. राव ने 1957-58 ई. के मध्य करवाया।

–  यह एक औद्योगिक नगर था ।

–  लोथल से मनके बनाने का कारखाना मिला है।

–  बाट-माप-तौल के लिए पैमाना/हाथी दाँत पैमाना होता था।

–  यह सिन्धु सभ्यता का एक प्रमुख गोदीबाड़ा (डॉक यार्ड) बंदरगाह/पत्तन था।

–  सिकोत्तरी माता समुद्री देवी थी।

–  नाव के साक्ष्य से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार का पता चलता है।

–  यह नगर भोगवा नदी के किनारे स्थित है।

–  सम्पूर्ण सैन्धव सभ्यता का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल- लोथल का गोदीबाड़ा था। यहाँ से बंदरगाह के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। लोथल उस समय पश्चिमी एशिया से व्यापार का प्रमुख स्थल था। 

–  यहाँ से मनके बनाने का कारखाना मिला है।

–  तीन युगल शवाधान (एक साथ दफनाए शव) जिनका सिर उत्तर दिशा की तरफ तथा पैर दक्षिण दिशा की तरफ हैं।

–  यहाँ से अग्निकुंड/अग्निवेदिकाएँ मिली हैं।

–  लोथल की सबसे प्रसिद्ध कृति पक्की ईंटों का बना जहाजों का डॉकयार्ड था, जो त्रिभुजाकार था। यहाँ से मिली मोहरों में सबसे महत्त्वपूर्ण वे हैं, जो ईरान की खाड़ी में मिली मुहरों के अनुरूप हैं, जिनसे मेसोपोटामिया और फारस (ईरान) के साथ व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।

–  एस. आर. राव ने इसे लघु हड़प्पा या लघु मोहनजोदड़ो कहा।

कालीबंगा :-

–  कालीबंगा से हड़प्पा सभ्यता के साथ-साथ हड़प्पा पूर्व सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं अर्थात् यह प्राक् हड़प्पाकालीन स्थल है।

–  कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित घग्घर नदी के किनारे बाएँ तट पर स्थित है।

–  कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है ̵  काले रंग की चूड़ियाँ।

–  कालीबंगा की खोज 1952-53 ई. में अमलानन्द घोष ने की तथा उत्खनन 1961-67 ई. के मध्य किया गया।

–  कालीबंगा से प्राप्त साक्ष्य –

  • ऊँट के प्रथम साक्ष्य
  • हल की आकृति व जोते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
  • कालीबंगा के लोग एक साथ 2 फसलें बोते थे।
  • कालीबंगा को ‘दीन-हीन’ बस्ती कहा जाता था।
  • लकड़ी की नालियों के साक्ष्य
  • यहाँ से प्राप्त एक खोपड़ी में छेद किए हुए मिले हैं जो शल्य चिकित्सा का प्रमाण माना जाता है।

–  कालीबंगा से तीन प्रकार के शवाधान के साक्ष्य मिले हैं ̵

  • आंशिक शवाधान
  • पूर्ण शवाधान
  • दाह संस्कार

–  कालीबंगा से विश्व के प्रथम भूकम्प के साक्ष्य मिले, जो कि लगभग 2100 ई.पू. के आसपास आया होगा।

–  अलंकृत फर्श, ईँट तथा बेलनाकार मोहरे व हवनकुण्ड के साक्ष्य।

    नोट- डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को हड़प्पा संस्कृति की तीसरी राजधानी कहा।

–  बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया में भी प्रचलित थी अत: यह कहा जा सकता है कि संभवत: कालीबंगा के व्यापारिक संबंध मेसोपोटामिया के साथ रहे होंगे।

चन्हुदड़ो :-

–  चन्हुदड़ो, मोहनजोदड़ो से 130 किमी. दक्षिण में स्थित है। इसकी सर्वप्रथम खोज सन् 1930-31 में नानी गोपाल मजूमदार (एन.जी. मजूमदार) ने की थी। उत्खनन वर्ष 1935 में अर्नेस्ट मैके द्वारा किया गया।

–  चन्हुदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एकमात्र पुरास्थल है, जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं।

