विश्व में कृषि के प्रकार, उदाहरण – Types of Agriculture in Hindi (PDF)

नमस्कार आज हम भूगोल के महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक कृषि के प्रकार (Types of Agriculture in Hindi) के विषय में अध्ययन करेंगे तथा चर्चा करेंगे की विश्व में कृषि के प्रकार के साथ भारत में कृषि के प्रकार के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। चलिए शुरू करते हैं।

कृषि क्या हैं?

कृषि का अर्थ है फसल उत्पन्न करने की प्रक्रिया; फसल उत्पादन, पशुपालन आदि की कला, विज्ञानं और तकनीक को कृषि कहते हैं। भूमि के उपयोग द्वारा फसल उत्पादन करने की क्रिया और प्रक्रिया को कृषि कहते हैं।

कृषि के प्रकार (Types of Agriculture in Hindi )

इस खंड मे हम विश्व मे कृषि के प्रकार (Types of Agriculture in Hindi) के बारे मे अध्ययन करेंगे । विश्व मे कृषि के प्रकार निम्नलिखित है ।

स्थानान्तरणशील कृषि (Shifting Cultivation)

–  यह कृषि का सर्वाधिक प्राचीन रूप है, जो मुख्यत: उष्ण कटिबंधीय वनों में रहने वाली जनजातियों द्वारा उपयोग में लाई जाती है। इस प्रकार की कृषि में वन के छोटे भू-भाग में वृक्षों एवं झाड़ियों को काटकर उनको जला दिया जाता है एवं इस भूमि पर कुछ वर्षों तक कृषि की जाती है।

  भूमि की उर्वरता समाप्त हो जाने पर किसी दूसरी जगह पर यही क्रिया दोहराई जाती है अत: इसे काटना (Slash) एवं जलाना (Burn) कृषि भी कहा जाता है, इसे ‘बुश फेलो कृषि’ भी कहा जाता है। इस कृषि को विश्व के विभिन्न भागों में विभिन्न नामों से जाना जाता है।

  यह कृषि आदिम जनजाति के लोगों द्वारा की जाती है।

स्थानान्तरणशील कृषि की विशेषताएँ-

–  इसमें बोए गए खेतों का आकार बहुत ही छोटा होता है।

  कृषि पुराने औजारों जैसे लकड़ी, कुदाली, फावड़े आदि से की जाती है।

  दो-तीन वर्षों में भूमि में उर्वरता समाप्त होने पर अन्यत्र नए सिरे से खेत तैयार कर खेती की जाती है।

  इस प्रकार की कृषि को भारत के पूर्वी राज्यों में ‘झूमिंग, मध्य अमेरिका एवं मैक्सिको में मिल्पा, मलेशिया व इण्डोनेशिया में लदांग तथा वियतनाम में ‘रे’ कहा जाता है।

  यह कृषि अमेजन नदी बेसिन, कांगो बेसिन व पूर्वी द्वीप समूह में की भी जाती हे।

  वर्तमान में इसमें धान, स्थानीय मोटे अनाज मक्का, ज्वार, बाजरा, दाले, तिलहन आदि फसलें पैदा की जाती है।

नामक्षेत्रनामक्षेत्र
लदांगइंडोनेशिया एवं मलेशियामिल्पामध्य अमेरिका एवं मैक्सिका
रोकाब्राजीलकोनुकोवेनेजुएला
झूमउत्तर-पूवी भारतटावीमेडागास्कर
केंगिनफिलीपींसमसोलेजायरे एवं मध्य अफ्रीका
हुमाजावा एवं इंडोनेशियातुंग्याम्यांमार (बर्मा)
चेन्नाश्रीलंकालोगनपश्चिमी अफ्रीका
रेवियतनाम  
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे-
नामक्षेत्रनामक्षेत्र
बेवर दहिया कमान, बिंगा धावीमध्य प्रदेश, ओडिशापेण्डा एवं डिपी पोडू कुमारीआंध्र प्रदेश
बत्रादक्षिण-पूर्वी राजस्थानजारा एवं एरकादक्षिण भाग
खिलहिमालयन क्षेत्रकुरुवाझारखंड
पामलूमणिपुरवालरेदक्षिण-पूर्वी राजस्थान
दीपाछत्तीसगढ़ का बस्तर जिला, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह  

