अनुकूलन क्या है? परिभाषा, प्रकार और महत्व

नमस्कार इस लेख में हम अनुकूलन क्या है: परिभाषा, प्रकार और महत्व के विषय में अध्ययन करेंगे।

अनुकूलन क्या है? परिभाषा

जीवों में होने वाले शारीरिक, संरचनात्मक एवं व्यवहारात्मक परिवर्तन जिनके कारण ये जीव किसी विशेष आवास, परिस्थिति में रहने हेतु विशेष लक्षण उत्पन्न कर लेते हैं, अनुकूलन (Adaptation) कहलाते 

जैसे :- मरुस्थलीय पौधों में शुष्क परिस्थितियों का सामना करने हेतु पर्ण (leaves) का काँटों मे रुपान्तरण, जंतुओं के शरीर में अलग-अलग उत्सर्जी पदार्थों का होना।

अनुकूलन के प्रकार

जीव सामान्यतया 3 प्रकार के अनुकूलन दर्शाते हैं :-

1. संरचनात्मक अनुकूलन (Structural adaptation) :-
– ऐसे अनुकूलन में जीवों के शरीर में ऐसे संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं, जो बाहर से दिखाई भी देते हैं।
जैसे :- ठंडे प्रदेशों के जंतुओं के शरीर का आकर तो बड़ा लेकिन पंजे व कान छोटे होना, जबकि गर्म प्रदेशों के जीवों में कान व पंजे बड़े आकार के होना।

2. व्यवहारात्मक अनुकूलन (Beghavioural adaptation) :-
– इसमें जीव के शरीर में कोई नई संरचना विकसित नहीं होती, लेकिन वातावरण के प्रति अनुकूलित होने के लिए जीव अन्य क्षेत्रों की ओर प्रवास (Migration) करते हैं, जैसे साईबेरियाई क्रेन हजारों मील उड़कर साईबेरिया से राजस्थान में पहुँचते है तथा यदि ये जंतु प्रवास न कर पाऐं तो शीत निष्क्रियता (Hibernation) या ग्रीष्म निष्क्रियता (Aestivation) दर्शाते हैं।

3. शारीरिक अनुकूलन (Physiological Adaptation) :-
– ऐसे अनुकूलन सामान्यतया जीव में बाहर से दिखाई नहीं देते हैं तथा इनको पहचानना मुश्किल होता है। लेकिन ये परिवर्तन जीव जैविक क्रियाओं में विशेष अनुकूलन लाते हैं।
जैसे :- कंगारु चूहे में जल के उत्सर्जन को रोकने हेतु विशेष रूप से दक्ष किड्नी पाई जाना, मच्छर, जोंक आदि की लार में प्रतिस्कन्दक पदार्थों का पाया जाना।

जंतुओं में अनुकूलन (Adaptations in Animals)

अपने आवास (Habitat) वातावरण के प्रति अनुकूलन दर्शाने हेतु जंतुओं में निम्नलिखित क्रियाऐं देखी जाती हैं :

प्रवास (Migration) :-
इसमें जंतु अपने मूल आवास को छोड़कर अस्थायी रूप से किसी अन्य स्थान पर चले जाते हैं तथा जब मूल आवास में परिस्थितियाँ रहने लायक हो जाऐं तो पुन: अपने मूल आवास में लौट आते हैं।
जैसे :- साईबेरियाई क्रेन का प्रवास, कुछ मछलियों का ठण्ड के समय गर्म क्षेत्रों की ओर प्रवास रहता है।

शीत-निष्क्रियता (Hibernation) व ग्रीष्म-निष्क्रियता (Aestivation) :-
यदि जंतु प्रवास (Migration) न कर सकें मौसम विशेष में ये जंतु अपनी शारीरिक सक्रियता में कमी लाते हैं तथा इनकी उपापचयी क्रियाएँ धीमी हो जाती हैं जिससे ये विपरीत वातावरण में भी अपने आप को सुरक्षित रख पाते हैं।