–  यह एक औद्योगिक केंद्र था। यहाँ से मनका बनाने का एक कारखाना प्राप्त हुआ है।

–  एकमात्र स्थल जहाँ से मिट्टी की पकी हुई पाइपनुमा नालियों  का प्रयोग किया गया।

यहाँ से :-

–  मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य

–  सौंदर्य प्रसाधन सामग्री (जैसे- लिपस्टिक) के अवशेष यहाँ मिले हैं।

–  हाथी का खिलौना

–  पीतल की इक्का गाड़ी

–  स्याही की दवात के साक्ष्य मिले हैं।

–  चन्हुदड़ो से किसी भी प्रकार के दुर्ग के साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

–  यहाँ से बिल्ली के पीछे भागते हुए कुत्ते के पदचिह्न भी प्राप्त हुए हैं।

–  सम्पूर्ण सिन्धु सभ्यता का एकमात्र सभ्यता स्थल जहाँ से झुकर-झांगर संस्कृति के अवशेष प्राप्त होते हैं।

बनवाली :-

–  बनवाली, हरियाणा के हिसार जिले में सरस्वती नदी के किनारे स्थित है।

–  इसकी खोज 1974 में आर.एस. बिष्ट ने की।

–  यहाँ से मिट्टी के खिलौने (हल) की प्राप्ति हुई है।

–  इस स्थल से जौ, तिल तथा सरसों के ढेर मिले हैं।

–  बनवाली में जल विकास प्रणाली का अभाव था।

रंगपुर :-

–  रंगपुर गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में  नदी के समीप स्थित है।

–  इसकी खोज 1974 में एस.आर. राव ने की।

–  यहाँ पर पूर्वकालीन व उत्तरोत्तर हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिले हैं।

–  इस स्थल से चावल की भूसी के प्रमाण मिले हैं।

सुरकोटड़ा :

–  गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में इस स्थल की खोज सन् 1964 में जगपति जोशी ने की थी।

–  यहाँ से घोड़े की हडि्डयों के अवशेष मिले हैं।

–  कलश शवाधान के साक्ष्य यहाँ से मिले हैं।

–  ऊपर से कब्र को पत्थर से ढकने के साक्ष्य यहाँ से मिले हैं।

धोलावीरा :-

–  गुजरात राज्य के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में धोलावीरा स्थित है।

–  इसकी खोज वर्ष 1967- 68 में जे.पी. जोशी ने की तथा उत्खनन – वर्ष 1991 आर.एस. बिष्ट ने किया।

–  यहाँ से पॉलिशदार सफेद पाषाण खण्ड बड़ी संख्या में मिलते हैं।

–  यहाँ से नेवले की पत्थर की मूर्ति भी मिली है।

–  यह नगर हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े नगरों में से है।

–  धोलावीरा में जल संरक्षण से संबंधित उत्कृष्ट तकनीक का पता चलता है।

–  यहाँ से सिंधु घाटी सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम (खेल का मैदान) मिला है।

–  घोड़े की कलाकृतियों के अवशेष भी मिले हैं।    

–  अन्य हड़प्पाई स्थल के विपरीत धोलावीरा नगर तीन खंडों में विभाजित है अर्थात् “मध्यमा” के अवशेष केवल इसी स्थल से प्राप्त हुए हैं।

1. दुर्ग

2. मध्यम  नगर

3. निचला नगर

Note :  वर्ष 2015-16 के सम्पूर्ण उत्खनन के बाद राखीगढ़ी को भारत में सबसे बड़ा क्षेत्र माना गया है। (410 हैक्टेयर)

सुत्कागेंडोर :-

–  पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में दाश्क नदी पर सुत्कागेंडोर स्थित है। यह सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पश्चिमी ज्ञात नगर है।

–  यहाँ से बंदरगाह के अस्तित्व का पता चला है।

आलमगीरपुर :-

–  उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले में हिंडन नदी के तट पर आलमगीरपुर स्थित है।

–  यहाँ से एक भी मातृदेवी की मूर्ति और मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।

–  इस पुरास्थल की खोज में ‘भारत सेवक समाज’संस्था का विशेष योगदान रहा तथा उत्खनन 1958 में  यशदत शर्मा  ने करवाया।

रोपड़ :-

–  सन् 1950 में इसकी खोज बी.बी. लाल ने की ।

–  1953-56 ई. में यज्ञदत्त शर्मा ने उत्खनन करवाया।

–  यहाँ हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं।

–  शवों को अंडाकार गड्डों में दफनाया जाता था।

–  यहाँ से मानवीय कब्र के नीचे एक कुत्ते का शव  (मानव के  साथ पालतु कुत्ते को दफनाने के अवशेष) मिला है।