जीविका कृषि (Subsistance Agriculture)

–  कृषि करने वाले परिवार की मात्र आजीविका भर फसल उगाने वाली कृषि को जीविका कृषि कहा जाता है। यह कृषि स्थानान्तरणशील अथवा स्थलबद्ध दोनों ही प्रकार की होती है।

  एशिया के मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों व अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में गहन जीवन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistance Agriculture) की जाती है। इस प्रकार की कृषि में अधिक जनसंख्या के भोजन की आपूर्ति हेतु भूमि का अधिकतम उपयोग किया जाता है।

  भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, चीन, म्यांमार, थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि देशों में इस प्रकार की कृषि होती है।

कृषिगत फसलों का वर्गीकरण– खाद्यान्न फसलें – चावल, गेहूँ, मक्का, जौ, दाल आदि।- नकदी फसलें – मसाले, तिलहन, फल, गन्ना, तंबाकू आदि।- बागानी फसलें – कॉफी, चाय, कोको रबर, नारियल आदि।- रेशेदार फसलें – कपास, जूट आदि।- जंतु उत्पाद – सिल्क, ऊन, मांस, दुग्ध उत्पाद आदि।

जीविका कृषि की विशेषताएँ है-

–  यह कृषि का स्थायी रूप है तथा अनुकूल प्राकृतिक दशाओं वाले क्षेत्रों में की जाती है।

  कृषि भूमि पर जनसंख्या के दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

  भू-जोत छोटे आकार के छितरे हुए होते हैं।

  मानवीय श्रम के भरपूर उपयोग के साथ-साथ कृषि यंत्रों का प्रयोग भी किया जाता है।

  उन्नत बीजों, रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशक दवाओं के प्रयोग द्वार उत्पादकता बढ़ी है।

  सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ है तथा फसल चक्र का अनुसरण किया जाता है।

  सघन जनसंख्या के कारण मुख्यत: खाद्यान्नों का उत्पादन होता है।

  इस प्रकार की कृषि मानसून एशिया के घने बसे क्षेत्रों में की जाती है।

  इस प्रकार की कृषि मानसून एशिया के घने बसे क्षेत्रों में की जाती है।

जीवन निर्वाहन कृषि के दो प्रकार है-

   1. चावल प्रधान निर्वाहन कृषि

– इसका विस्तार भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाईलैण्ड, दक्षिणी व मध्य चीन में मिलता है। इन क्षेत्रों में 100 सेमी. से अधिक वर्षा होती है। इन क्षेत्रों में चावल प्रमुख खाद्यान्न फसल है।

   2. गेहूँ प्रधान निर्वाहन कृषि

– इसका विस्तार उत्तरी-मध्य व पश्चिमी भारत, उत्तरी भारत, उत्तरी चीन, पाकिस्तान व कोरिया में मिलता है। इन क्षेत्रों में वर्षा 100 सेमी. से कम होती है। इन क्षेत्रों में गेहूँ प्रमुख खाद्यान्न फसल है।

वाणिज्यिक कृषि (Commercial Farming)

–  इस प्रकार की कृषि मुख्यत: विकसित देशों द्वारा की जाती है। इस कृषि में खाद्य एवं अखाद्य दोनों ही प्रकार की फसल उपजाई जा सकती है। इस प्रकार की कृषि का उद्देश्य व्यापार हेतु फसलों का उगाया जाना है।

  विश्व में खाद्य फसलों की व्यापारिक कृषि कुछ सीमित क्षेत्रों में ही की जाती है। इस प्रकार की कृषि की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण फसल गेहूँ की वाणिज्यिक कृषि विश्व के शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदानों (स्टेपी, प्रेयरी, वेल्ड, पम्पास) में बड़े पैमाने पर की जाती है।

  वाणिज्यिक कृषि में प्रति व्यक्ति उपज काफी अधिक होती है। यह कृषि विस्तृत, गहन एवं मिश्रित तीनों ही प्रकार की हो सकती है।