शीत-निष्क्रियता (Hibernation) :- शीत ऋतु में जंतु का निष्क्रियता दर्शाना।

ग्रीष्म-निष्क्रियता (Aestivation) :- ग्रीष्म ऋतु में जंतु का निष्क्रियता दर्शाता।

  • उपरोक्त निष्क्रियताएँ सामान्यता ठण्डे रुधिर वाले प्राणियों (Poikilothermals) में देखी जाती हैं, क्योंकि इन जंतुओं में अपने शरीर के तापमान नियमन की क्षमता नहीं पाई जाती है।
  • इनके विपरीत गर्म रुधिर के प्राणी (Homeothermals) अपने शरीर के तापमान को नियमित बनाए रख सकते हैं। (हालांकि भालू, गिलहरी में गर्म रुधिर होते हुए भी शीत निष्क्रियता देखी जाती है)
  • अकशेरुकी जीव (ग्रीष्म निष्क्रिय) जैसे :- घोंघा, कशेरुकी जीव जैसे:- मेंढक, छिपकली, साँप, फुफ्फुस मछली (Lung Fish) आदि ऐसी निष्क्रियता देर्शाते हैं।

छद्मावरण (Comafiague) :-
कुछ जंतु अपने परभक्षी (Predators) से बचने हेतु अपने शारीरिक रंग व बनावट इस प्रकार कर लेते हैं कि इन्हें पहचान पाना मुश्किल, ये अपने आस-पास के वातावरण रंग व संरचनाऐं विकसित कर लेते हैं।
जैसे :- गिरगिट, कुछ छिपकलियाँ, टिड्डे (Grass Hooper) के द्वारा छद्मावरण ग्रहरण करना।

अनुहरण (Mimicry) :-
इसमें एक जंतु जो अनुहारक (Mimic) होता है वह अपनी ही प्रजाति के अन्य जंतु (प्रतिरूप/Modal) की नकल करता है अर्थात् उसके जैसा ही दिखता है, इसे अनुहरण कहते हैं।
जंतुओं में 2 प्रकार का अनुहरण :-
बेटेसियन अनुहरण (परभक्षण से बचने हेतु)
जैसे :- तितलियाँ
मुलेरियन अनुहरण (मधुमक्खी/Honey-bee व ततैया/Wasp में)

Note :

  • बर्गमान का नियम :- ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले गर्म रुधिर वाले प्राणियों के शरीर का आकार बड़ा होता है।
  • एलन का नियम :- ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले जंतुओं के पंजे, कान छोटे आकार के होते है।
  • ग्लोगर का नियम :- गर्म तथा आर्द्र परिस्थितियों में रहने वाले जंतुओं में मिलेनिन का निर्माण ज्यादा होने से इनकी त्वचा गहरे रंग की होती है।

पादपों (Plants) में अनुकूलन

पौधे किसी विशेष आवास, तापमान, पोषक पदार्थों की उपलब्धता जल एवं प्रकाश की मात्रा के अनुसार स्वयं में इस प्रकार परिवर्तन करते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में आसानी से रह पाऐं।

पोषण के लिए :-

  • पहाड़ी क्षेत्रों में जिन्मोस्पर्म के पादपों की जड़ों में खनिज लवण के अवशोषण को बढ़ाने तथा जड़ों की सुरक्षा हेतु कवक के साथ सहजीवी संबंध दर्शाती हैं। (कवकमूल/मायकोराईजा)
  • सामान्यतया N2 की कमी वाली मृदा में कीटाहारी पादप (Insectivore plants) पाए जाते हैं, इनमें पत्तियाँ विशेष संरचनाओं का निर्माण कर कीटों का शिकार करती हैं।
  • परजीवी मूल (अमरबेल/कस्कुटा) में पाए जाने वाले चूषकांग (Haustoria) इस परजीवी पादप के पोषण के सहायक होते है।
  • फलीदार पौधों की जड़ों में N2 स्थिरीकरण बढ़ाने हेतु ग्रंथिल जड़ें पाई जाती हैं जिनमें राइजोबियम जीवाणु सहजीवी रूप में वायुमंडलीय N2 का स्थिरीकरण करता है।