कोटदीजी :-

–  यह स्थल हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन दोनों  से संबंधित है।

–  यहाँ मकान कच्ची ईंटों से बने हैं परन्तु नींवों में पत्थर का प्रयोग हुआ है।

राखीगढ़ी :-

–  इस स्थल की खोज रफीक मुगल और सुरजभान ने की थी।

–  यह स्थल हरियाणा राज्य के जींद जिले में घग्घर नदी पर स्थित है।

–  भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता के विशालतम नगरों में से एक राखीगढ़ी है।

–  यहाँ से मातृदेवी अंकित लघु मुद्रा की चार मोहरें मिली हैं।

सामाजिक जीवन :-

–  इस सभ्यता के लोग भोजन में गेहूँ, जौ, खजूर एवं मांस खाते थे।

–  सैन्धव समाज चार वर्गों में विभाजित था-

     (1) विद्वान (पुरोहित)

     (2) यौद्धा

     (3) व्यापारी

     (4) श्रमिक

–  सूती एवं ऊनी दोनों वस्त्रों का प्रयोग करते थे।

–  मछली पकड़ना, शिकार करना, चौपड़, पासा खेलना आदि मनोरंजन के साधन थे।

–  पासा इस युग का प्रमुख खेल था।

–  समाज की इकाई परम्परागत तौर पर परिवार था।

–  सिंधु घाटी सभ्यता के लोग साज-सज्जा पर भी ध्यान देते थे। खुदाई में स्त्री एवं पुरुष दोनों के आभूषण प्राप्त हुए हैं।

–  इस सभ्यता के लोग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे।

–  मछली पकड़ना व शिकार करना उनका नियमित व्यवसाय था।

–  सिंधु सभ्यता के लोग शांतिप्रिय थे। युद्ध का कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है, संभवत: उन्हें तलवार के बारे में पता नहीं था।

–  संभवत: वे सिंदूर के प्रयोग से भी परिचित थे। 

धार्मिक मान्यताएँ :-

–  इस सभ्यता से स्वास्तिक के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

–  इस सभ्यता में कहीं से मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।

–  लिंग पूजा के पर्याप्त प्रमाण हैं जिन्हें बाद में शिव के साथ जोड़ा गया है। पत्थर की कई योनि आकृतियाँ भी प्राप्त हुर्ह हैं, जिनकी पूजा प्रजनन शक्ति के रूप में की जाती थी।

–  इस सभ्यता के लोग पशुओं की भी पूजा करते थे।

–  वृक्ष पूजा के रूप में पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती थी।

–  अग्निपूजा के प्रचलन के भी प्रमाण मिले हैं/जल पूजा के प्रमाण मिले हैं।

–  हड़प्पा सभ्यता में शव विसर्जन के तीनों तरीके सम्पूर्ण शव को पृथ्वी में गाड़ना, पशु – पक्षियों के खाने के पश्चात् शव के बचे हुए भाग को गाड़ना तथा शव को दाहकर उसकी भस्म गाड़ना प्रचलित थे।

–  यहाँ से संभवत: नागपूजा के अवशेष भी मिले हैं।

राजनीतिक स्थिति :

–  हड़प्पा सभ्यता व्यापार और वाणिज्य आधारित थी। इसलिए शासन व्यवस्था में भी व्यापारी वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

–  पिग्गट और व्हीलर आदि विद्वानों का मत है कि सुमेर और अक्कद की भाँति मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में भी पुरोहित लोग शासन करते थे। ये शासक प्रजा के हित का पूरा ध्यान रखते थे। सम्भवत: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा उनके राज्य की दो राजधानियाँ थी।

–  हंटर के अनुसार, ‘मोहनजोदड़ो का शासन राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।’

–  मैके के अनुसार यहाँ जनप्रतिनिधि का शासन था।

आर्थिक जीवन :

–  पुरातात्विक साक्ष्य से यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु सभ्यता के लोग हल या कुदाल से खेती नहीं करते थे। यह सम्भव है कि ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों से या लकड़ी के हल से भूमि को खोदकर खेती करते थे। इन लोगों के औजार बहुत अपरिष्कृत थे किन्तु यहाँ के किसान अपनी आवश्यकता से अधिक अन्न उगाते थे। अतिरिक्त अन्न का उपयोग व्यापार और वाणिज्य में होता था।