वाणिज्यिक कृषि की विशेषताएँ हैं-

  इस प्रकार की कृषि विस्तृत भू-जोतों पर की जाती है। इनका क्षेत्रफल प्राय: 240 से 1600 हैक्टेयर तक होता है।

  खेत तैयार करने से फसल काटने तक का समस्त कार्य मशीनों के द्वारा किया जाता है।

  टैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेसर, कम्बाईन, विनोअर आदि मुख्य यंत्र हैं।

  इस प्रकार की कृषि की मुख्य फसल गेहूँ है। जौ, जई, राई, तिलहन आदि फसलें भी बोई जाती हैं।

  खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े माल गोदाम बनाए जाते हैं।

  मानवीय श्रम का उपयोग न्यूनतम होता है।

  प्रति हैक्टेयर उपज कम तथा प्रति व्यक्ति उपज अधिक होती है।

  इन कृषि क्षेत्रों में निरन्तर जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि क्षेत्र निरन्तर घटता जा रहा है।

  शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदानों में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

  यूरेशिया के स्टेपीज, उत्तरी अमेरिका के प्रेयरीज, अर्जेंटीना के पम्पास, दक्षिणी अफ्रीका के वेल्डस, ऑस्ट्रेलिया के डाउन्स तथा न्यूजीलैंड के कैंटरबरी के मैदानों में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

रोपण कृषि या बागानी कृषि (Plantation Agriculture))

–  यह कृषि का एक विशिष्ट रूप है जिसमें पूर्णत: व्यापारिक उद्देश्य के लिए नगदी फसलों की कृषि की जाती है।

  इस प्रकार की कृषि में विशाल क्षेत्रफल में किसी एक प्रकार के फसल के बागान लगाए जाते हैं।

  इसमें भारी मात्रा में पूँजी निवेश किया जाता है एवं उद्योगों के समान बड़ी संख्या में श्रमिकों की संख्या की आवश्यकता होती है।

रोपण कृषि या बागानी कृषि की विशेषताएँ है-

  यह एक फसली कृषि है।

  इनसे उद्योगों को कच्चा माल मिलता है।

  इलायची, काली मिर्च, गन्ना, रबर, चाय, कहवा, नारियल, केला प्रमुख बागानी फसलें हैं।

  इस प्रकार की कृषि इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिणी व पूर्वी भारत, दक्षिणी चीन, म्यांमार, कम्बोडिया, फिलीपींस, श्रीलंका, मध्य अफ्रीका, ब्राजील, फिजी, क्यूबा व हवाई द्वीपों पर की जाती है।

कृषि के विशिष्ट प्रकार
विटीकल्चर (Viticulture)- अंगूरों का व्यापारिक स्तर पर उत्पादन विटी कल्चर कहलाता है।
– पीसीकल्चर (Pisciculture) – व्यापारिक स्तर पर मछली का उत्पादन पीसी कल्चर कहलाता है।
– सेरीकल्चर (Sericulture)– रेशम के उत्पादन के लिए रेशम के कीड़ों को पाला जाता है सेरी कल्चर कहलाता है।– हॉर्टीकल्चर (Horticulture) – फलों, फूलों एवं सब्जियों की कृषि को हॉर्टीकल्चर कहा जाता है।
– एपीकल्चर (Apiculture) -व्यापारिक स्तर पर शहर के उत्पादन हेतु मधुमक्खी पालन की क्रिया को एपी कल्चर कहा जाता है।
– सिल्वीकल्चर (Silviculture) – यह वानिकी की एक शाखा है जिसमें वनों के संरक्षण एवं संवर्धन की क्रिया शामिल है।
– फ्लोरीकल्चर (Floriculture) – व्यापारिक स्तर पर फूलों की कृषि को फ्लोरी कल्चर कहा जाता है।
– अर्वोरीकल्चर (Arboriculture)– वृक्षों तथा झाड़ियों की कृषि।
– मैरीकल्चर (Maryculture)– समुद्री जीवों का उत्पादन।
– ऑलेरीकल्चर (Olericulture)– जमीन पर फैलने वाली सब्जियों की कृषि।
–  ओलिवीकल्चर (Oliviculture) –जैतून की कृषि।
–  एरोपोनिक (Aeroponic) – पौधों को हवा में उगाना।
–  वर्मीकल्चर (Aeroponic) – केंचुआ पालन।
– मोरीकल्चर (Moriculture) – रेशम कीट हेतु शहतूत(Mulberry) उगाना।
–  वेजीकल्चर(Vegeculture) – दक्षिण-पूर्वी एशिया में आदिमानव द्वारा की गई प्रारंभिक आदिम कृषि।
– नेमरीकल्चर(Nemriculture) –  आदिम व्यवस्था की कृषि, जिसमें वनों से फल-फूल व कंद-मूल संग्रह किया जाता है।