जैविक एवं यांत्रिक अनुकूलन :-

  • पौधों में प्रकाश के प्रति अनुकूलन पाए जाते हैं,
  • जैसे :- निम्न विकसित पौधे जैसे :- ब्रायोफाईटा व टेरिडोफाईटा के सदस्य छायादार स्थानों पर पाए जाते हैं, इनमें प्रकाश-संश्लेषण व उपापचयी क्रियाओं की दर धीमी होती है, अत: कम प्रकाश में भी सामान्य वृद्धि दर्शाते हैं।
  • स्थलीय व काष्ठीय पौधे जो विकसित होते हैं जैसे :- जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म में प्रकाश की मात्रा ज्यादा प्राप्त अत: इनकी उपापचयी क्रियाएँ व प्रकाश संश्लेषण दोनों अधिक होती हैं।
  • गर्म, शुष्क व मरुस्थलीय क्षेत्र जहाँ जलाभाव रहता है, ऐसे क्षेत्रों पौधों में जल की कमी से बचने हेतु मोटी क्यूटिकल, पत्तियों का काँटों में बदल जाना, माँस/गूदेदार तने पाए जाना तथा धँसे हुए रंध्र (Sumken stomata) पाए जाते हैं ताकि वाष्पोत्सर्जन की क्रिया कम से कम हो।
  • जलीय पौधों को प्लावी अवस्था में बनाए रखने के लिए इनमें वायु से भरे उत्तक (Air pockets) पाए जाते हैं।
  • लवणीय मृदा में रहने वाले पादपों (Halophytes)
  • जैसे :- राइजोफोर्स तथा मैंग्रोव वनस्पति में पौधे में लवणों का जमाव होने लगता है ताकि संतुलन बना रहे तथा ऐसे पौधे जब दलदली भूमि में होते हैं तो इनकी जड़ें भूमि से बाहर “श्वसन मूल (Respiratory Rorts)” के रूप में निकलती हैं ताकि पर्याप्त O2 मिल सके।
  • गन्ने में अवस्तंभ मूल तथा बरगद में स्तंभ मूल पौधे के तने एवं इसकी शाखाओं का यांत्रिक (सहारा प्रदान करती हैं।

अनुकूलन से सम्बंधित प्रश्न

अनुकूलन क्या है उदाहरण दें?

अनेक मरुस्थलीय पौधों की पत्तियों की सतह पर क्युटिल पाई जाती है जिसे वाष्पोत्सर्जन कम होता है इनकी पत्तियों में रंध्र गर्त में होते हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन से होने वाली जल की हानि कम होती है।

अनुकूलन की परिभाषा क्या है?

जीवों में होने वाले शारीरिक, संरचनात्मक एवं व्यवहारात्मक परिवर्तन जिनके कारण ये जीव किसी विशेष आवास, परिस्थिति में रहने हेतु विशेष लक्षण उत्पन्न कर लेते हैं, अनुकूलन (Adaptation) कहलाते

अनुकूलन किसे कहते हैं यह कितने प्रकार के होते हैं?

जीवों में होने वाले शारीरिक, संरचनात्मक एवं व्यवहारात्मक परिवर्तन जिनके कारण ये जीव किसी विशेष आवास, परिस्थिति में रहने हेतु विशेष लक्षण उत्पन्न कर लेते हैं, अनुकूलन (Adaptation) कहलाते हैं।

अनुकूलन कैसे होता है?

एक अनुकूलन पीढ़ी दर पीढ़ी पारित किया जाता है ।

अनुकूलन कक्षा 12 क्या है?

अनुकूलन को उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है जहां एक प्रजाति या जीव धीरे-धीरे अपने पर्यावरण के लिए बेहतर रूप से अभ्यस्त हो जाता है ।


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