–  सिन्धु घाटी के लोग खेती के अतिरिक्त बहुत से उद्योग जानते थे। ये लोग कपास उगाना और कातना भली प्रकार जानते थे। यह संभव है कि कपास और सूती कपड़े का निर्यात किया जाता था। ये अनेक प्रकार के मिट्‌टी के बर्तन बनाते और कपड़ों को रंगते थे।

–  सिंधु सभ्यता के आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार कृषिपशुपालनशिल्प व व्यापार थे।

–  सिन्धु घाटी के लोग अपनी वस्तुएँ मिस्र भी भेजते थे। यहाँ से कुछ मनके व हाथी दाँत का निर्यात किया जाता था। मेसोपोटामिया के एक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि अक्कद साम्राज्य के समय में मेलुहा (सिन्धु घाटी सभ्यता) से आबनूसताँबेसोनेलालमणि और हाथीदाँत का निर्यात होता था।  

–  ये लोग बाटों का भी प्रयोग जानते थे। कुछ बाट घन के आकार के और कुछ गोल नुकीले हैं। उनकी तोल में 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 का अनुपात है। सबसे अधिक 16 इकाई का बाट प्रयोग में आता था।   

कृषि :

–  हड़प्पा संस्कृति की मुख्य फसलें गेहूँ और जौ थी। इसके अलावा वे राई, मटर, तिल, चना, कपास, खजूर, तरबूज आदि भी पैदा करते थे।

–  चावल के उत्पादन का प्रमाण लोथल और रंगपुर से प्राप्त हुआ है।

–  किसी भी स्थल से नहरों व नालों से सिंचाई के प्रमाण नहीं मिले हैं।

पशुपालन :

–  हड़प्पा सभ्यता में पाले जाने वाले मुख्य पशु थे – बैल, भेड़,  हरिण, मोर, गाय, खच्चर, बकरी, भैंस, सूअर, हाथी, कुत्ते, गधे आदि।

–  हड़प्पा निवासियों को कूबड़वाला सांड विशेष प्रिय था।

–  ऊँट, गैंडा, मछली, कछुए का चित्रण हड़प्पा संस्कृति की मुद्राओं पर हुआ हैं।

–  हड़प्पा संस्कृति में घोड़े के अस्तित्व पर विवाद है लेकिन सुरकोटदा से घोड़े के अस्थिपंजर व रानाघंडई से घोड़े के दाँत मिले हैं।

–  कालीबंगा से ऊँट की हड्डियाँ मिली हैं।

शिल्प एवं उद्योग धन्धें :

–  धातुकर्मी ताँबे के साथ टिन मिलाकर काँसा तैयार करते थे।

–  मोहनजोदड़ो से बने हुए सूती कपड़े का एक टुकड़ा तथा कालीबंगा में मिट्टी के बर्तन पर सूती कपड़े की छाप मिली है।

–  इस सभ्यता के लोगों को लोहे की जानकारी नहीं थी।

–  काँस्य मूर्ति का निर्माण द्रवी – मोम विधि से हुआ है।

–  मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त मृण्मूर्तियों में पुरुषों की तुलना में नारी मृण्मूर्तियाँ अधिक हैं।

–  हड़प्पा संस्कृति में पशु – मूर्तियाँ, मानव – मूर्तियों से अधिक संख्या में पाई गई हैं।

–  हड़प्पा में कूबड़ वाले बैलों की मूर्तियाँ सर्वाधिक संख्या में मिली हैं।

–  मनका उद्योग का केन्द्र लोथल एवं चन्हुदड़ो था।

–  हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख उद्योग – वस्त्र उद्योग था।

image 81

कला :

–  कला के क्षेत्र में सिन्धु घाटी के लोगों ने बहुत उन्नति की थी। वे बर्तनों पर सुन्दर चित्र बनाते थे। मनुष्यों और पशुओं के चित्र बड़ी संख्या में मिलते हैं। मुहरों पर जो पशुओं के चित्र बने हैं, उनसे इन लोगों की कलात्मक अभिरुचि प्रकट होती है। ये चित्र बैल, हाथी, चीता, बारहसिंगा, घड़ियाल, गैंडा आदि पशुओं के हैं।

–  हड़प्पा में दो मनुष्यों की मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे प्रकट होता है कि ये लोग मनुष्यों की मूर्तियाँ बनाने में भी बहुत कुशल थे। ध्यान मुद्रा में योगी की पत्थर की मूर्ति और काँसे की नर्तकी की मूर्ति सिन्धु घाटी की कला के सुन्दर नमूने हैं। 