गहन कृषि (Intensive Farming) 

–  इस प्रकार की कृषि मुख्य रूप से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में की जाती है। इस प्रकार की कृषि में फसलों का अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु कृषि भूमि की प्रत्येक इकाई पर अधिक मात्रा में पूँजी एवं श्रम का उपयोग किया जाता है।

  कम क्षेत्र से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना इस कृषि का उद्देश्य है। इस प्रकार की कृषि में छोटे-छोटे खेतों में रासायनिक उर्वरक, उन्नत बीज, सिंचाई, फसल चक्र के माध्यम से अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जाता है।

  इस प्रकार गहन कृषि में फसलों का प्रति हैक्टेयर उत्पादन काफी अधिक होता है। जापान, चीन, भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश आदि में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

विस्तृत कृषि (Extensive Farming)

–  काफी बड़े आकार वाले खेतों में यांत्रिक विधियों से की जाने वाली कृषि को विस्तृत कृषि कहा जाता है। इस कृषि में श्रमिकों का उपयोग कम एवं मशीनों का उपयोग अधिक किया जाता है।

–  इस प्रकार की कृषि में प्रति हैक्टेयर उत्पादन कम होता है, परंतु प्रति श्रमिक उत्पादन एवं कुल उत्पादन अधिक होता है। यह कृषि विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों में आधुनिक तरीकों से की जाती है। विश्व में मुख्य रूप से गेहूँ की विस्तृत खेती की जाती है। वर्तमान समय में विस्तृत कृषि कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरी क्षेत्र, रूस के स्टेपी एवं साइबेरिया, अर्जेंटीना के पम्पास एवं ऑस्ट्रेलिया के डाउन्स क्षेत्र में की जाती है।

मिश्रित कृषि (Mixed Farming)

–  इस प्रकार की कृषि में फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है। यह कृषि मुख्यत: विकसित देशों के सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में की जाती है, जहाँ कृषक अपनी आय बढ़ाने के लिए कृषि के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी करता है।

 यह कृषि शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों (संपूर्ण यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी भाग, ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी भाग, अर्जेँटीना के पम्पास, दक्षिण अफ्रीका के वेल्ड व न्यूजीलैंड) में की जाती है।

मिश्रित कृषि की विशेषताएँ हैं-

  फसल उत्पादन एवं पशुपालन दोनों को इसमें समान महत्त्व दिया जाता है।

  इस कृषि में खेतों का आकार मध्यम होता है।

  गेहूँ, जो, राई, जई, मक्का, सोयाबीन एवं चारे की फसल आदि प्रमुखत: बोई जाने वाली फसले हैं।

  फसलों के साथ पशुओं जैसे- भेड़-बकरी, सूअर, मवेशी, मुर्गी आदि को पाला जाता है।

  शस्यावर्त्तन एवं अंत: फसली कृषि मृदा की उर्वरता को बनाए रखती है।

  इस प्रकार की कृषि में भारी पूँजी निवेश होता है।

  कुशल व योग्य कृषक इस प्रकार की खेती करते हैं।

  यह कृषि महानगरों के समीप की जाती है।

  उत्तम कृषि विधियाँ, उत्तम परिवहन व विश्वसनीय वर्षा से इस कृषि को बड़ी सहायता मिलती है।

डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming)

–  यह एक विशिष्ट कृषि है, जिसमें दूध तथा दुग्ध उत्पादों का व्यापारिक स्तर उत्पादन किया जाता है। इस कृषि में अधिक दूध देने वाले पशुओं (मुख्यत: गाय) को आधुनिकतम तरीके से पाला जाता है।

 यह कृषि मुख्य रूप से ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैंड, डेनमार्क, बेल्जियम आयरलैंड, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे, उत्तर अमेरिका में विशाल झील के समीपवर्ती क्षेत्र एवं न्यूजीलैंड में की जाती है।

ट्रक फार्मिंग (Truck Farming) उद्यान कृषि  

–   यह व्यापारिक स्तर पर सब्जियों, फलों एवं फूलों का उत्पादन करने वाली कृषि है। इस कृषि के उत्पादों के परिवहन में ट्रकों का अधिक उपयोग होने के कारण ही इसे ट्रक फार्मिंग कहा जाता है।

–   इस प्रकार की कृषि का विकास औद्योगिक क्षेत्रों के निकट हुआ है, जहाँ से उत्पादों की नियमित आपूर्ति नगरीय क्षेत्रों में की जाती है। ट्रक फार्मिंग मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर पूर्व एवं संपूर्ण पूर्वी भाग (फ्लोरिडा), कैलिफोर्निया, ब्रिटेन, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क आदि क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर की जाती है।

संविदा या अनुबंध कृषि (Contract Farming)

–  संविदा कृषि के अंतर्गत आम, केला, लहसुन, प्याज जैसी फसलों की विशेष किस्मों का उत्पादन किया जाता है। उदाहरण के लिए टमाटर के उत्पादन में पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान, सूर्यमुखी के उत्पादन में आंध्र प्रदेश व कर्नाटक, फलों और सब्जियों के उत्पादन में तमिलनाडु व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में संविदा कृषि हो रही है।

जीरो फार्मिंग (Zero Farming)

–  बढ़ती खाद्य जरूरतों को देखते हुए फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के तीव्र प्रयास किए जा रहे हैं। इस हेतु विभिन्न उर्वरकों, कीटनाशकों और नवीन तकनीकों का प्रयोग हो रहा है।

  इससे भूमि की प्राकृतिक उर्वरता में कमी आ रही है जो सतत कृषि विकास के लिए हानिकारक है।

  जैविक खेती में रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, इससे मृदा धीरे-धीरे जीरो फार्मिंग के अनुकूल हो जाती है।

–  इस समस्या से निपटने के लिए अब किसान शून्य निवेश कृषि (Zero Input Farming) तकनीक अपना रहे हैं। इसके अंतर्गत जमीन में बाहर से उर्वरक, खाद्य कीटनाशक आदि नहीं डाले जाते हैं, जिससे फसलें अधिक पोषणयुक्त होती है। ऐसी कृषि प्रारंभ करने से पहले तीन साल तक जैविक खेती की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

ई-खेती (E-Agriculture)–  ई-एग्रीकल्चर या ई-खेती इन्टरनेट पर आधारित सूचना व संचार तकनीक से संबंधित जानकारी के आधार पर विकसित कृषि है।- इसमें कृषि विकास हेतु नए उभरते तकनीकों का अनुप्रयोग तथा विभिन्न समाधान के माध्यम से कृषि विकास को बढ़ावा देने का लक्ष्य है।- किसानों को माँग आधारित कृषि संबंधित सूचना उपलब्ध कराना इसका मूल उद्देश्य है, उत्पादों के मूल्य, जुताई के विभिन्न तरीकों, फसल सुरक्षा एवं उत्पादों के सही मूल्य हेतु सक्षम खरीददारों से सीधा संबंध स्थापित कर सके।

शुष्क कृषि (Dry Farming)

–   यह कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है, जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है। अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई के की जाने वाली कृषि ही शुष्क कृषि है। यह कृषि मिट्टी में उपलब्ध नमी की सहायता से ही की जाती है।