–  सिंधु सभ्यता में संभवत: तीन प्रकार की मूतियों का निर्माण होता था-

(1) धातु मूर्तियाँ

(2) मृण मूर्तियाँ

(3) प्रस्तर मूर्तियाँ

व्यापार :

–  हड़प्पावासी राजस्थान, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत तथा बिहार से व्यापार करते थे।

–  मेसोपोटामिया, सुमेर तथा बहरीन से उनके व्यापारिक संबंध थे।

–  2350 ई. पू. के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलूहा (सिन्ध क्षेत्र का ही प्राचीन भाग) के साथ व्यापार संबंध होने के उल्लेख मिलते हैं।

मापतौल :

–  मोहनजोदड़ो से सीप का तथा लोथल से एक हाथी – दाँत का पैमाना मिला है।

–  तौल पद्धति की एक शृंखला 1, 2, 4, 8 से 64 इत्यादि थी तथा 16 या उसके आवर्तकों का माप की इकाई के रूप में प्रयोग होता था, जैसे -16, 64, 160, 320 और 640।

मुहर एवं लिपि :

–  मोहनजोदड़ो से सर्वाधिक संख्या में मुहरें प्राप्त हुई हैं।

–  प्राप्त मुहरों में सर्वाधिक सेलखड़ी की बनी हैं।

–  मुहरों पर एक शृंगी पशु की सर्वाधिक आकृति मिली है। लोथल और देसलपुर से ताँबे की मुहरें मिली हैं।

–  हड़प्पा लिपि वर्णात्मक नहीं, बल्कि मुख्यतः भाव चित्रात्मक है।

–  लोथल व मोहनजोदड़ो की एक-एक मुहर पर नाव का चित्र भी प्राप्त हुआ है।

–  मुहरों का आकार गोलाकार, अंडाकार, घनाकार होता था तथा आयताकार चौकोर व वर्गाकार मुहरें भी मिली हैं।

–  इस लिपि की लिखावट सामान्यतया दायीं से बायीं ओर है।

–  हड़प्पाई लिपि को पढ़ने में अभी तक सफलता नहीं मिली है।

–  सैन्धव सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक थी।

   इस लिपि की पहली लाइन दाएँ से बाएँ तथा दूसरी लाइन बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।

–  लिपि के सर्वप्रथम नमूने – 1853 ई. में कनिंघम ने प्राप्त  किए।

इसके अन्य नाम :-

–  सर्पिलाकार लिपि

–  गोमूत्राक्षर लिपि

–  ब्रस्टोफेदन/फेदस/फेदम (भावचित्रात्मक लिपि)

सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को सर्वप्रथम पढ़ने का प्रयास ‘वेडेन महोदय’ ने किया था। इस लिपि को पढ़ने का प्रयास करने वाले  प्रथम भारतीय व्यक्ति ‘नटवर झा’ थे परन्तु पढ़ने में असफल रहे।

–  सैन्धव लिपि का ज्ञान मुख्यतमुहरों पर मिलता है।

–  इस लिपि में 64 मूल चिह्न हैं जबकि 250-400 तक चित्राक्षर हैं।

  लिपि के साक्ष्य हड़प्पा के कब्रिस्तान H से मिलते हैं।

–  लिपि के रूप में प्रयुक्त जीवों के चित्र में मछली के चित्र का प्रयोग सर्वाधिक हुआ है।

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ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ

–  इस काल में मनुष्य पत्थर एवं ताँबे के उपकरण/औज़ार प्रयोग करने लगा था, इसी कारण इस काल को ‘ताम्रपाषाण काल’ (कैल्फोलिथिक कल्चर) कहते हैं।

–  लगभग 5000 ई.पू. में मनुष्य ने सर्वप्रथम जिस धातु का प्रयोग किया, वह ताँबा था। ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ कृषि आधारित ग्रामीण संस्कृतियाँ थी।

1. बनास या आहड़ संस्कृति – 2800 – 1500 ई. पू.

प्रमुख स्थल- आहड़, बालाथल तथा गिलूंड (राजस्थान)।

2. कायथा संस्कृति – 2450 – 1700 ई. पू.

प्रमुख स्थल-कायथा तथा एरण (मध्य प्रदेश)।

3. मालवा संस्कृति – 1900 – 1400 ई. पू.

प्रमुख स्थल – कायथा, एरण तथा नवदाटोली

4.  जोरवे संस्कृति – 1500 – 900 ई. पू.

प्रमुख स्थल- जोरवे, नेवासा, दैमाबाद तथा इनामगाँव (महाराष्ट्र)।

5.  ताँबे के प्रयोग व उनके लाभों का विवेचन बी.जी. चाइल्ड ने अपनी पुस्तक “What Happened in History” में किया है।

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सिंधु घाटी सभ्यता प्रश्नोत्तरी

सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास क्या है?

न्धु घाटी सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। सिन्धु घाटी सभ्यता का पूर्व हड़प्पा काल करीब 3300 से 2500 ईसा पूर्व माना जाता है। 

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब और किसने की थी?

सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई पू से 1750 ई पूर्व मानी गई है. सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की

सिंधु घाटी सभ्यता कहाँ पर है?

सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित प्रमुख स्थल यह स्थल वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले में स्थित है।

सिंधु घाटी सभ्यता बहुविकल्पीय प्रश्न pdf

Q.1
हड़प्पाकालीन पुरातात्विक स्थल लोथल के संदर्भ में कौन-सा असत्य कथन है?

1
लोथल हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह तथा यहाँ से पश्चिम एशिया के साथ व्यापार होता था।

2
लोथल में गढ़ और नगर दोनों अलग-अलग प्राचीर से घिरे हुए थे।

3
लोथल के पूर्वी भाग में जहाज का गोदीवाड़ा (डॉकयार्ड) मिला है।

4
लोथल को एस.आर.राव ने लघु हड़प्पा एवं लघु मोहनजोदड़ो कहा है।

Q.2
हड़प्पाकालीन देवी-देवताओं में किसे परवर्ती हिन्दू धर्म में अंगीकार नहीं किया गया?

1
मिश्रित प्राणी

2
सात मातृदेवियाँ (सप्तमातृका)

3
पशुपति शिव

4
एक शृंगी जीव

Q.3
मोहनजोदड़ो के विशाल स्नानागार का मुख्य प्रयोजन निम्न में से क्या प्रतीत होता है?

1
धर्मानुष्ठान सम्बन्धी स्नान

2
सामूहिक स्नान

3
तैराकी एवं जल क्रीड़ा

4
आपातकाल में उपयोग करने हेतु

Q.4
कालीबंगा में कौन-सी दो फसलों की एक साथ बुवाई का साक्ष्य मिलता हैं?

1
चना और सरसों

2
जौ और गेहूँ

3
जौ और मटर

4
मटर और मसूर

Q.5
सैंधव सभ्यता में कौन-सी सबसे कम प्रजाति के अवशेष मिले है-

1
मंगोलॉयड

2
भूमध्य सागरीय

3
अल्पाइन

4
प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड

Q.6
द्रविड़ो को सिंधु घाटी सभ्यता का निर्माता माना है-

1
D.P. अग्रवाल

2
अमलानन्द घोष

3
R.D. बनर्जी

4
वेडेल

Q.7
हड़प्पा सभ्यता के विनाश में आर्य आक्रमण का आधार किसने दिया था?

1
जॉन मार्शल

2
पिग्गट

3
मार्टीमर व्हीलर

4
गॉर्डन चाइल्ड

Q.8
हड़प्पा व सुमेरियन सभ्यता में निम्नलिखित में से कौन-सी प्रणाली समान दिखाई देती है?

1
कृषि प्रणाली

2
अन्न भण्डार प्रणाली

3
सड़क प्रणाली

4
भवन निर्माण

Q.9
निम्नलिखित में से कौन-सी धार्मिक परम्परा हड़प्पा सभ्यता में प्रचलित नहीं थी?

1
मातृदेवी की पूजा

2
तांत्रिक परम्परा

3
वृक्ष-पूजा

4
देव स्तुति

Q.10
के.सी श्रीवास्तव के हड़प्पा सभ्यता का दक्षिणतम छोर माना है-

1
दैमाबाद

2
नागेश्वर

3
वेंगीकोट

4
भगतराव

Q.11
अलंकृत ईंटों का प्रयोग किस स्थल से प्राप्त हुआ है?