सोपानी कृषि (Terrace Cultivation)

–   यह कृषि पर्वतीय क्षेत्रों में समोच्च रेखीय खेतों में की जाती है।

मिश्रित कृषि (Mixed Cropping)

–  यह कृषि मुख्य रूप से वर्षा की अनियमितता वाले असिंचित क्षेत्रों में की जाती है। इसका उद्देश्य वर्षा की अनियमितता एवं अभाव में भी कुछ उत्पादन प्राप्त करना होता है।

बहुफसली कृषि (Multiple Cropping)

–  एक वर्ष में किसी भूमि पर क्रमिक रूप से दो या अधिक फसलों का उपजा जाना बहुफसली कृषि कहलाता है। यह कृषि सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में की जाती है।

फसल चक्र (Crop Rotation)       

–  भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए क्रमिक रूप से विभिन्न फसलों का उगाया जाना, फसल चक्र कहलाता है।

सामुहिक या सहकारी कृषि (Co-Operative or Collective Farming)

–  इसे कोल खोज (Kolkhoz) भी कहा जाता है। इस प्रकार के कृषि संगठन की शुरुआत भूतपूर्व सोवियत संघ में की गई थी। बाद के वर्षों में कुछ अन्य साम्यवादी देशों (पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम, उत्तरी कोरिया) में भी इसे अपनाया गया। इसमें कृषि के बड़े-बड़े भू-खंड होते हैं, जिसका प्रबंधन सहकारी संस्था द्वारा किया जाता है।

राज्य कृषि (State Farming)       

–  इसे सोवखोज (Sovkhoz) के नाम से भी जाना जाता है। यह कृषि राज्य द्वारा नियंत्रित होती है। इस व्यवस्था में फार्म स्वयं कृषक के न होकर राज्य की संपत्ति होते हैं, जिन पर किसान काश्तकार के रूप में कार्य करते हैं।

  किसानों को उनके कार्य के अनुपात में वेतन दिया जाता है। इजरायल में की जाने वाली सामूहिक कृषि को किबुतजीन (Kibutzin) कहा जाता है।

बाजार कृषि (Market Gardening)

–  बड़े-बड़े नगरों के बाहरी भागों में फलों, सब्जियों एवं फूलों की गहन कृषि को बाजार कृषि कहा जाता है।

  विश्व के क्षेत्रफल का 32 प्रतिशत वनों, 26 प्रतिशत चारागाह के, 1 प्रतिशत स्थाई फसल, 10 प्रतिशत खेती तथा 26 प्रतिशत अन्य उपयोगों के अंतर्गत पाया जाता है।

  वर्तमान समय में विश्व की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है परन्तु विश्व के विभिन्न देशों में इस दृष्टि से काफी विषमता पाई जाती है।

ऑर्गेनिक कृषि (Organic Farming)      

–  यह कृषि उत्पादन की एक ऐसी विधि है, जिसमें रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। भारत में 10वीं पंचवर्षीय योजना के अंतिम चरण में ऑर्गेनिक खेती के उत्पादन, प्रोत्साहन और बाजार विकास हेतु राष्ट्रीय ऑर्गेनिक खेती परियोजना शुरू की गई, जिसमें फलों और सब्जियों के कचरे के लिए कम्पोस्ट इकाइयाँ जैव-उर्वरक उत्पादन, कृमि-पालन के लिए अंडज उत्पत्ति शालाएँ आदि हेतु वित्तीय प्रोत्साहन देने पर बल दिया गया।

  इस प्रकार की कृषि का मुख्य उद्देश्य मृदा की प्राकृतिक गुणवत्ता को बनाए रखने के साथ-साथ लघुस्तरीय कृषि व सतत कृषि की ओर कदम बढ़ाना है।

पशुपालन कृषि (Ranching)

–  जब किसी प्राकृतिक वनस्पति क्षेत्र पर विभिन्न प्रकार के पशुओं को चराया जाता है तो उसे पशुपालन कृषि कहते हैं।

  इस कृषि में फसलों का उत्पादन नहीं किया जाता है।

  पशुपालन कृषि अधिकांशत: उन देशों में की जाती है, जहाँ प्राकृतिक चारागाहों की अनुकूलतम स्थित होती है।