1
लोथल

2
मोहनजोदड़ो

3
कालीबंगा

4
चन्हूदड़ों

Q.12
निम्नलिखित में से किन पशु/पक्षियों का चित्रांकन हड़प्पाई मुहरों पर नहीं हुआ हैं?
(i) गाय (ii) भैंसा (iii) घोड़ा (iv) ऊँट
कूट:-

1
केवल (ii)

2
(i), (iii), (iv)

3
केवल (ii) व (iv)

4
केवल (ii) व (iii)

Q.13
मोहनजोदड़ो की जनसंख्या में सर्वाधिक प्रजाति थी-

1
प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड

2
भूमध्य सागरीय

3
मंगोलियन

4
अल्पाइन

Q.14
निम्नलिखित में से कौन-सा/से तथ्य हड़प्पाकालीन सभ्यता के संबंध में सही है/हैं?
1.दो प्रमुख प्रकार के गेहूँ की किस्में उगाई जाती थी।
2.तीन प्रकार के जौ की खेती
3.मसूर की खेती की जाती थी।
4.तेल बीजों में सरसों, अलसी एवं तिल प्राप्त हुए हैं।
कूट:

1
1, 2, 3 एवं 4

2
केवल 3 एवं 4

3
केवल 4

4
केवल 1, 2 एवं 3

Q.15
हड़प्पाकालीन मुद्राओं पर सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला प्रतीक चिह्न क्या था?

1
एक शृंगी बैल

2
वृषभ

3
गैंडा का सींग

4
संयुक्त या मिश्रित पशु

Q.16
सैंधव सभ्यता में कब्रिस्तान R -37 पाया गया है-

1
मोहनजोदड़ो में

2
हड़प्पा में

3
रोपड़ में

4
राखीगढ़ी में

Q.17
मनुष्य के साथ कुत्ते के दफनाने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं-

1
संघोल से

2
बाड़ा से

3
रोपड़ से

4
कुणाल से

Q.18
हड़प्पा पुरास्थल के उत्खनन के समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का महानिदेशक कौन था?

1
दयाराम साहनी

2
आर.डी.बनर्जी

3
सर जॉन मार्शल

4
सर मार्टीमर व्हीलर

Q.19
हड़प्पा सभ्यता से सम्बद्ध स्थल माण्डा कहाँ स्थित है?

1
सतलज के किनारे

2
झेलम के किनारे

3
चिनाब के किनारे

4
सिंध के किनारे

Q.20
सर्वप्रथम खेती के साक्ष्य किस स्थल से मिले है?

1
मोहनजोदड़ो

2
मेहरगढ़

3
कोटदीजी

4
अलीमुराद

Q.21 निम्नलिखित में से किस हड़प्पीय स्थल से कुषाणकालीन स्तूप मिला है?

1
हड़प्पा

2
मेहरगढ़

3
मोहनजोदड़ो

4
बनावली

Q.22
मार्शल ने किसे विश्व का महान आश्चर्य कहा है?

1
हड़प्पा का अन्नागार

2
सभाभवन

3
वृहत् स्नानागार

4
लोथल का गोदीबाड़ा

Q.23
सैंधव सभ्यता में किस मानव प्रजाति का अभाव था?

1
प्रोटो ऑस्ट्रलॉइड

2
द्रविड़

3
मंगोलियन

4
नेग्रिटो

Q.24
मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध ‘नर्तकी की मूर्ति’ निम्नलिखित में से किस प्रजाति से सम्बन्धित हैं?

1
आद्य-आस्ट्रेलॉयड

2
मंगोलॉयड

3
भूमध्य सागरीय

4
अल्पाइन

Q.25
गेहूँ व जौ की भूसी के साक्ष्य किस स्थल से प्राप्त हुए हैं?

1
मोहनजोदड़ो

2
हड़प्पा

3
कालीबंगा

4
लोथल

नमस्ते- मेरा नाम अजीत पाल है। मैं लाइफस्टाइल एवं एस्ट्रोलॉजी जगत का शौकीन लेखक हूं। लाइफस्टाइल एवं एस्ट्रोलॉजी के क्षेत्र में काम करने का शौक रखते हुए, मैंने अपना करियर उन खबरों को कवर करने और लेखों के माध्यम से दुनिया भर के दर्शकों तक अपनी राय पहुंचाने के लिए समर्पित किया है। मैं अपने दर्शकों तक लाइफस्टाइल एवं एस्ट्रोलॉजी की दुनिया से नवीनतम समाचार और विशेष जानकारी लाने के लिए अथक प्रयास करता हूं। और अब से मैं AarambhTV.com में एक लेखक के रूप में कार्यरत हूं।

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