  पशुपालन कृषि मुख्यत: ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, तिब्बत तथा भारत के पर्वतीय या पठारी क्षेत्रों में अधिक की जाती है।

सहकारी कृषि (Co-operative Agriculture)

–  इस पद्धति में किसान परस्पर लाभ के उद्देश्य से स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि, श्रम और पूँजी को एकत्रित करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं।

  इसका उद्देश्य खेती के छोटे व बिखरे होने की समस्या का समाधान तथा उपविभाजन से जनित समस्याओं का निराकरण कर किसान श्रमिकों और छोटे किसानों के साथ न्याय करना है।

  इसके अलावा संविदा कृषि, निगमित कृषि, जीरो फार्मिंग आदि अन्य महत्त्वपूर्ण कृषि के प्रकार है।

पारिस्थितिकी कृषि (Eco-farming)

–  इस कृषि प्रणाली में पारिस्थितिकी सम्पदा को बिना हानि पहुँचाए कृषि की जाती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक उर्वरकों और कीटनाशकों को वरीयता दी जाती है।

–  कृषि की इस पद्धति का मुख्य उद्देश्य प्रकृति से उसकी सामर्थ्य तक उत्पादन लेना और पारिस्थितिकी गतिविधियों में न्यून हस्तक्षेप करना तथा इसमें वर्मी कम्पोस्ट, कीटनाशक के रूप में नीम खाद का प्रयोग तथा टिश्यू कल्चर पर जोर दिया जाता है।

कृषि विधि एवं तकनीक

परती छोड़ना

–  एक ही कृषि भूखंड पर लगातार कृषि करने से मिट्टी की उर्वरता घट जाती है। अत: मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए कृषि भूखंड को कुछ समय या अवधि (सामान्यत: 3 से 4 वर्षों तक) के लिए खाली (परती) छोड़ दिया जाता है ताकि भूमि अपनी प्राकृतिक उर्वरता को पुन: प्राप्त कर सके।

चक्रीय कृषि

– कृषि भूखंड को परती छोड़ने के बजाय जब उस पर विभिन्न फसलें चक्रीय क्रम में उगाई जाती हैं तो उसे ‘चक्रीय कृषि’ कहते हैं।

  चक्रीय कृषि से मिट्टी की उर्वरता तथा पोषक तत्त्वों की कमी नहीं होती है और मिट्टी में पोषक तत्त्वों का संतुलन बना रहता है।

  चक्रीय कृषि में फलीदार पौधों मुख्यत: दलहनी फसलों को प्रमुखता से उगाया जाता है क्योंकि इनके द्वारा मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता रहता है।

मिश्रित शस्यन

–  मिश्रित कृषि में किसी एक ही कृषि भूखंड पर विभिन्न प्रकार की फसलों को मिश्रित करके उगाया जाता है, ताकि एक फसल द्वारा पोषक तत्त्वों का उपयोग तथा दूसरी द्वारा उत्पादन होता रहे। इससे मिट्टी में पोषक तत्त्वों का संतुलन बना रहता है।

 मिश्रित कृषि में कृषि क्रियाओं के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है।

द्विफसली कृषि

–  इसमें चक्रीय विधि द्वारा एक ही वर्ष में दो फसलों का उत्पादन किया जाता है।

  द्विफसली कृषि का उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखना होता है, इसलिए इसमें एक फसल नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाली होती है, ऐसी कृषि पर्याप्त सिंचाई वाले या वर्षा वाले या वर्षा वाले क्षेत्रों में होती है।

रिले कृषि

–  इस विधि के अंतर्गत पहली फसल को काटने से पूर्व ही इसके मध्य उपस्थित रिक्त स्थानों में दूसरी फसल लगा दी जाती है एवं प्रथम फसल के कटने का इंतजार नहीं किया जाता, जैसा कि द्विफसली पद्धति में किया जाता है।

बहुफसली कृषि

–  कम समय में तैयार होने वाले फसलों के आगमन एवं जल-प्रबंधन की बेहतर तकनीक के कारण अब साल में तीन फसलों को उपजाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसे बहुफसली कृषि कहते हैं। कृषि विकास के साथ-साथ किसान अब बहुफसली कृषि की ओर भी अग्रसर हो रहे हैं।

कृषि उत्पादकता

–  कृषि उत्पादकता का तात्पर्य प्रति हैक्टेयर उत्पादन या प्रति श्रमिक उत्पादन से है। विस्तृत कृषि वाले क्षेत्रों में श्रम उत्पादकता अधिक रहती है जबकि सघन कृषि वाले क्षेत्रों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन ज्यादा रहता है परंतु भारत में कृषि पद्धति के पर्याप्त विकास न हो पाने के कारण इन दोनों ही मामलों में पिछड़ेपन की स्थिति है।

  कृषि उत्पादकता भौतिक व गैर-भौतिक दोनों ही कारकों पर निर्भर है। भौतिक कारकों के अंतर्गत जहाँ जलवायु, मिट्टी व स्थलाकृतिक ढाल जैसी विशेषताएँ आती हैं, वहीं गैर-भौतिक कारकों के अंतर्गत संस्थागत व संरचनात्मक कारकों के साथ-साथ राजनीतिक प्रशासनिक प्रयास भी शामिल हैं।

कृषि दक्षता

–  कृषि दक्षता में उत्पादकता के साथ-साथ लाभप्रदता को भी शामिल किया जाता है अर्थात् कितने कम निवेश से कितना अधिक उत्पादन प्राप्त हुआ है तथा उस उत्पादन का बाजार मूल्य क्या है। अत: यह भी संभव है कि अधिक उत्पादकता वाले प्रदेशों में भी कृषि दक्षता कम है।

शस्य गहनता

–  भारत जैसे देशों में उपजाऊ भूमि का क्षैतिज विस्तार और अधिक संभव नहीं है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि कृषि भूमि में वर्ष भर में एक से अधिक फसल समयों में फसल प्राप्त की जाए। कृषि भूमि का अधिकतम उपयोग ही कृषि भूमि का लंबवत् विकास या शस्य गहनता कहलाता है।

   शस्य गहनता = (एक वर्ष में कुल बोया गया क्षेत्र x 100) / वास्तविक कृषि क्षेत्र  

कृषि संबंधी महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान
संस्थानमुख्यालय
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)रोम इटली
अंतर्राष्ट्रीय वानिकी अनुसंधान केंद्र (CIFOR)बोगोर इंडोनेशिया
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO)जेनेवा (स्विट्जरलैंड)
अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI)मनीला (फिलीपींस)
अंतर्राष्ट्रीय उष्ण कटिबंधीय कृषि संस्थानअबादान (नाइजीरया)

विश्व की प्रमुख कृषि क्रांतियाँ

क्र. सं.कृषि क्रांतियाँकारण
1.हरित क्रांतिफसल उत्पादन करना
2.नीली क्रांतिमछली पालन
3.गुलाबी क्रांतिझींगा मछली पालन
4.पीली क्रांतितिल व सरसों उत्पादन
5.श्वेत क्रांतिपशुपालन व दुग्ध प्राप्ति
6.रजत/सिल्वर क्रांतिमुर्गी पालन व अंडा उत्पादन
7.सुनहरी/गोल्डन क्रांतिमधुमक्खी पालन
8.बादामी क्रांतिमसाला उत्पादन
9.गोल क्रांतिआलू उत्पादन
10.लाल क्रांतिटमाटर उत्पादन व मांस
11.भूरी क्रांतिउर्वरक उत्पादन/निर्माण
12.काली क्रांतिऊर्जा के गैर परंपरागत स्त्रोत

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रामप्रसाद RpscGuide में कंटेंट राइटर हैं। रामप्रसाद को पढ़ाई का जुनून है। उन्हें लेखन, करियर, शिक्षा और एक अच्छा कीबोर्ड पसंद है। यदि आपके पास कहानी का कोई विचार है, तो उसे [email protected] पर एक मेल भेजें।

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